Wednesday, April 1, 2020
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POJK पर जब पाकिस्तान आक्रामक ढंग से आगे बढ़ रहा था, तब हम कान में तेल डाले सो रहे थे

“लोगों पर हमला नहीं किया जा सकता और उनके गाँवों को जलाकर उन्हें विवश नहीं किया जा सकता। अगर कश्मीर के लोग, चाहे वे मुस्लिम बहुसंख्यक ही क्यों न हो, अगर भारत के साथ अधिमिलन चाहते हैं तो कोई उन्हें नहीं रोक सकता।”

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Devesh Khandelwal
Devesh Khandelwal is an alumnus of Indian Institute of Mass Communication, he is a research scholar and an author. Khandelwal has worked with Dr. Syama Prasad Mookerjee Research Foundation, New Delhi a forum, which facilitates the convergence of ideas, positions, and visions that aspire to strengthen the nation. Devesh has made significant contribution in researching the life of Dr. Syama Prasad Mookerjee and his contributions in the field of education, industry, culture and politics. Part of his research took the shape of a book Pledge for an Integrated India: Dr. Mookerjee in Throes of Jammu-Kashmir (1951-1953) by Prabhat Prakashan (2015). His second book was Ekatma Bharat Ka Sankalp: Dr. Mookerjee and Jammu-Kashmir (1946-1953) in Hindi by Prabhat Prakashan (2018). As a Research Associate with Research & Development Foundation for Integral Humanism, New Delhi, Devesh assisted in compiling and editing the Collected Works of Deendayal Upadhyaya in fifteen volumes, which was released by Honourable President of India, Shri Ram Nath Kovind and Honourable Prime Minister of India, Shri Narendra Modi. In his stint as the Research Fellow with Makhanlal Chaturvedi National University for Journalism and Communication, Bhopal, Devesh worked on Events and Personalities: A Communication Study of Jammu and Kashmir. His research was published by the University under the title An Untold Story _ Hari Singh: The Maharaja of Jammu-Kashmir (1915-1940). He is also associated with Jammu-Kashmir Study Centre, New Delhi and is working on another book on the modern history of Jammu-Kashmir (1925-1965). He is also working as Research Fellow with Vichar Vinimay Nyas, New Delhi.

प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का कार्यकाल जम्मू और कश्मीर के लिए अनेक उतार-चढ़ावों वाला था। एक तरफ कश्मीर घाटी से हिन्दुओं का नरसंहार और निष्कासन लगातार जारी था। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में भारत के खिलाफ आतंकवादियों के प्रशिक्षण की शुरुआत हो चुकी थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान की भाषा को समर्थन मिलने लगा था। साल 1993 में अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट में उप-सहायक सचिव (दक्षिण एशिया) जॉन मैलोट भारत के दौरे पर थे। उन्होंने कश्मीर में भारतीय सेना पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का झूठा आरोप लगा दिया।

यह सोची-समझी साजिशें थीं, जिनकी भूमिका पाकिस्तान के तत्कालीन दो प्रधानमंत्रियों ने लिखी थी। साल 1990 में बेनजीर भुट्टो और फिर 1991-93 के बीच नवाज शरीफ ने पीओजेके के लगातार कई दौरे किए। भुट्टो ने 13 मार्च, 1990 में मुज़फ्फराबाद की एक सभा में भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों का सार्वजनिक समर्थन किया। शरीफ भी पीछे नहीं थे और पीओजेके से ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ जैसे युद्धक नारे लगाने शुरू कर दिए।

अब इस मामले पर तुरंत प्रभावी कार्यवाही की जरूरत थी। इसलिए भाजपा ने प्रमुख विपक्षी दल के नाते केंद्र सरकार पर दवाब बनाना शुरू कर दिया। इसमें कोई दोराय नहीं है कि प्रधानमंत्री राव एक सुलझे हुए व्यक्ति थे। उन्होंने भी समस्या की गंभीरता को समझा और पहला कदम 22 फरवरी, 1994 को उठाया। उस दिन संसद ने पीओजेके पर एक संकल्प पारित किया था। लोकसभा के अध्यक्ष शिवराज पाटिल और राज्यसभा के सभापति केआर नारायणन (भारत के उपराष्ट्रपति) ने जम्मू-कश्मीर राज्य सम्बन्धी इस प्रस्ताव को दोनों सदनों के समक्ष रखा। जिसमें सर्वसम्मति से जोर दिया गया कि पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर के कब्जे वाले इलाकों को खाली करना होगा।

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लगभग साल भर बाद केंद्र सरकार ने पीओजेके को लेकर दूसरा कदम उठाया। साल 1995 में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (जम्मू सहित) और उत्तरी इलाकों (गिलगित-बाल्टिस्तान) पर विदेश मंत्रालय की स्टैंडिंग कमिटी ने संसद में एक रिपोर्ट पेश की। भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी इसकी अध्यक्षता कर रहे थे। इस सर्वदलीय कमिटी में लोकसभा और राज्यसभा से 45 सदस्यों को शामिल किया गया था, जिन्होंने दोहराया कि पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। साथ ही कमिटी ने सुझाव दिया कि पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान में मानवाधिकारों के हनन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष आवाज़ उठाई जानी चाहिए।

यह दोनों अभूतपूर्व कदम थे, जोकि सालों पहले ही उठा लिए जाने चाहिए थे। दरअसल पिछले तीन दशकों से यह मुद्दा केंद्र सरकारों की प्राथमिकता में शामिल नहीं था। इस बीच पाकिस्तान ने मनगढ़ंत कहानियाँ बनानी शुरू कर दीं। इसके जिम्मेदार पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे। इस दास्ताँ की शुरुआत 30 अप्रैल, 1962 को होती है। राज्यसभा में अटल बिहारी वाजपेयी (उन दिनों जनसंघ) ने पीओजेके पर प्रधानमंत्री से जवाब माँगा। हालाँकि, जवाब विदेश राज्य मंत्री लक्ष्मी मेनन ने दिया। वाजपेयी ने फिर से प्रधानमंत्री की तरफ इशारा किया और तब प्रधानमंत्री नेहरू खड़े हुए। आखिरकार, उन्होंने पाकिस्तान के साथ बातचीत करने की बात कहकर मुद्दे को टाल दिया।

जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया ने भारतीय हितों को नुकसान पहुँचाया है। जबकि जम्मू-कश्मीर भारत का एक आंतरिक मामला है, जिस पर भारत की संसद ही फैसला कर सकती है। प्रधानमंत्री नेहरू अपनी ‘बातचीत’ की नीति पर काबिज रहे और साल 1964 में शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान भेजा। उनकी मुलाकात पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान से हुई। इस पूरे दौरे में उनेक साथ गुलाम अब्बास भी मौजूद थे। अब्बास को ही पाकिस्तान ने ‘आजाद कश्मीर सरकार’ का मुखिया घोषित किया था। इन बातचीतों का कोई ठोस फायदा हुआ नहीं और होना भी नहीं था। इसी बीच प्रधानमंत्री नेहरू का निधन हो गया और शेख दिल्ली लौट आए।

यही एक ‘बातचीत’ असफल नहीं हुई, इसके बाद कई दौर की मुलाकातें भी बेनतीजा रहीं। फिर भी अगली सरकारों ने इस टालमटोल को जारी रखा। इसका एक उदाहरण प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के समय विदेश राज्य मंत्री बीआर भगत ने पेश किया। साल 1968 में जनसंघ के राज्यसभा सदस्य निरंजन वर्मा (मध्य प्रदेश) ने प्रधानमंत्री से सवाल किया, “जम्मू तथा कश्मीर के जिस भाग पर पाकिस्तान ने बलात कब्जा कर लिया था और जिसे पाकिस्तान सरकार ने आजाद कश्मीर की संज्ञा दी थी, उस भाग को वापस लेने के लिए भारत सरकार ने अब तक क्या कार्यवाही की है?” भगत ने जवाब दिया, “सरकार को उससे अधिक और कुछ नहीं कहना है जो स्वर्गीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राज्य सभा में 30 अप्रैल, 1962 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा पूछे गए प्रश्न संख्या 129 के पूरक प्रश्नों के दौरान कहा था।”

हालाँकि, इस दौर में एक बार ऐसा मौका आया जब महसूस किया गया कि भारत ने पीओजेके के मुद्दे पर प्रभावी तरीके से अपनी बात रखी है। यह बात 1975 की है, जब शेख अब्दुल्ला श्रीनगर के लालचौक पर एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। चमत्कारिक तौर पर उनके भाषण का केंद्रबिंदु पीओजेके था। आमतौर पर शेख की नीतियों में कोई प्रभाव नज़र नहीं आता है और हमेशा वे पीओजेके पर बात करने से बचते रहे हैं। लेकिन इस बार उनका यह भाषण मात्र एक कारण से महत्वपूर्ण बन गया, क्योंकि 28 सालों (1947 से) बाद उन्होंने पहली बार सार्वजानिक मंच से पीओजेके पर चर्चा की थी।

शुरुआत से ही अगर भारत सरकार ने पीओजेके पर गंभीरता से रुख किया होता, तो आज इतिहास कुछ अलग ही होता। जिस दिन कश्मीर रियासत का भारत के साथ अधिमिलन हुआ, उसी दिन महात्मा गाँधी ने पीओजेके पर एक बात कही, वह इस प्रकार थी, “जो कुछ भी कश्मीर में हो रहा है, मुझे उसकी जानकारी है। पाकिस्तान कश्मीर को अपने मुल्क में मिलाने का दवाब बना रहा है। ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी से जबरदस्ती कुछ भी लेना संभव नहीं है।” यह उन्होंने तब कहा जब पाकिस्तान की सेना जम्मू-कश्मीर पर हमला कर चुकी थी। गाँधी जी ने आगे कहा, “लोगों पर हमला नहीं किया जा सकता और उनके गाँवों को जलाकर उन्हें विवश नहीं किया जा सकता। अगर कश्मीर के लोग, चाहे वे मुस्लिम बहुसंख्यक ही क्यों न हो, अगर भारत के साथ अधिमिलन चाहते हैं तो कोई उन्हें नहीं रोक सकता।”

महात्मा गाँधी की सलाह को प्रधानमंत्री नेहरू ने अनदेखा किया। शेख ने भी अपनी बात रखने में बहुत वक्त लगा दिया। वास्तव में तो प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से पहले ही पीओजेके को वापस लेने के लिए भारत सरकार को अपनी नीतियाँ स्पष्ट कर देनी थीं। हालाँकि कुछ भरपाई प्रधानमंत्री नरसिम्हा ने की, लेकिन अभी बहुत कुछ होना बाकी है। अंत में, हमें महात्मा गाँधी द्वारा एक प्रार्थना सभा में दिया गया कथन हमेशा याद रखना चाहिए। उन्होंने 16 जुलाई, 1947 को कहा था कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी के मध्य रहने वाले सभी भारतीय नागरिक हैं।

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