Thursday, May 23, 2024
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तब रोहिंग्या, इस बार त्रिपुरा बना रजा अकादमी का हथियार; दोनों बार निशाने पर हिन्दू और जला महाराष्ट्र: लाचारी या मुस्लिम तुष्टिकरण

पहले से वायरल हो रहे वीडियो वगैरह में बाकायदा इस बात की घोषणा की गई थी कि लोग दुकानें अपनी जिम्मेदारी पर खोलें क्योंकि भीड़ चाहती है कि सबकुछ बंद रहे। आखिर प्रशासन के लिए हिंसा का पूर्वानुमान लगाया जाना संभव क्यों नहीं था?

महाराष्ट्र के मालेगाँव, नांदेड़ और अमरावती जिलों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण की माँग की आड़ में जो कुछ भी हुआ वह पूरे देश ने देखा। प्रशासन को ज्ञापन देने के नाम पर जमा की गई अनियंत्रित (या फिर मुस्लिम संगठन द्वारा नियंत्रित?) भीड़ ने जो किया वह देश के सामने है। साथ ही सामने है सांप्रदायिक शक्तियों के आगे झुकने वाली राज्य सरकार, सत्ताधारी दलों के नेताओं द्वारा किसी तथाकथित साजिश के नाम पर जारी किए जाने वाले बयान और महाराष्ट्र प्रशासन की बेबसी जो पिछले कई वर्षों में बार-बार दिखाई दी है। जो भी हुआ वह हर तरह से न केवल सरकार, समाज, संविधान और कानून के विरुद्ध था बल्कि वर्तमान प्रशासन की क्षमता और संविधान की रक्षा के प्रति उसके दृष्टिकोण और वचनबद्धता को भी दर्शाता है।

शुक्रवार 12 नवंबर, 2021 के दिन जो हुआ वह अचानक नहीं हुआ। यह रज़ा अकादमी, अन्य संगठनों और व्यक्तियों द्वारा पूर्व घोषित था। पहले से वायरल हो रहे वीडियो वगैरह में बाकायदा इस बात की घोषणा की गई थी कि लोग दुकानें अपनी जिम्मेदारी पर खोलें क्योंकि भीड़ चाहती है कि सबकुछ बंद रहे। आखिर प्रशासन के लिए हिंसा का पूर्वानुमान लगाया जाना संभव क्यों नहीं था? वैसे भी भीड़ जमा करके उसे अनियंत्रित छोड़ने का रजा अकादमी जैसे मुस्लिम संगठनों का रिकॉर्ड पुराना है। ऐसा भी नहीं था कि रजा अकादमी महाराष्ट्र की धरती पर पहली बार भीड़ जमा करने वाली थी। आखिर आज़ाद मैदान में इसी संगठन ने अगस्त 2012 में जो कुछ भी किया और करवाया था उसे बीते अभी एक दशक नहीं हुए हैं।

इसबार इन जिलों में रजा अकादमी ने त्रिपुरा में अल्पसंख्यकों पर हुए तथाकथित जुल्म को आगे रखकर लोगों को जमा किया था। प्रश्न यह है कि जिस विषय या घटना को आगे रखकर यह भीड़ जमा की गई क्या वह विषय प्रासंगिक था? स्मरण रहे कि त्रिपुरा की सरकार और स्थानीय प्रशासन ने 29 अक्टूबर को जिम्मेदारी के साथ यह घोषणा की थी कि जिस मस्जिद के जलाए जाने की अफवाहें उड़ाई गई हैं उस मस्जिद को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ है और ये अफवाह झूठी थी। 29 अक्टूबर और 12 नवंबर के बीच इस लंबे अंतराल में रजा अकादमी के लिए यह समझना क्या वाकई मुश्किल था कि त्रिपुरा में अल्पसंख्यकों पर हुए जुल्म की अफवाह झूठी है? क्या अकादमी के लिए त्रिपुरा सरकार की घोषणा पर विश्वास न करने का कोई कारण था?

प्रश्न यह है कि त्रिपुरा सरकार और स्थानीय प्रशासन की घोषणा के बाद इस भीड़ को जमा करने का क्या तुक था? जब देश एक महामारी से दो-चार हो रहा है तब प्रशासन को ज्ञापन देने के लिए आठ हज़ार लोगों को जमा करना किस हद तक तार्किक है? और यदि रजा अकादमी ने ऐसा कुछ करने की घोषणा कर भी दी थी तो महाराष्ट्र सरकार और इन जिलों में स्थानीय प्रशासन ने बातचीत करके इस भीड़ को जमा होने से रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया? स्थानीय स्तर पर रजा अकादमी जैसे संगठन से सामयिक और उचित प्रश्न पूछना इतना दुर्लभ क्यों है? या फिर स्थानीय प्रशासन के लिए ऐसा करना कहीं इसलिए तो मुश्किल नहीं कि अकादमी को किसी तरह का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है?

ऐसे प्रश्नों के पीछे कारण हैं। दरअसल सच यह है कि वर्तमान महाराष्ट्र सरकार रजा अकादमी की जायज़-नाजायज़ माँगों को हाल के वर्षों में लगातार कान देती रही है। अकादमी के लोग मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और अन्य नेताओं से बार-बार मिलते रहे हैं। शायद यही कारण है कि संगठन समय-समय पर किसी न किसी बहाने महाराष्ट्र में अपनी ताक़त दिखाता रहा है। अगस्त 2012 में म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर होने वाले जुल्म को आगे रखकर विरोध के नाम पर जमा भीड़ ने कैसे आज़ाद मैदान में दंगा किया यह देश को अभी तक याद है। सऊदी अरब में सिनेमा हाल खुलने के विरोध से लेकर फ्रांस के राष्ट्राध्यक्ष के खिलाफ फतवा जारी करने की माँग हो, CAA और NRC का विरोध, COVID प्रोटोकॉल को लचीला बनाकर मस्जिद खोलने की माँग हो या उस दौरान जुलूस निकालने की, यह संगठन हर मुद्दे पर माँगों के बहाने अपनी ताक़त दिखाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता।

यह सरकार द्वारा बार-बार माँगे सुनने का असर ही है जो रजा अकादमी के नेताओं को अपनी जायज-नाजायज माँगे बार-बार रखने के लिए प्रेरित करता है। वैसे संगठन का नाम इसके अकादमिक संगठन होने का आभास देता है पर सच यह है कि इसके द्वारा जमा की गई भीड़ ने समय-समय पर जिस तरह का आचरण किया है उससे निपटना सरकार और प्रशासन के लिए चुनौती साबित हुआ है। शायद यही कारण है कि संगठन बार-बार सरकार की बाँह ऐंठने में कामयाब होता दिखाई देता है। पर प्रश्न यह है कि इन सब के बीच कानून और संवैधानिक व्यवस्था तथा सांप्रदायिक वातावरण का भविष्य कैसा दिखाई देता है? यह ऐसा प्रश्न है जो महाराष्ट्र की राज्य सरकार से इसलिए किया जाएगा क्योंकि वह बार-बार इसके आगे लाचार दिखाई देती रही है।

इस प्रश्न का उत्तर संवैधानिक और कानून व्यवस्था का भविष्य तय करेगा।

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