Thursday, November 26, 2020
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मैं अनुराग ‘समय’ कश्यप हूँ, मुझे हक़ीक़त से क्या, मेरी जिंदगी का एक्के मकसद है – प्रपंच और प्रलाप चलता रहे

"अनुराग कश्यप जैसे लोगों के साथ दिक्कत ये है कि जब आपको सारी ज़िंदगी अपने ही जैसे लोगों के साथ बंद कमरों में अपने ही विचार को सही मानते हुए उस पर चर्चा करने की आदत पड़ चुकी हो, तो आप ट्वटिर पर सरेआम अपने विचार की धज्जियाँ उड़ते नहीं देख सकते।"

नेटफ्लिक्स पर सेक्रेड गेम्स सीजन-2 के आने से ठीक पहले प्रधानमंत्री से ‘पत्राचार‘ के बाद अनुराग कश्यप की सोशल मीडिया से हाल ही में विदाई हुई है। यह विदाई बहुत ही ज्यादा द्रवित कर देने वाली थी। सोशल मीडिया से सिनेमा के विवादित नामों की जब भी विदाई का जिक्र होता है, AIB की विदाई भी याद आती है। लेकिन अनुराग कश्यप की विदाई इन सभी विदाइयों से ऊपर है। पहला कारण तो यह की गालियों के आविष्कार के लिए पूरी फिल्म और नेटफ्लिक्स सीरीज बना देने वाले अनुराग कश्यप को गालियों से डर लगता है, और दूसरा ये कि अनुराग कश्यप जाते-जाते एक फिल्म का जिक्र छेड़ गए। इस फिल्म का नामा है; राशोमोन!

राशोमोन से पहले अनुराग कश्यप के दर्द पर चर्चा करनी आवश्यक है। गालियों के शोध के लिए पूरी की पूरी फिल्म बना देने का जज्बा रखने वाले अनुराग कश्यप को सोशल मीडिया पर गाली देने वालों से डर लगता है। अनुराग कश्यप की मानें तो इसी कारण उन्हें सोशल मीडिया छोड़ना पड़ा। हालाँकि, ऐसा कहकर उन्होंने अपना सिर्फ ट्विटर एकाउंट डिलीट किया, लेकिन फेसबुक एकाउंट नहीं! ऐसा ही डर कुछ समय पहले ट्विटर पर पत्रकारिता की व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ कुलपति रवीश कुमार ने भी जाहिर किया था और ट्विटर से भाग खड़े हुए थे। भले ही इसके बाद रवीश ने खुलासा किया था कि डर से बचने के लिए वो कानों पर ईयर फोन लगाकर ड्राइव करते हैं और हिंदी नहीं पढ़ते और सुनते।

अनुराग कश्यप का सबसे मासूम डर, जिसके लिए बड़े प्यार से उनके दोनों गाल खींचे जाने चाहिए, ये है कि उन्हें ना ही कश्मीर, न अनुच्छेद 370 और ना ही किसी इतिहास की जानकारी है। लेकिन फिर भी उन्हें केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का विरोध करना था। ये मैं नहीं कह रहा बल्कि, खुद अनुराग कश्यप ने अपने ट्वीट में कहा है। यह ट्वीट उनका इकबालिया बयान था, या फिर कोई सस्ता नशा फूँकने का दुष्परिणाम, यह घोषणा करने से पहले उनका ट्विटर एकाउंट डिलीट हो चुका था।

अनुराग कश्यप की मासूमियत देखिए कि सोशल मीडिया से उपजे डर की शिकायत करने के लिए भी वो सोशल मीडिया का ही इस्तेमाल करते हैं और पुलिस में शिकायत दर्ज करने की जगह प्रेस में जाकर यह प्रलाप करते हैं, कि उन्हें सोशल मीडिया पर डर लगता है। रही ज्ञान की बात, तो जिस अनुराग कश्यप को जनादेश से चुने गए प्रधानमंत्री और 1,200,000,000 लोगों के बीच सम्बन्ध पता न हो उसके ट्वीट मासूमियत भरे ही कहे जा सकते हैं। इनकी बुद्धि और विवेक को देखते हुए ये चर्चा योग्य हैं तो नहीं लेकिन दुर्भाग्यवश जिस स्तर पर ये लोगों को अपनी बेवकूफी से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं उसको देखते हुए अनुराग कश्यप पर बात करनी जरुरी हो जाती है।

सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति, चाहे वो नेता हो, लेखक, विचारक, कलाकार, पत्रकार, कोई भी जब आता है तो वो सिर्फ ये सोचकर नहीं आता कि उसे एक रक्षाकवच का आवरण दिया जाएगा क्योंकि वो दिल से बहुत नाजुक है। अगर आपको झालमूड़ी से लेकर तेल के कुँए रखने वालों पर ज्ञान और विचार रखने की आदत है तो आपको दूसरों के विचार पढ़ने का भी अभ्यास होना ही चाहिए। इसके लिए जब आप ‘भक्त’ और ‘ट्रोल’ जैसे शब्दकोष अपने राजनीतिक और सामाजिक पूर्वग्रहों के कारण गढ़ने शुरू करते हैं तब आप गाली परोसे जाने की पटकथा खुद रख चुके होते हैं।

क्योंकि अनुराग कश्यप जैसे लोग जब स्वयं भी अपने तर्कों और तथ्यों के साथ खड़े नहीं रह पाते हैं तब वो लोग बेहद सोफिस्टिकेटेड रहते हुए शब्दकोश रचते हैं। इसके बदले में जब वो लोग, जिन्हें सोशल मीडिया पर प्रगतिशील विचारक अपना विरोधी कहते हैं, अपने शब्दकोश और रचनात्मकता का प्रयोग करते हैं तब आपको उनके शब्दकोश को गाली कहने का अधिकार नहीं होता है।

अनुराग कश्यप ने ट्विटर से भागने से पहले जिस राशोमोन फिल्म का जिक्र किया, वो फिल्म जब 1950 में जापान में रिलीज हुई थी तो जापानी समीक्षकों को उसमें कुछ खास नजर नहीं आया था। राशोमोन फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह से एक समुराई की हत्या पर चार लोगों के अलग-अलग तर्क आते हैं और विरोधाभास के कारण किसी भी तर्क को गलत साबित कर देना मुश्किल होता है।

अंत में सत्य, कि समुराई की हत्या का असल गुनेहगार कौन है, अंत तक ठगा खड़ा रहता है और आज तक भी किसी को पता नहीं चल पाया है कि आखिर समुराई को किसने और किस हथियार से मारा था। ऐसे ही हॉलीवुड में बनी एक फिल्म थी- 12 एंग्री मैन। जिसमें 12 लोग एक अपराध पर दलीलें देते हैं और किसी के भी तर्क से असहमत हो पाना मुश्किल होता है।

अब यदि वापस अनुराग कश्यप पर चर्चा करें कि बेहद वाहियात से तथ्य और तर्कों के साथ सेक्रेड गेम्स जैसी नेटफ्लिक्स सीरीज के आने से ठीक पहले अनुराग कश्यप को डर क्यों लगा? तो इसके पीछे कारण उनकी बनी बनाई योजना पर अनुच्छेद-370 द्वारा पानी फेर दिया जाना है। देश में ‘जय श्री राम’ के इस्तेमाल से घबराने पर अनुराग कश्यप ने अपने ही जैसे अन्य बेरोजगार फिल्म निर्देशकों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री को एक चिठ्ठी लिखकर पत्राचार किया, जिसने हिन्दुओं द्वारा किए जा रहे अपराधों पर चल रहे डिबेट को हवा दी।

अनुराग कश्यप के साथ ही उनकी एक पूरी जमात ने अपने जहर को फेंकने के लिए अपनी कमर पेटिकाएँ कसी ही थीं कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 ने सब कुछ बदलकर रख दिया। अनुराग कश्यप के मानो एकदम से जज्बात बदल गए, जिंदगी बदल गई, सब कुछ बदल गया।

अब प्रोपेगेंडा और नैरेटिवबाजी में पीएचडी धारक यह समूह जान चुका था कि ये एकदम बैकफुट पर खड़ा है और इनकी सस्ती लोकप्रियता का इंतजाम तबाह हो चुका है। यही वजह है कि अनुराग कश्यप ने जाते-जाते एक विक्टिम कार्ड खेलकर जितनी सस्ती लोकप्रियता बटोर सकते थे वो भी बटोरी और पहली फुर्सत में निकल लिए।

अब सवाल यह है कि क्या लोगों ने अनुराग कश्यप को गाली देनी बंद कर दी है? जैसा कि एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार भी अक्सर कहते हैं- ‘मुझे हिंदी पढ़ने-लिखने वाले ‘भक्त’ और ‘ट्रोल’ गाली देते हैं’, अनुराग कश्यप ने भी ठीक वही किया।

असल में, इस प्रगतिशील लिबरल वर्ग का वास्तविक डर संवाद के साधनों का दोतरफा हो जाना है। अब यह संभव नहीं है कि आप टीवी स्क्रीन के पीछे बैठकर इकतरफा अपने कुतर्कों का ज्ञान बाँचें और श्रोता, दर्शक, पाठक आपसे सहमत होने के लिए मजबूर हों। यह समय त्वरित संचार और प्रतिक्रिया का है। जो प्लेटफॉर्म जितना ज्यादा प्रतिक्रिया करता है, ये प्रगतिशील वहाँ से अवश्य पलायन करेंगे।

यही एक बड़ी वजह है कि लेफ्ट-लिबरल्स ट्विटर जैसी माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट्स पर बहुत कम हावी हैं, जबकि फेसबुक पर इन लोगों ने बहुत बड़ा तंत्र विकसित किया है। दक्षिणपंथियों के संदर्भ में यह एकदम उलट है। कारण स्पष्ट है कि दक्षिणपंथी प्रतिक्रियाओं से घबराते नहीं बल्कि उनका स्वागत करते हैं। क्या बस इतनी सी बात साबित करने के लिए नाकाफी है कि असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के सबसे बड़े दुश्मन लेफ्ट-लिबरल्स ही हैं? जबकि ये लोग दावा इसके विपरीत करते हैं।

प्रतिक्रियाओं से घबराने और डरने वाले प्रगतिशीलों पर ही प्रसिद्ध व्यंग्यकार नीरज बधवार जी को पढ़ा जाना चाहिए। नीरज बधवार जी लिखते हैं- “दरअसल समस्या गाली भी नहीं है। रवीश कुमार और अनुराग कश्यप जैसे लोगों के साथ दिक्कत ये है कि जब आपको सारी ज़िंदगी अपने ही जैसे लोगों के साथ बंद कमरों में अपने ही विचार को सही मानते हुए उस पर चर्चा करने की आदत पड़ चुकी हो, तो आप ट्वटिर पर सरेआम अपने विचार की धज्जियाँ उड़ते नहीं देख सकते।”

अनुराग कश्यप जिस रोशोमन फिल्म का जिक्र कर के भागे हैं उन्हें वह अपने संदर्भ में देखनी चाहिए। वो खुद सत्य से कितना दूर हैं, उनका खुद का ट्वीट ये साबित करता है। देखा जाए तो अनुराग कश्यप का ट्वीट हर उस प्रगतिशील विचारक का चेहरा है जिसका एकमात्र लक्ष्य सरकार और समाधान विरोधी एजेंडा है। जब भी कोई ‘लेफ्ट-लिबरल विचारक’ किसी मुद्दे पर ज्ञान बाँचना शुरू करता है तो अनुराग कश्यप का ये बयान स्मरण हो जाना चाहिए जिसमें वो कह रहे हैं- “पता, मैंने इतिहास भी नहीं पढ़ा है लेकिन सरकार के इस कदम से मुझे आपत्ति है।”

यह सूचना और अभिव्यक्ति का सबसे सुनहरा दौर है। देश के लेफ्ट-लिबरल विचारक अपने विष का इतना प्रलाप कर चुके हैं कि उन्होंने स्वयं की विश्वसनीयता को स्वयं ध्वस्त कर दिया है। चाहे रवीश कुमार हों, अनुराग कश्यप हों या फिर जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद हों, इन्होंने अपने नैरेटिव को खुद ही एक्सपोज कर लिया है। एक समय तक इनसे प्रभावित रहने वाला इनका ही प्रशंसक अब इनके किसी भी बयान से सतर्क हो जाता है कि अगर फलां लेफ्ट-लिबरल इस बात का पक्ष ले रहा है तो वास्तविकता जरूर इसके उलट होगी।

अनुराग कश्यप को राशोमोन से पहले उस झूठे चरवाहे गड़रिए की देशी कहानी को 100 बार पढ़ना चाहिए, जिसमें गड़रिया बार-बार गाँव वालों को ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’ कहकर बेवकूफ बनाता रहा, और जब एक दिन भेड़िया सच में आकर उसकी बकरी और भेड़ें उठा ले गया, तो गाँव वाले कहते रहे- ‘इग्नोर करो, ये परम-प्रलापी फिर से कोई प्रोपेगेंडा ही कह रहा होगा।’

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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