विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है (भाग 1)

आप इस बात पर सवाल कीजिए कि आखिर जिस साम्प्रदायिकता की बात इन मीडियावालों ने खूब बेची है, वो आखिर है क्या? उसका आधार क्या है? क्या भाजपा से ताल्लुक़ रखना, मोदी के समर्थन में खड़े होना, भगवा कपड़े पहनना, तिलक लगाना ही साम्प्रदायिकता है?

आवारगी में हद से गुज़र जाना चाहिए,
लेकिन कभी-कभार तो घर जाना चाहिए

देश में दस लाख पोलिंग बूथ थे, लाखों EVM का इस्तेमाल हुआ, लगभग 60 करोड़ लोगों ने मतदान किया, हजारों सुरक्षा बलों और चुनाव कर्मचारियों ने इसे संपन्न कराया। पूरे चुनाव तक माहौल यही रहा कि राज्यवार गठबंधन काम कर जाएँगे, कॉन्ग्रेस ने तीन राज्य जीते तो क्या पता लोकसभा में भी चकित कर दे, क्या पता लोग राफेल और ‘चौकीदार चोर है’ को सच मान लें…

एक ओर ये चलता रहा और दूसरी ओर एग्जिट पोल्स ने कुछ और ही मामला बना दिया। मूर्ख-से-मूर्ख व्यक्ति भी उमर अब्दुल्ला की सलाह मान कर ये मन बना लेगा कि दस में से नौ संस्था भाजपा को बहुमत दे रही है तो, कुछ तो कारण रहा होगा। लेकिन कुछ लोगों ने एक अंतिम जोर लगाना बेहतर समझा है। वो लोग कौन हैं, उन्हें किसका समर्थन प्राप्त है, उनका लक्ष्य क्या है, ये हम और आप जानते हैं। फिर भी इस पर विस्तार से चर्चा बहुत आवश्यक है क्योंकि यही तय करेगा कि भारत का भविष्य क्या है।

विपक्ष का ‘बुलशिट’ वाला मिसाइल, जो इन्हीं की तरफ पलट गया है

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विपक्ष की पूरा जोर इस बात पर रहा कि किसी भी तरह सत्ता उनमें से किसी भी के हाथ एक बार लग जाए, ताकि जो बड़े बदलाव इस देश में हो रहे हैं, जिससे इन पार्टियों को सीधे तौर पर नुकसान हुआ है, उन फ़ैसलों को पलट दिया जाए। जो केस चल रहे हैं, उन्हें रोक दिया जाए। जो फ़ंडिंग क़ानून की मदद से रोकी गई है, उसमें ढील दी जाए। पैसा इनका सूख चुका है, और जो कैश रिज़र्व था वो नोटबंदी में बेकार हो गया। अगर बेकार नहीं भी हुआ, तो उन्हें इसका हिसाब इनकम टैक्स वालों को देना ही होगा।

विपक्ष ने मुद्दे नहीं उठाए। विपक्ष ने सनसनी बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया। विपक्ष को समर्थन देने वाली मीडिया में भी वही सारी बातें होती रहीं जिनका आम जनता से कम, और विपक्ष की इमेज को बेहतर करने से ज्यादा वास्ता था। जस्टिस लोया की मौत को मुद्दा बनाया गया, गलत वित्तीय ज्ञान परोस कर अमित शाह के बेटे की कम्पनी को मुद्दा बनाया गया, अजित डोभाल के बेटों पर माहौल बनाने की कोशिशें हुई, नोटबंदी पर लाशें पैदा की गईं, जीएसटी पर उन व्यापारियों के नुकसान की बात हुई जो कहीं थे ही नहीं! कई ऐसी बातें कही गईं जिसे सुप्रीम कोर्ट ने कई बार नकार दिया गया।

डर और साम्प्रदायिकता का ज़हर विपक्ष ने फैलाया

अगर आप गौर से देखें तो साम्प्रदायिकता और मुसलमानों को डराने के नाम पर जो ज़हर विपक्ष और इनके समर्थन वाले मीडिया ने फैलाया है, वो सिर्फ ‘फ़ियर मॉन्गरिंग’ ही है। इस मामले में वामपंथी और छद्म-लिबरल गिरोह, पाक अकुपाइड पत्रकार और पत्रकारिता का समुदाय विशेष जिस तरह से नमक-पानी और सत्तू लेकर अपनी घृणा को तर्क और तथ्य बना कर बेचा है, वो गहन शोध का विषय है।

आप गौर से कुछ तथ्यों को देखिए। आप इस बात पर सवाल कीजिए कि आखिर जिस साम्प्रदायिकता की बात इन मीडियावालों ने खूब बेची है, वो आखिर है क्या? उसका आधार क्या है? क्या भाजपा से ताल्लुक़ रखना, मोदी के समर्थन में खड़े होना, भगवा कपड़े पहनना, तिलक लगाना ही साम्प्रदायिकता है? दंगे इस देश में सबसे ज़्यादा किन पार्टियों ने कराए? एक पैटर्न है दंगों का इस देश में। एक सपोर्ट सिस्टम है कान्ग्रेस और उनकी समर्थित पार्टियों का यहाँ पर।

अगर दंगे नहीं होंगे तो फिर ये तथाकथित सेकुलर पार्टियाँ वोट कैसे माँगेंगी? मुसलमानों को सिर्फ यह कहते रहना कि हिन्दू तुम्हें मार देगा, काम नहीं करता। इसलिए, मस्जिदों के बाहर सूअर और मंदिरों के बाहर गाय का सर फेंक कर दंगे कराना जरूरी हो जाता है कि अल्पसंख्यक इस नैरेटिव को सच मान ले। आप यह बात जान लीजिए कि दंगे स्वयं नहीं होते। दंगों के लिए पूरी व्यवस्था होती है। इस देश के सारे बड़े दंगे, कॉन्ग्रेस के केन्द्र या राज्य में रहते हुए ही हुए हैं। गोधरा में भी कारसेवकों को जलाया नहीं जाता, तो वो दंगा नहीं होता। कुछ दंगे एक पार्टी पर दाग लगाने के लिए किए गए।

अगर ऐसा नहीं है तो आप मुझे यह बताइए कि पिछले पंद्रह सालों में आपने किस दंगे की चर्चा सबसे ज्यादा सुनी? आप याद कीजिए कि गोधरा को दंगों का पर्याय कैसे बना दिया गया। आप यह याद कीजिए कि कैसे राजीव गाँधी जैसा दंगाई व्यक्ति इस देश की मीडिया का लाड़ला हो जाता है, और उसे डैशिंग और हैंडसम कह कर, उसके पापों को क्यूटनेस से धोने की बात की जाती है।

साम्प्रदायिकता और भाजपा दो अलग ध्रुव हैं। भाजपा कभी भी साम्प्रदायिक रही ही नहीं। अगर भाजपा साम्प्रदायिक है, तो फिर भारत की बाकी हर पार्टी उससे ज्यादा कट्टरपंथी रही है। हिन्दुओं को हितों की बात करना साम्प्रदायिकता नहीं है। पेपरों में भाजपा और भगवा को कम्यूनल होने का पर्याय बना देने से वो ऐसे नहीं हो जाते। क्या आपने इनसे आँकड़े माँगे कि बताओ और तुलनात्मक अध्ययन करो कि भाजपा ही साम्प्रदायिक क्यों है तुम्हारे लिए, और बाकी की पार्टियाँ कैसे साफ हो जाती हैं?

आशा की राजनीति

इस देश में आशाओं को भुनाने के लिए नायाब तरीके ढूँढ़े गए। इंदिरा ने गरीब को गरीब ही रहने दिया, ताकि ‘गरीबी हटाओ’ का नारा चिरकाल तक ‘न्याय’ के नाम से उनके पोते तक भुनाते रहें। लालू ने बिहार को साज़िशन निरक्षर रखने की योजना बनाई क्योंकि पढ़ा-लिखा बिहारी किसी घोटालेबाज़ को वोट क्यों देता! मायावती, मुलायम आदि ने एक जाति को दूसरे का डर दिखा कर अपनी नेतागीरी चमकाई।

किस पार्टी ने विशुद्ध विकास के मुद्दे पर राजनीति की है? किस पार्टी को सच में देश को हित से मतलब रहा है? आप गिनेंगे तो शायद उत्तर-पूर्व के कुछ मुख्यमंत्रियों और भाजपा को छोड़ कर आपको कोई याद नहीं आएगा। आखिर चुनावों में साम्प्रदायिकता सबसे बड़ा मुद्दा कैसे हो जाता है?

आखिर स्टूडियो में बैठे एंकर स्वयं ही यह रोना क्यों रोते हैं कि मुद्दों पर बात नहीं हो रही! वो खुद ही मुद्दे क्यों नहीं उठाते?

एडिटर्स गिल्ड और प्रेस क्लब क्या हैप्पी आवर में दारू और फ़िश फिंगर्स खाने के लिए बना है? कब इन संस्थाओं ने नेताओं को खिलाफ मोर्चा खोला और कहा कि बात इस पर होगी कि स्कूलों के शिक्षकों को वेतन नहीं मिल रहा, बात इस पर होगी कि अस्पतालों में बेड कम क्यों हैं, बात इस पर होगी कि शोध में पैसा कम क्यों है, बात इस पर होगी कि किसानों से सरकार सीधे उत्पाद क्यों नहीं ख़रीदती…

ऐसा नहीं होता क्योंकि मीडिया के चाटुकार-चम्पक-एंकरों का गिरोह राहुल गाँधी जैसे नालायक व्यक्ति को देश का भविष्य बताने पर तुला हुआ था। ऐसा नहीं होता क्योंकि ये पत्रकार अपना ज़मीर बेच कर एक व्यक्ति से खुले तौर पर घृणा करते हुए, नेताओं के साथ स्टेज पर खड़े दिखे। ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पत्रकारों के भीतर की नैतिकता मर चुकी थी, और संस्थानों की विचारधारा सर्वोपरि हो गई थी। यही कारण है कि ये एंकर, ये पत्रकार, ये रिपोर्टर, ये आलोचक, ये विश्लेषक हर बार उन बातों पर नैरेटिव बनाने की कोशिश में लगे हुए दिखे, जिससे किसी एक नेता की छवि बिगाड़ दी जाए।

मीडिया पूरी तरह से जनसामान्य से कटा हुआ दिखा, और स्टूडियो से कैम्पेनिंग में लगे लोगों ने बग़ल के गमले को छूकर भारत के खेतों की हालत पर रिपोर्टिंग कर दी। ये लोग कमरों में बैठ कर वोटरों का मूड और अंडरकरेंट बताने में लीन थे। जिन्हें धान और गेहूँ का फ़र्क़ नहीं पता, उन्होंने किसानों की स्थिति पर लेख लिखे। जिन्हें लोगों को व्यक्ति होने से पहले उनके हिन्दू या मुसलमान होने में रुचि थी, उन्होंने बताया कि निकाह हलाला में मौलवी के साथ किसी महिला को इच्छा के विरुद्ध भी सोना पड़े तो वो उनका अपना मसला है।

ये है आपकी मीडिया जिसे आपने अपना समय दिया, अपने विचार इन्हें सुन कर बनाए, जिन्हें सच मान कर दोस्तों से लड़ाइयाँ कीं। याद कीजिए कि कितनी बार आपने सच जानने के लिए दूसरी तरह की बातें खोजीं? ध्यान से सोचिए कि जब आप एक ही तरह के, एक ही जगह से, एक ही व्यक्ति से प्रभावित हो कर उसी आधार पर अपनी सूचना का चुनाव करते हैं, तो क्या आप सही मायनों में सच जानने को उत्सुक होते हैं, या फिर आपके लिए जो सही ‘लग’ रहा हो, जो सही होने का चोला ओढ़े हो, जो आपने पूर्वग्रहों को संतुष्ट करता है, उसे चाहते हैं कि वही सच हो?

दोनों स्थिति में बहुत अंतर है। आप जो चाहते हैं कि वो सच हो जाए, वो कई बार सच नहीं होता। आपको लगता होगा कि जुनैद की हत्या गोमाँस के कारण हुई, जबकि सत्य यह है कि वो सीट के झगड़े में मारा गया। आपको लगता होगा कि रोहित वेमुला की आत्महत्या राजनीतिक थी, जबकि उसने अपने सुसाइड लेटर में लिखा कि उसके नाम पर राजनीति न हो। आपको लगता रहा कि अखलाख की भीड़ हत्या का पाप सारे हिन्दुओं के सर है, लेकिन सत्य यह है कि भले ही सारे आतंकी हमलों का सूत्रधार, धरती को ख़लीफ़ा के शासन में लाने की चाह रखने वाले एक खास मज़हब के दरिंदे करते हैं, लेकिन उस पाप का बोझ वो मज़हब नहीं उठाता।

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 2: ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप
भाग 3: वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया
भाग 4: लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला

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