रागा का रा-फेल राग: नशे-सी चढ़ गई ओए…

अब बच गया राफेल और राहुल की पुरानी स्क्रिप्ट के वो पन्ने जिन्हें जीन्स की पिछली जेब में लेकर घूमने से उनकी रीढ़ टूट चुकी है। और जब किसी की रीढ़ टूट चुकी हो तो वो अपने मालिक की कितना ढोएगा, ये समझना बहुत मुश्किल नहीं।

राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस किया। हालाँकि, प्रोपेगेंडा में लिप्त, चोरों के सहारे ‘बड़ी ख़बर’ मैनुफ़ैक्चर करने वाले ‘द हिन्दू’ की साख लगातार गिरती ही जा रही है, लेकिन कॉन्ग्रेस वाले उसकी ख़बर की फ़ोटोकॉपी करके प्रेस कॉन्फ़्रेंस में लहराने से बाज़ नहीं आते। पिछली बार ‘द हिन्दू’ के एन राम ने राफेल को लेकर जो ‘सबूत’ दिए थे, उसे जानबूझकर काट कर पेश किया था ताकि रक्षा मंत्रालय पर सवाल उठे। लेकिन आधे घंटे में पूरी, बिन कटी, तस्वीर आ गई और एन राम का स्तर गिरकर उत्तर भारत के लोकप्रिय अश्लील साहित्य के लेजेंड मस्त राम जितना हो गया।

पिछली ग़लतियों से सीखे बिना, एन राम ने कल राफेल पर ‘नया ख़ुलासा’ किया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस रिपोर्ट पर भी कुछ निकल कर नहीं आएगा क्योंकि जिस तरह से रिपोर्ट लिखी गई है, उसकी क्लिष्टता से तो यही लगता है कि लिखने वाले ने भ्रमित करने की कोशिश की है। दूसरी बात यह भी है कि जब तक पूरी रिपोर्ट सामने न हो, कुछ हिस्सों को संदर्भ से बाहर निकालकर रखना, देशहित नहीं, डूबते अख़बार को चर्चा में रखने भर का ज़रिया है।

आप यह देखिए कि ऐसी रिपोर्ट कब आती है। राफेल पर रिव्यू पेटिशन पर कल ही सुनवाई होनी थी, और ‘द हिन्दू’ की रिपोर्ट भी उसी दिन आई। उसके बाद क्या हुआ? उसके बाद गिरोह के वकील, प्रशांत भूषण, अख़बार की कतरन को सबूत के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में ले गए, जहाँ सुनवाई का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर बर्बाद हुआ कि इस ‘नए सबूत’ को शामिल किया जा सकता है, या नहीं।

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आपको लगेगा कि ये सामान्य सी बात है, जबकि ऐसा है नहीं। यही काम इसी गिरोह ने अयोध्या मामले में किया जब वो नया एंगल ले आए कि ‘मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग है’, और इस पर खूब समय बर्बाद किया गया। ये मरे हुए घोड़े को ज़िंदा रखने का पुराना तरीक़ा है जिसमें वामपंथी गिरोह को महारत हासिल है। 

कोर्ट के सामने सरकार का पक्ष रखने वाले वकील ने कोर्ट को याद दिलाया कि अगर ये तथाकथित सबूत, जो चोरी से रक्षा मंत्रालय से उड़ाए गए हैं, पब्लिक में आते हैं, तो इसका मतलब भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करना होगा। कारण यह है कि जब दो देश ऐसे समझौते करते हैं तो उनकी कई शर्तें गोपनीय होती हैं, और जब रक्षा मंत्रालय के दस्तावेज चोरी हो रहे हैं, तो कल को राफेल से संबंधित तकनीकी बातें भी पब्लिक में आ सकती हैं, और इससे भविष्य में होने वाले तमाम समझौतों पर असर पड़ेगा। 

‘द हिन्दू’ की टाइमिंग, उनके पास के तथाकथित सबूतों की कतरनें, और उनका प्रयोग एक खास गिरोह द्वारा होना, यह बताता है कि विपक्ष के पास अगर मुद्दा न हो, तो वो किस हद तक जा सकते हैं। एन राम ने अपनी पिछली करतूत के लिए पाठकों से माफ़ी नहीं माँगी है कि आधी तस्वीर क्यों छापी थी। कल को जब ये रिपोर्ट भी वैसी ही साबित होगी, तब भी ये माफ़ी नहीं माँगेंगे क्योंकि इनका काम है आरोप लगाकर गायब हो जाना।

राहुल गाँधी और उनकी पार्टी अब ऐसे ही धंधेबाज़ और अस्तित्व को बचाने के लिए कुछ भी लिखने वाले अख़बारों पर निर्भर है। इसीलिए, उधर रिपोर्ट छपती है, इधर प्रेस कॉन्फ़्रेंस होती है। राहुल गाँधी राफेल पर आज तक 30,000 करोड़ अम्बानी को दे दिए कहते फिर रहे हैं, उधर अम्बानी की कम्पनी दिवालिया हो रही है। अगर मोदी इस तरह का दोस्त है, तो अम्बानी जैसे लोगों को समझना चाहिए कि कैसे दोस्त बनाने चाहिए! 

लेकिन राहुल गाँधी तो राहुल गाँधी हैं, उन्हें सत्य से क्या! जैसे एक नशेड़ी दीन-दुनिया से बेख़बर रहता है, और अचानक से कुछ बोल पड़ता है, या बार-बार एक ही बात बोलता है, वैसे ही राहुल गाँधी भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल में कुछ न पाने के बाद, संसद में निर्मला सीतारमण, अरुण जेटली से लेकर तमाम लोगों द्वारा घंटों चर्चा के बाद भी, इन सब बातों से परे, लगातार एक ही बात रटे जा रहे हैं।

अब उनके ये ‘खुलासे’ इतने बोरिंग हो गए हैं कि न्यूज रूम में ये सोचना पड़ता है कि इस पर अब कैसे लिखा जाए, क्योंकि ये आदमी तो लगातार एक ही बात बोलता है। 

कॉन्ग्रेस की हालत पिछले 14 फ़रवरी के पुलवामा हमलों के बाद ऐसी हो गई है जैसे उनकी पूरी योजना की फ़ाइल किसी ने हाथ से खींच ली हो। प्रियंका की धमाकेदार लॉन्च हुई, रैलियों का प्रोग्राम बना, फिर उसमें राहुल की छवि बेहतर करने के लिए और लोग आए… ये सब चल ही रहा था कि अचानक से स्थिति में बदलाव आया। 

यहाँ कॉन्ग्रेस ने जो लाइन पकड़ी, उससे इन्हें दो तरह से नुकसान हुआ। पहले तो साथ खड़े हुए क्योंकि राजनैतिक दूरदर्शिता यही माँग रही थी। लेकिन दिन भर के बाद ही इनके नेताओं ने उल्टी-सीधी बातें करने में समय लगाना शुरू किया, और जो कैपिटल ये बना रहे थे, वो हाथ से जाता रहा। फिर एयर स्ट्राइक हुए तब तक कॉन्ग्रेस ‘मोदी रैलियाँ कर रहा है’ वाली बात को इतनी बार बोल गई कि उनकी अपनी रैलियों के करने पर भी सवाल उठ जाते।

बहरहाल, हुआ यह कि मोदी ने सेना को अपना काम करने दिया, और खुद अपना काम करते रहे। कॉन्ग्रेस ने एयर स्ट्राइक पर सबूत माँगने से लेकर, अपने नेताओं के मुँह बद करने में नाकामी दिखाई, और स्वयं भी पार्टी के तौर पर ऐसा कुछ नहीं किया कि मोदी या भाजपा को घेर सके, तो इन्होंने जो कोशिश की थी, वो नाकाम हो गई। 

पुलवामा और एयर स्ट्राइक पर सरकार को घेरने की जगह, कॉन्ग्रेस अगर उन चालीस जवानों के घर राहुल-प्रियंका को भेज देती, बीस दिन भी लग जाते, तो अभी तक उनकी स्थिति मजबूत रहती। उनके पास सरकार और मोदी पर ये सवाल पूछने का पूरा हक़ होता कि ‘हम तो परिवारों से मिल रहे हैं, आप रैलियाँ कर रहे हो’। लेकिन कॉन्ग्रेस यहाँ भी मात खा रही है, और अब उन्हें क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन के नाम पर दो और तीन सीटों का प्रस्ताव मिल रहा है। 

फिर अब बचा क्या? बच गया राफेल और राहुल की पुरानी स्क्रिप्ट के वो पन्ने जिन्हें जीन्स की पिछली जेब में लेकर घूमने से उनकी रीढ़ टूट चुकी है। और जब किसी की रीढ़ टूट चुकी हो तो वो अपने मालिक की कितना ढोएगा, ये समझना बहुत मुश्किल नहीं।

अब राहुल वापस उसी काग़ज़ के टुकड़े से कई काम लेते हैं। दीन-दुनिया से बेख़बरी की दवाई भी उसी काग़ज़ पर रखकर तैयार होती है, स्पीच भी उसी काग़ज़ से पढ़कर देना है, बाद में आँसू भी उसी से पोंछना है। कभी-कभी तो दया आती है इस व्यक्ति पर, लेकिन फिर वो ख़ूनी, लुटेरा पंजा दिखता है भारतीय तिरंगे के तीन रंगों के साथ।

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