नाम: राहुल गाँधी, कमजोरी: गणित, परिणाम: कॉन्ग्रेस की पीसी में बीसी

फ़ोर्ब्स की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 18 करोड़ परिवार ऐसे हैं जिनमें ‘प्राइम अर्नर’ (जिसकी आय पर परिवार आश्रित है) की मासिक आय ₹5,000 से कम है। यानी, लगभग 90 करोड़ लोग ऐसे हैं जो राहुल गाँधी जी की गरीबी वाले दायरे में आएँगे।

राहुल गाँधी जब आईना देखते होंगे तो भ्रम में पड़ जाते होंगे कि उनके जिन डिम्पलों की दीवानी आम जनता और चरमसुख पाते बुद्धिजीवी हैं, उनकी संख्या कितनी है। उनकी गिनती और गणित पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ये बात और है कि आदमी ख़ुमारी में हो तो बहुत कुछ याद न रहे, सर दर्द करता हो, दोस्तों से नींबू उधार माँगा जा रहा हो, और जो बोला जा रहा हो, वो एक उदास चेहरे के साथ बोला जाता हो, लेकिन क्यूट चेहरे के साथ कोई राफेल का दाम ₹1600 से ₹1600 करोड़ तक ले जाए, तो लगता है कि गलती कहीं और है।

राहुल गाँधी पैदाइशी नेता हैं, जिनकी कुंडली में बहुत कुछ लिखा हुआ है। शायद यही कारण है कि वो कुछ भी बोलकर निकल लेते हैं, और कॉन्ग्रेस का खड़ाऊँ सर पर लेकर घूमने वाले चाटुकार नेता-प्रवक्ता-पूर्व मंत्री आदि उनकी मूर्खता को जस्टिफाय करने के लिए प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते हैं। राफेल पर उन्होंने इतनी बार ग़लतियाँ की कि अब वो स्वयं ही इस पर चर्चा नहीं करते। वैसे, ऑपइंडिया ने उनकी राफेल डील के पीछे पड़ने की असली वजह बता दी थी, तभी से वो शांत पड़ गए थे। 

इंदिरा गाँधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का जादुई नारा दिया था और सत्ता में आ गई थीं। फिर कॉन्ग्रेस ने लगातार देश के एक बड़े तबके को वित्तीय व्यवस्था से जानबूझकर दूर रखा, ताकि उनकी माँ-सास-दादी के इस कालजयी नारे को उनकी याद में ज़िंदा रखा जा सके। फिर लगातार कॉन्ग्रेस ने ग़रीबों को गरीब रखा। 

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आजकल, कॉन्ग्रेस के बाकी मोहरे पिट जाने के बाद चिरयुवा अध्यक्ष को ग़रीबों की याद फिर से आई है। और जब याद आई है, तो प्रेस को बुलाकर कुछ भी बोलकर राहुल गाँधी चले आए। राहुल गाँधी ने कह दिया कि अगर उनकी सरकार बनी तो वो देश के सबसे ज़्यादा ग़रीब 20% परिवारों को ₹72,000/वर्ष की आमदनी सुनिश्चित करेंगे। सुनने में ये बात लाजवाब लगती है, लेकिन इंदिरा-राजीव-मनमोहन के 30-35 सालों के कार्यकाल के बाद भी भारत में कितने लोग गरीब हैं, ये सुनकर आपके होश उड़ जाएँगे। उस पर चर्चा थोड़ी देर में। 

राहुल ने जब यह बोल दिया, और फिर कैलकुलेटर लेकर चिदम्बरम सरीखे जानकार लोग बैठे तो पता चला कि आलू से सोना भी बनने लगे, हर खेत में फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर, उसकी छतों पर भी खेती की जाए, फिर भी इतना पैसा पैदा करना नामुमकिन हो जाएगा। पैसा पैदा ही करना होगा क्योंकि सब्सिडी समेत कई जन-कल्याणकारी योजनाओं के कारण भारत का फिस्कल डेफिसिट लगभग तीन प्रतिशत रहता ही है। जिसका सीधे शब्दों में अर्थ है कि भारत कमाता सौ रुपए हैं, और ख़र्च ₹103 करता है। इसके ऊपर अगर और फ्री पैसे बाँटने की बात की जाए, तो उसका दबाव और बढ़ेगा।

इस सूचना के साथ यह भी बताया गया कि ये एक ‘टॉप अप’ सुविधा होगी जहाँ परिवारों की आमदनी ₹72,000/वर्ष करने की कोशिश होगी। इसका मतलब है कि अगर आपकी आमदनी प्रतिवर्ष 50,000 है, तो आपको ऊपर से ₹22,000 मिलेगा। इसके बाद कॉन्ग्रेस के डेटा एनालिटिक्स डिपार्टमेंट के प्रवीण चक्रवर्ती ने बताया कि ये टॉप अप नहीं है, नीचे के 20% परिवारों को इतना पैसा मिलेगा ही। प्रवक्ता रणदीप सूरजेवाला ने भी यही बात कही, और कहते-कहते यह भी कह गए कि यह महिलाओं के खाते में जाएगा। 

मालिक कुछ बोलकर निकल लिए, कर्मचारी अलग बोल रहे हैं, चाटुकार उसमें नई बात जोड़ रहे हैं। ये सब तो कॉन्ग्रेस में होता रहता है। लेकिन, ये जो बीस प्रतिशत की बात हुई है, वो किस आधार पर हुई, ये किसी को नहीं पता। जब आप भारत के आँकड़े देखेंगे तो ये ₹12,000/महीने की आय वाले दायरे में कितनी बड़ी जनसंख्या आती है, यह जानकर आपका माइंड इज़ इक्वल टू ब्लोन हो जाएगा। मने, दिमाग ब्रस्ट कर जाएगा। 

वर्ल्ड इनिक्वालिटी डेटाबेस के आँकड़ों के अनुसार भारत में चालीस प्रतिशत जनसंख्या ₹4,000/महीने से कम कमाती है। इसके बाद, अगर माननीय राहुल गाँधी के ₹12,000/महीने की बात की जाए तो भारत की नब्बे प्रतिशत, जी 90%, जनसंख्या उससे कम कमाती है। यह आँकड़ा व्यक्तिगत आय की बात करता है, और हर परिवार से दो लोगों को भी कमाता हुआ माना जाए फिर भी ये जनसंख्या राहुल गाँधी के दायरे से बाहर ही रहेगा।

भारत में औसत मासिक आय

परिवारों की भी बात की जाए तो एक बहुत बड़ा हिस्सा ₹6,000/महीने से कम कमाता है, इसलिए यह कहना कि इस 20% परिवारों को पैसे देने की स्कीम के बाद कोई भी परिवार उससे कम आय वाला नहीं रहेगा, बेतुका लगता है। 

कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर ‘आशा’ बेचने की कोशिश की है क्योंकि हाल ही में खत्म हुए चुनावों में ‘कर्ज माफ़ी योजना’ की बात एक वोट लाने वाली योजना की तरह फलित होती दिखी। इसलिए, इस तरह की बात कहकर एक डिबेट शुरु करना कॉन्ग्रेस की नई रणनीति हो सकती है। 

लेकिन यहाँ बात वही है कि पहले कॉन्ग्रेस स्वयं ही इस भ्रम से बाहर निकले कि वो लोग कहना क्या चाहते हैं, और करना क्या चाहते हैं। भारत में ऐसा कोई आँकड़ा इकट्ठा करने की संस्था या तकनीक नहीं है जिससे उन पाँच करोड़ परिवारों का पता लगाया जा सके। सैंपल आधारित सर्वे या जनगणना से आय के बारे में सही डेटा नहीं मिलता।

हमारे पास जो आँकड़े होते हैं, वो ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर के हैं। जो एक व्यवस्थित तरीके से काम करते हैं, और जिनकी आमदनी का पता कम्पनियों के माध्यम से चल सकता है, उन्हीं की जानकारी सरकार को मिलती है। जबकि सत्य यह है कि मज़दूरों, छोटे किसानों, या भयंकर गरीबी झेल रहे परिवारों की स्थिति का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। 

वर्ल्ड बैंक के आँकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 58% जनसंख्या ₹7,000/महीने से कम पर गुज़ारा कर रही है। फ़ोर्ब्स में एडम इन्स्टिट्यूट लंदन के फेलो टिम वोरस्टॉल की (जून 2015) एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 18 करोड़ परिवार ऐसे हैं जिनमें ‘प्राइम अर्नर’ (जिसकी आय पर परिवार आश्रित है) की मासिक आय ₹5,000 से कम है। अगर हम ऐसे परिवारों के सदस्यों की संख्या औसतन पाँच भी रखें, और कमाने वालों में एक और भी जोड़ दें, तो भी यह आँकड़ा राहुल गाँधी के आँकड़े से बहुत दूर नजर आता है।

कॉन्ग्रेस ने यह भी कहा है कि भारत में 22% लोग गरीब हैं, जिनकी गरीबी उनकी सरकार दूर कर देगी। इस आँकड़े और ₹72,000/वर्ष के आँकड़े में कोई सामंजस्य नहीं है।

खैर, हमेशा की तरह कॉन्ग्रेस ने कुछ कहा ही है, इसे ज़मीनी स्तर पर लाया कैसे जाएगा, इस पर कोई विचार नहीं रखा गया। कहते-कहते यह भी कह दिया कि इसमें राज्यों की भी हिस्सेदारी होगी। मतलब, ये सिर्फ योजना बना देंगे, राज्य कितना प्रतिशत पैसा देगा, ये पैसा कहाँ से आएगा, इस पैसे का उपयोग किस मद में होगा, क्या सब्सिडी हटाई जाएगी, क्या लोक कल्याण से जुड़ी योजनाओं से पैसे काटे जाएँगे, इन सब पर तमाम ट्वीट और प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद भी कोई क्लैरिटी नहीं है।

अगर अभी की सरकार की बात करें तो सरकार प्रति व्यक्ति, प्रति वर्ष, कुल ₹1,06,800 रुपए कई सब्सिडी वाली स्कीम के ज़रिए ख़र्च करती है। फिर, अगर कॉन्ग्रेस का गणित देखें तो यह समझ में आता है कि इन्होंने बस शिगूफ़ा छोड़ा है, जोड़-घटाव न इनके अध्यक्ष के वश की बात है, न पार्टी की।

प्रेस कॉन्फ़्रेंस ही जब की गई तो वहाँ इसकी पूरी रूपरेखा पर बात की जाती, जहाँ यह समझाया जाता कि भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति के हिसाब से, अगर मई में इन्हें सत्ता मिल जाती है, तो ये पैसा कहाँ से लाएँगे, ऐसे परिवारों की पहचान किस आधार पर करेंगे, कौन सी संस्था आँकड़े लाएगी, कौन-से स्कीम खत्म किए जाएँगे, कहाँ टैक्स बढ़ाया जाएगा, फिस्कल डेफिसिट का टार्गेट क्या होगा…

लेकिन जो पार्टी अपनी बातें और भविष्य की रूपरेखा बताने की जगह अपने पाँच साल सत्ता को कोसने, नए घोटाले गढ़ने, हिन्दू-मुसलमान की आग लगाने, लोगों को ग़लतबयानी से भरमाने, अपने आप को हिन्दुवादी घोषित करने आदि में झोंक रखा हो, वह पार्टी लोगों को समझाने के लिए गणित और विवेक का प्रयोग कैसे करेगी। उनके लिए तो लोगों को इसी तरह की आसमानी बातें करके बहलाने और झुनझुना पकड़ाने के और कुछ बचा भी नहीं है।

इसलिए, जब मालिक पिछत्तीस बार भी कलाकारी करके निकल जाता है, तो भी गुर्गे सैंपत्तीसवीं बार डैमेज कंट्रोल में तो जुटेंगे ही। इसी कलाकारी को डिफ़ेंड करने की प्रक्रिया को कूल डूडों के शब्दकोश में बीसी कहा गया है। 

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