भारत के लिए 16 दिसंबर 2025 का दिन गर्व का दिन होता है। इसी दिन 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर बांग्लादेश को आजादी दिलाई। लाखों भारतीय सैनिकों की बहादुरी और मुक्ति बहिनी के साथ मिलकर 13 दिन की जंग में 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का समर्पण कराया। ढाका में जनरल नियाजी ने भारतीय कमांडर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने हथियार डाले। यह जीत सिर्फ युद्ध की नहीं, मानवता की थी, जिसमें पाकिस्तानी फौज के अत्याचारों से बंगाली लोगों को मुक्ति मिली।
लेकिन 54 साल बाद अब बांग्लादेश फिर उन कट्टरपंथी ताकतों के चंगुल में फँसता दिख रहा है, जिन्होंने 1971 में पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात-ए-इस्लामी.. जो तब बांग्लादेश के जन्म का विरोध कर रही थी, आज फिर सिर उठा चुकी है। भारत ने जिस देश को आजाद कराया, वहाँ हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले, मंदिर तोड़े जाना और इस्लामी चरमपंथ की वापसी को देखना बेहद दर्दनाक है।
…भारत ने दिलाई थी बंगभाषियों को आजादी
1971 की जंग की जड़ें गहरी थीं। पाकिस्तान में पश्चिमी हिस्से का पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) पर दबदबा था। बंगाली भाषा, संस्कृति को दबाया जा रहा था। 1970 के चुनाव में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने भारी जीत हासिल की, लेकिन पाकिस्तान ने सत्ता नहीं सौंपी। 25 मार्च 1971 को ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू हुआ- पाक फौज ने बंगालियों पर कहर बरपाया। लाखों मारे गए, महिलाओं पर अत्याचार हुए, करोड़ों शरणार्थी भारत आए।
भारत ने मुक्ति बहिनी को ट्रेनिंग दी, हथियार दिए। 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, तो भारत ने पूरी ताकत से जवाब दिया। नौसेना, वायुसेना और थलसेना ने मिलकर पाक को हराया। 16 दिसंबर को दुनिया के इतिहास में सबसे बड़े सैन्य समर्पण को अंजाम दिया।
बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में जमात की भूमिका पाकिस्तान परस्त
इस जंग में जमात-ए-इस्लामी की भूमिका काली थी। 1941 में मौलाना मौदूदी द्वारा स्थापित यह संगठन पाकिस्तान का समर्थक था। पूर्वी पाकिस्तान में गुलाम आजम के नेतृत्व में जमात ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया। उन्होंने ‘पीस कमिटी’ बनाई, रजाकार, अल-बदर जैसे मिलिशिया गठित किए, जो पाक फौज के साथ मिलकर बंगाली राष्ट्रवादियों, हिंदुओं और बुद्धिजीवियों पर अत्याचार करते थे।
हत्याओं-बलात्कार-लूट में जमात के लोग इसमें शामिल थे। आजादी के बाद जमात बैन हो गई, गुलाम आजम पाकिस्तान भाग गए। लेकिन 1975 में मुजीब की हत्या के बाद सैन्य शासन में जमात फिर सक्रिय हुई। जिया-उर-रहमान ने उन्हें वापस बुलाया।
शेख हसीना की सरकार ने जमात की सख्ती, बदले में सत्ता से बेदखल
शेख हसीना की सरकार (2009-2024) ने जमात पर सख्ती की। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल बनाया, जहाँ जमात के कई नेताओं को 1971 के अपराधों के लिए सजा हुई। मोतिउर रहमान निजामी को 2016 में फाँसी दी गई। अब्दुल कादिर मुल्ला, दिलावर हुसैन सईदी जैसे नेताओं को मौत की सजा मिली। जमात की रजिस्ट्रेशन 2013 में कैंसल कर दिया गया, क्योंकि जमात का चार्टर धर्म को लोकतंत्र से ऊपर रखता था। 2024 में हसीना ने जमात और उसकी स्टूडेंट विंग छात्र शिबिर को आतंकवादी घोषित कर बैन लगा दिया गया।
हसीना को सत्ता से बेदखल करने में आगे रहे जमात से जुड़े संगठन
लेकिन 2024 जुलाई-अगस्त में स्टूडेंट प्रोटेस्ट से हसीना की सरकार गिरा दी गई। इसमें छात्र शिबिर से जुड़े कथित छात्रों ने जमकर हिंसा की। हसीना की पार्टी के लोगों को निशाना बनाया, हिंदुओं पर अत्याचार किए और पूरे बांग्लादेश को सुलगा दिया।
शेख हसीना भारत भाग गईं। बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी और अगस्त 2024 में ही छात्र शिबिर और जमात पर से बैन हटा दिया गया। यही नहीं, जून 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने जमात का रजिस्ट्रेशन भी बहाल कर दिया और इसी के साथ वो माहौल तैयार हो गया है, जब अगले चुनावों में जमात के लोग सत्ता में भी जाएँ।
शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से असली रंग दिखा रहे जमात के लोग
शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश में अराजकता है। 2024 अगस्त से हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। बांग्लादेश में मंदिर तोड़े गए, घर जलाए गए, हिंदू परिवारों पर अत्याचार हो रहे हैं। सड़कों पर जमात के झंडे लहराते दिख रहे हैं, तो हिंसा में छात्र शिबिर के लोग शामिल पाए जा रहे हैं, इसके बावजूद उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही। उल्टे मोहम्मद यूनुस जैसा कट्टरपंथी इन हमलों का बचाव कर रहा है और कह रहा है कि ये हिंसा और हमले राजनीतिक हैं, सांप्रदायिक नहीं। इनके बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है।
इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ मुड़ चुका है बांग्लादेश
जमात की वापसी से बांग्लादेश की राजनीति इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ मुड़ चुकी है। शेख हसीना ने जिस बांग्लादेश को सेकुलर बनाए रखने के लिए पूरी ताकत लगा दी, उस पूरे ढाँचे को ही ढहा दिया गया है। शेख हसीना की पार्टी तक को बैन कर दिया गया है, ताकि जमात जैसी कट्टरपंथी ताकतें सत्ता हासिल कर सकें और उदारवादी लोगों को खत्म कर सके।
हालाँकि अब जमात खुद को मॉडरेट बताती है, 1971 के लिए माफी माँगने की बात करती है, लेकिन उसकी बातें अस्पष्ट ही रही हैं। 54 साल बाद विजय दिवस पर सवाल उठता है-भारत ने जो आजादी दिलाई, क्या वह सुरक्षित है? कट्टरता की वापसी से अल्पसंख्यक डरे हुए हैं। जमात की रैलियाँ हो रही हैं।
बांग्लादेश निर्माण का एक चक्र हुआ पूरा
बांग्लादेश के हालात को देखते हुए साफ दिखने लगा है कि बांग्लादेश के इतिहास, वर्तमान और भविष्य का एक चक्र पूरा हो चला है। साल 1947 में जिस इस्लाम के लिए बांग्लादेश यानी पूर्वी पाकिस्तान का गठन हुआ था, वहाँ बीच के समय में बांग्ला पहचान से जोर जरूर पकड़ा था, लेकिन फिर से बांग्लादेश उसी इस्लामी कट्टरता की तरफ बढ़ गया है, जिसकी वजह से पूर्वी पाकिस्तान के तौर पर भारत से अलग हुआ था।
भले ही 1971 के बंग मुक्ति के बलिदानियों का सपना धर्मनिरपेक्ष, समावेशी बांग्लादेश था। लेकिन आज कट्टरपंथ सिर उठा रहा है। ये न सिर्फ बंग भाषियों के लिए भविष्य में चुनौतियाँ खड़ा करेगा, बल्कि भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए भी पूर्वी सीमा पर सुरक्षा जैसे खतरे खड़े करेगा। ऐसे में जरूरत है कि भारत सतर्क रहे। यही नहीं, भारत को उन इस्लामी कट्टरपंथियों के फन भी तुरंत कुचलने के लिए तैयार रहना चाहिए, जो वो सपने में भी भारत पर बुरे नजर डालने का ख्याल न ला पाएँ।


