Tuesday, October 26, 2021
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आदिवासी प्रेमी राहुल गाँधी, 1966 में मिज़ोरम पर बम किसने बरसाए थे याद है?

राहुल गाँधी जी जिस केयरफ़्री एटीट्यूड के साथ यह बोल गए कि कानून में लिखा है कि आदिवासियों को मारा जा सकता है, वो अक्षरशः सही हैं क्योंकि उनके पास उनकी दादी की कानून की किताब होगी जिसे उन्होंने कई बार अपने हिसाब से लिखा था।

राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष हैं, सोनिया गाँधी के पुत्र हैं, राजीव गाँधी के भी पुत्र हैं। किसी के भाई, किसी के साले, किसी के पोते और किसी के परनाती भी हैं। बचपन, किशोरावस्था और जवानी के बारे में देश को बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं है। हालाँकि, उनके पिछले पाँच सालों का, और उनमें से भी पिछले तीन सालों का लेखा-जोखा इंटरनेट के पास है।

इन तीन सालों में राहुल गाँधी ने रैलियों में बोलना सीखा, और बोलने की आदत डाली, और फिर बड़बड़ाने लगे। बोलना सही बात है। बोलने से पता चल जाता है कि कौन गुजरात की महिलाओं को कहाँ का मजा देने की बात कर सकता है। बोलने से पता चल जाता है कि आप हर प्रश्न का जवाब वूमन इम्पावरमेंट कह कर दे सकते हैं। बोलने से पता चल जाता है कि आपके मस्तिष्क में जो सत्तर प्रतिशत ऑक्सीजन जा रहा है, वो किस कार्य के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

हाल ही में पत्रकारिता के स्वघोषित मानदंड ने सवाल उठाया था कि आखिर मोदी ही क्यों इंटरव्यू दे रहे हैं, बाक़ियों का इंटरव्यू क्यों नहीं दिखाती मीडिया। राहुल ने 2014 में इंटरव्यू दिए थे, फिर पता चला कि ऐसे धुरंधर और प्रखर नेता को सवाल चाहे पहले दे दीजिए, या बाद में, ये दाढ़ी बना कर आएँ या सॉल्ट एंड पेपर लुक में, इन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता।

राहुल गाँधी व्यक्तित्व नहीं, एक मानसिक अवस्था है। कभी-कभी व्यक्ति व्यक्तिवाचक संज्ञा से ऊपर उठ कर जातिवाचक संज्ञा हो जाता है, और उनमें से राहुल गाँधी जैसे महज़ चंद लोग ऐसे होते हैं जो व्यक्ति होते हुए भी विशेषण बन जाते हैं। राहुल गाँधी हमारे युग में एक केस स्टडी हैं जिसे भारत के आम चुनावों की ही तरह, विदेशी शिष्टमंडलों को आकर देखना चाहिए कि दुनिया को लोकतंत्र देने वाले देश के आधुनिक डेमोक्रेसी की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष कौन है, और उससे भी बड़ी बात कि वो क्या है!

हाल ही में एक रैली में राहुल गाँधी ने बताया कि सरकार ने एक कानून बनाया है जिसमें ये लिखा हुआ है कि आदिवासी को सरकार मार सकती है। यूँ तो राहुल गाँधी का मानसिक स्तर इतना ग़ज़ब का है कि वो आदिवासियों की यह बात गैरआदिवासी क्षेत्र में भी कह सकते हैं, लेकिन बेनेफिट ऑफ डाउट देते हुए मैं यह मान लेता हूँ कि यह डर उन्होंने किसी आदिवासी बहुल क्षेत्र की रैली में ही दिखाया होगा।

ज़ाहिर तौर पर यह बात इतनी ज़्यादा गलत है कि आप इसे सिरे से नकार देंगे। लेकिन हम उस भारत के नागरिक हैं जहाँ पिछले साल की अप्रैल में व्हाट्सएप्प पर फैलाए गए अफ़वाह को ‘टाइप किया हुआ है, तो सच ही होगा’ मान कर ऐसा हिंसक आंदोलन हुआ कि सामाजिक न्याय की बलि 12 लोग चढ़ गए। इसलिए, ऐसी बातों को नकारना नहीं चाहिए। ऐसी बातों पर प्राइम टाइम टीवी पर डिबेट होना चाहिए कि ये व्यक्ति आखिर रैलियों में क्या बोलता है, क्यों बोलता है!

लेकिन प्राइम टाइम नहीं होगा क्योंकि सारे प्राइम टाइम पर मोदी की रैली आती है, और जिस एक जगह पर नहीं आती उस पर यह विलाप होता है कि बाकी सब पर मोदी ही क्यों आ रहा है। कुल मिला कर मीडिया में कॉन्ग्रेस तंत्र को अपनी रक्त-मज्जा और ढाँचे से पूजने वाले लोग अपने प्रियतम नेता की करतूतों को ऐसे ही जाने देते हैं।

1966 का एक क़िस्सा याद आता है। इंदिरा गाँधी नई-नई प्रधानमंत्री बनी थी, और भारत के उत्तरपूर्व में विद्रोह हो गया। मिज़ोरम में मिजो नेशनल फ़्रंट ने असम रायफ़ल्स के सैन्य ठिकानों पर हमला बोल दिया और मार्च 1, 1966 को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। इंदिरा गाँधी ने देश के इतिहास में पहली बार, और अब तक आख़िरी बार, अपने ही नागरिकों पर, अपनी सीमा के भीतर एयरफ़ोर्स से बॉम्बिंग कराई।

मिज़ोरम में आदिवासी रहते हैं कि नहीं, ये आप लोग पता कर लीजिएगा। हम इस पर चर्चा कर सकते हैं कि उग्रवादियों ने सैन्य ठिकानों पर हमला किया था, और उनको दबाना ज़रूरी था। लेकिन, क्या वही एक रास्ता था मिसेज़ गाँधी के पास? क्या उसमें सिविलियन्स नहीं मरे? क्या आर्मी की मदद से एक छोटे इलाके की स्थिति नियंत्रण में नहीं लाई जा सकती थी? क्या अपने ही नागरिकों पर देश की एयरफ़ोर्स को हमला करने को मजबूर करना वैसा ही एकमात्र उपाय तो नहीं था जैसा कि इमरजेंसी?

राहुल गाँधी को ये बात याद नहीं होगी क्योंकि उनका दिमाग फेफड़ों द्वारा लिए गए 70 प्रतिशत ऑक्सिजन को अपने बालों द्वारा उत्सर्जित कर देता है, न कि न्यूरॉन्स की द्रुत हलचल के लिए इस्तेमाल में लाता है। अगर याद हो तो आदिवासियों के इलाकों में नक्सलियों की खूब पैठ थी। राजनाथ सिंह ने बिना सिविलियन्स को अपने ही सुरक्षा बलों की गोलियों का शिकार बनाए लगभग 30 जिलों में समेट दिया।

इसके लिए नक्सल आतंकियों को मुख्यधारा में लाने के द्वार खुले रखने के साथ, उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब देने और उन इलाकों में विकास का रास्ता अख़्तियार करने की नीति अपनाई गई। परिणाम सामने थे कि नक्सली हिंसा में लगभग 60% की गिरावट आई। ये समझना मुश्किल नहीं है कि सरकार के पास सारे तरीके होते हैं लेकिन आपका चुनाव आपको समय की नजर में सही या गलत ठहराता है।

तो, राहुल गाँधी जी जिस केयरफ़्री एटीट्यूड के साथ यह बोल गए कि कानून में लिखा है कि आदिवासियों को मारा जा सकता है, वो अक्षरशः सही हैं क्योंकि उनके पास उनकी दादी की कानून की किताब होगी जिसे उन्होंने कई बार अपने हिसाब से लिखा था। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई ऐसी बातें की थीं, जो नैतिकता की परिभाषा से बाहर थी, और जिन बातों के होने की फर्जी आशंका पर राहुल और उनका गिरोह हर तीसरे दिन आपातकाल लाता रहा है।

राहुल गाँधी आखिर इतना सहज कैसे होते हैं?

इतनी सहजता से झूठ बोलना और मुस्कुरा देना दो तरह के ही लोग कर सकते हैं: मूर्ख या धूर्त। राहुल गाँधी बहुत कुछ हैं लेकिन मैं उन्हें धूर्त तो नहीं ही मानूँगा, क्योंकि धूर्त होने के लिए पढ़ा-लिखा और समझदार होना आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर आप राजदीप सरदेसाई को धूर्त कह सकते हैं, रवीश कुमार को धूर्त कह सकते हैं, अरविन्द केजरीवाल को धूर्त कह सकते हैं, शेखर गुप्ता को धूर्त कह सकते हैं। उस लिहाज से राहुल गाँधी बहुत कुछ हैं, लेकिन मैं उन्हें मूर्ख ही मानूँगा।

मूर्खता के साथ सहजता बिना किसी प्रयास के ही आ जाती है। आप अगर मूर्ख नहीं होंगे तो आप राफेल का दाम, दस अलग-अलग रैलियों में 526 रुपए से 700 करोड़ रुपए तक नहीं बोलेंगे! मूर्ख को अपनी मूर्खता पर सबसे ज़्यादा विश्वास होता है, बजाय दूसरों की समझदारी पर। मैं जानता हूँ कि उन्हें जो स्क्रिप्ट लिख कर दिया जाता होगा, उस पर दाम सही लिखा रहता होगा। लेकिन रिलक्टेंट पोलिटिशियन राहुल गाँधी फ्लो में बोल जाते हैं और उनके इसी बोलने पर पत्रकारिता के समुदाय विशेष के कई माननीय सदस्य कहते हैं, “अगर वो बोल ही रहे हैं, तो जाँच करवाने में क्या समस्या है?”

राहुल के लगातार बोले जाने वाले झूठ

मैं बस दो पैराग्राफ़ में राहुल गाँधी द्वारा बोले गए कुछ झूठों की याद दिलाना चाहूँगा। कुछ प्रमुख झूठ हैं: मोदी अर्धसैनिक बलों को शहीद का दर्जा नहीं दे रहा, जबकि शहीद का दर्जा जैसी कोई बात होती ही नहीं। मोदी मनरेगा को बर्बाद कर रहा है, जबकि मनरेगा में सबसे ज़्यादा पैसा इसी सरकार ने दिया। मोदी सरकार घृणा फैलाती है, जबकि उनके अपने विधायक माइक लेकर गुजरात में बिहारियों को मारने की बातें करते पाए जा चुके हैं, और भारत के तमाम सबसे बड़े दंगों का ख़ून कॉन्ग्रेस के ही पूरे देह पर है। उन्होंने संसद में कहा कि मिराज 2000 HAL ने बनाया, जबकि ये कोरी बकवास है। राफेल पर उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने एयरफ़ोर्स से सलाह नहीं ली और रिलायंस को 30000 करोड़ दे दिए गए, ऐसी कोई बात नहीं है। पेरियार की मूर्ति टूटी तो भाजपा और संघ के नाम आरोप लगाया, जबकि नशे में धुत्त एक सीआरपीएफ़ जवान ने यह कार्य किया था। सरदार पटेल की मूर्ति को उन्होंने मेड इन चायना बताया था जबकि यह झूठ 2015 में ही नकारा जा चुका था।

उसके बाद, हाल ही में सिर्फ एक रैली में उन्होंने दस झूठ बोले जिनमें राफेल, मिग 21 HAL ने बनाया था, मनरेगा मोदी ने बर्बाद किया, उद्योगपतियों का 3.5 लाख करोड़ लोन माफ किया, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में दो दिन में किसानों का ऋण माफ किया गया, जेटली ने माल्या से मिल कर भागने में मदद की, सीबीआई के चीफ़ को मोदी ने हटवा दिया, जय शाह भाजपा सरकार की मदद से 80 करोड़ हर महीने का व्यवसाय कर रहे हैं! ऐसी ही उत्तरपूर्व के दौरे पर कहा कि मोदी ने उनके लिए कुछ नहीं किया, जबकि वहाँ के राज्य और केन्द्र की कॉन्ग्रेस सरकारों में जितना पिछले सत्तर साल में नहीं किया, उतना मोदी ने अपने कार्यकाल में कर दिया। वहीं, अपनी मूर्खता में बहते हुए उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि उत्तरपूर्व के राज्यों के युवाओं को मोदी सरकार मार रही है। इस पर मैं कोई सफ़ाई नहीं देना चाहता।

मुझे ये सब याद करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यह हर रैली में रिपीट मोड पर चलता रहता है। इस बार कॉन्ग्रेस की योजना पूरी तरह झूठ बोल कर चुनाव जीतने पर ही आधारित है क्योंकि इन्होंने सब्ज़बाग़ दिखाकर राजस्थान और मध्यप्रदेश तो अपने नाम कर ही लिया। ये बात और है कि दोनों जगह की जनता अब तेरह रुपए की ऋणमाफी पाकर, और उन लोगों का नाम लिस्ट में देख कर आश्चर्य में है जो किसान हैं ही नहीं।

जब मूर्खता से भी धूर्तता वाले परिणाम आ जाते हैं

मूर्खतापूर्ण वचन भी कई बार अपेक्षित परिणाम ले आते हैं। राहुल गाँधी के भाषणों के मध्य में वो लोग हैं जिन्हें राहुल गाँधी के परनाना, दादी, पिता और माता ने पीढ़ी दर पीढ़ी पिछड़ा, वंचित और गरीब बनाए रखा। उनकी दुर्बलता या सुभेद्यता का लाभ उठाना कॉन्ग्रेस पार्टी का राजकीय और राष्ट्रीय उद्योग बन गया। चूँकि यही ग़रीब, पिछड़े, वंचित और दुर्बल इल उद्योग के लिए कच्चा माल थे, तो उनकी स्थिति में छेड़छाड़ करना अपने फ़ैक्ट्री पर ताला मार कर लाभ कमाने की उम्मीद रखने जैसा होता।

यहाँ नई सरकार इन्हें घर, सिलिंडर, बल्ब, बिजली, शौचालय, और सड़क के साथ रोजगार के अवसर देकर सबल बना रही है, तो कॉन्ग्रेस के घरेलू उद्योग के रॉ मटीरियल पर कुठाराघात हो रहा है। फ़ंड सूख रहे हैं, पार्टी घाटे में चल रही है। इसलिए, नया पैंतरा है कि जो गरीबी से उबर रहे हैं, या अभी भी गरीब हैं, उन्हें गरीबी में ही रखने की कोशिश करो।

ऐसे लोगों को जब आप यह कह देंगे कि मोदी ने मनरेगा को बर्बाद कर दिया जिससे तुम्हें रोजगार मिलता था, तो वो परेशान हो जाएगा। ऐसे लोगों को आप कह देंगे कि सरकार ने तुम्हारा आरक्षण छीन लिया है, सुप्रीम कोर्ट से कहा कि खत्म हो जाएगा सब, तो वो सड़कों पर आ जाएगा (भले ही उसके हाथ में मशाल और पेट्रोल आप देंगे)। ऐसे लोगों को आप कह देंगे कि सरकार ने कानून बनाया है कि आदिवासी को मार दिया जाएगा, तो वो सोचने लगेगा कि अगर ऐसा कानून नहीं है तो ये आदमी माइक पर बोल कैसे रहा है!

आप रैलियों में ग़रीबों के रोजगार छिनने से झूठ बोलना शुरु करते हो और इस बात पर पहुँच जाते हो कि मोदी तो तुम्हें मारने के लिए कानून लिख चुका है, तो यह मूर्खता ज़रूर है, लेकिन जो वल्नरेबल लोग हैं, दुर्बल हैं, असहाय हैं, पहले से ही सर्वाइवल को लेकर परेशान हैं, वो तो डर ही जाएँगे। और जब वो डर जाएँगे तो किसे वोट देंगे? उसी पार्टी को जिसने उन तक यह सूचना पहुँचाई और ऐसे कानून को मिटा देने का वादा कर रहा है जो है ही नहीं!

क्योंकि महानता थोपी भी जा सकती है

इस बार राहुल गाँधी ने घरवालों की वह सलाह कुछ ज़्यादा ही गम्भीरता से ले ली जिसमें वो स्टेज पर बोलने से डर रहे होंगे, और किसी ने कह दिया होगा, “टेक इट ईज़ी, ब्रुह!” क्योंकि इतनी संजीदगी से अपनी मूर्खता का प्रदर्शन बहुत ही कम लोग करते हैं। रैलियों में तो मुझे याद नहीं है कि कोई ऐसे गम्भीर चेहरे के साथ खेतों में दवाई की फ़ैक्टरी लगाने से लेकर अालू-सोना वाली बात कर सकता हो।

राहुल गाँधी बड़े नेता बना दिए गए हैं। शेक्सपीयर द्वारा लिखे नाटक ‘ट्वैल्फ्थ नाइट’ का एक संवाद याद आता है जब मैलवेलियो महानता के बारे में कहता है, “…be not afraid of greatness: some are born great, some achieve greatness, and some have greatness thrust upon them.”

राहुल गाँधी पैदा तो ग्रेट हुए ही थे, लेकिन उनके बचपन, किशोरावस्था और जवानी के गायब हिस्सों के बाद, लग रहा था कि महानता उनकी पहुँच से बाहर ज रही है, तभी प्रौढ़ावस्था में ग्रेटनेस उन पर थ्रस्ट कर दिया गया कि ‘लो बे, महान बन जाओ। इस महान पार्टी की कमान संभालो जिसने अपने देश के लोगों पर बम बरसाए, सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपने हिसाब से बदला, सत्ता के लिए आपातकाल लाई, पार्टी फ़ंड के लिए जीप से लेकर बोफ़ोर्स और ज़मीन के भीतर के कोयले से लेकर आकाश में उड़ते हेलिकॉप्टर और आयनोस्फेयर के तरंगों तक में अपने महान घोटालों की छाप छोड़ दी है।”

राहुल गाँधी ने कहा, “बट, मम्मी!”

मम्मी ने कहा, “सत्तर साल से जिनको पाला है, वो हमारी फेंकी हड्डियों को चाटेंगे और तुम्हारे गुणगान में लगे रहेंगे। तुम बस महान बनने की औपचारिकताएँ पूरी कर लो। तुम मुस्कुराओ, फटी जेब दिखाओ, जनेऊ पहनो, रामभक्त बनो, शिवभक्त बनो, गोत्र बताओ, आँख मारो, बग़लें झाँकों, हमउम्र नेताओं से पूछो कि क्या बोलना है, रैलियों में हाथ हिलाओ, माइक पर बोलो, जो मन में आए बोलो, कुछ बातें रट लो, हर बार वही बोलते रहो… इतना ही करना है क्योंकि तुम इतने ही करने के लिए बने हो। बाकी काम मीडिया देख लेगी क्योंकि उन्हें हमने सालों देखा हैं।”

 

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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