Saturday, November 28, 2020
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चे ग्वेरा: रक्तपिपासु, होमोफ़ोबिक, नस्लवादी.. मार्क्सवादी क्रांति व लिबरल्स के रूमानी नायक से जुड़े वो खौफनाक तथ्य जिन्हें सभी नकारना चाहते हैं

चे ग्वेरा होमोफ़ोबिक था, नरसंहारक, नस्लवादी जल्लाद, जिसका सिर्फ और सिर्फ एक ही उद्देश्य था - किसी भी कीमत पर अपने मानकों पर सही बैठने वाली 'श्रेष्ठ सोसायटी' का निर्माण।

आज के दिन, अक्टूबर 09, 1967 में मार्क्सवादी क्रांति के पोस्टर ब्वॉय अर्नेस्टो ‘चे’ ग्वेरा (Ernesto ‘Che’ Guevera), दुनियाभर में प्रशंसकों, वाम-उदारवादी दिग्गजों के लिए एक रूमानी नायक, वोक युवाओं की टीशर्ट पर और उनके कमरे की दीवारों पर नजर आने वाले नरसंहारक चे ग्वेरा की मौत हुई थी। उसके समर्थक उसकी तस्वीरों से कमरे सजाते हैं, कपड़ों पर उसे उकेरते हैं लेकिन उन्हें स्वयं यह मालूम नहीं होता कि वो आखिर ऐसा क्यों करते हैं? यही चे ग्वेरा (Ernesto ‘Che’ Guevera) की भी जिंदगी का संक्षिप्त वर्णन है।

चाहे व्लादिमीर लेनिन हो, फिदेल कास्त्रो या फिर चे ग्वेरा, ऐसा कोई भी सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट क्रांतिकारी इस धरती पर पैदा हुआ हो, जिसने हजारों या लाखों की संख्या में मासूम और निर्दोषों का नरसंहार ना किया हो। जो रक्तपिपासु न रहा हो और जिसने इंसानों की हत्याओं में अपना भाग्य न देखा हो। वो भी तब, जब कि इनके कट्टर अनुयायियों की परिभाषा में ‘फासिस्ट’ होने का अर्थ सिर्फ विरोधी विचारधारा का समर्थक होना हो या फिर इस सत्तालोलुप विचारधारा का प्रतिकार करना।

आज का दिन समर्पित है लातिन अमरीकी क्रांतिकारी और कथित तौर पर कट्टरता और साम्राज्यवाद विरोध के उस प्रतीक को, जिसे दुनिया चे ग्वेरा कहती है और यह तथ्य नकारना चाहती है कि वह अपने ही जैसे अन्य कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के जैसा क्रूर, मानसिक रूप से विक्षिप्त नरसंहारक था। वह होमोफ़ोबिक था, नरसंहारक नस्लवादी जल्लाद, जिसका सिर्फ और सिर्फ एक ही उद्देश्य था – अपने मानकों पर सही बैठने वाली ‘श्रेष्ठ सोसायटी’ का निर्माण।

1959 में क्यूबा में फिदेल कास्त्रो के सत्ता में आने के बाद कम्युनिस्ट समाज के निर्माण की प्रक्रिया में, चे ग्वेरा ने ‘नया आदमी’ का विचार प्रस्तुत किया। जो भी इस ‘नए व्यक्ति’ की अवधारणा के खिलाफ जाते, उन्हें क्रांति का विरोधी घोषित कर उन्हें ख़त्म कर दिया जाता।

बतिस्ता सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध शुरू कर उसके साम्राज्य को मिटाने के बाद इस क्रन्तिकारी ग्वेरा ने एक फायरिंग स्क्वाड तैयार किया, जहाँ वह स्वयं ही न्यायाधीश, ज्यूरी और जल्लाद था। वास्तव में, ‘कोल्ड ब्लडेड किलिंग मशीन’ – चे ग्वेरा का वास्तविक स्वरुप तो बतिस्ता साम्राज्य के पतन के बाद सामने आया जब फिदेल कास्त्रो ने उसे ‘ला काबेना’ जेल का प्रभारी नियुक्त किया।

समाजवादी-क्रांतिकारी ग्वेरा?

न्याय और समाजवाद को धरातल पर उतरने के लिए चे ग्वेरा की नीति का पता उसके इस बयान से चलता है। उसने कहा था कि लोगों को फायरिंग स्क्वाड भेजने के लिए न्यायिक सबूत अनावश्यक होते हैं क्योंकि किसी भी क्रांति में एक क्रांतिकारी को खालिस घृणा से प्रेरित होना चाहिए और एक ‘कोल्ड ब्लडेड’ हत्या करने वाली मशीन बन जाना चाहिए।

उन नए श्रमिक शिविरों में चे ग्वेरा और उसके दल ने महिलाओं और 14 साल से कम उम्र के बच्चों सहित क्यूबा के हजारों असहाय लोगों को मार डाला। 118 लोगों का क़त्ल तो उसने खुद ही किया था।

नरसंहारक मार्क्सवादी

जनवरी 1959 में कास्त्रो ब्रदर्स, ग्वेरा और उनके समर्थकों ने हवाना में भी लगभग 16,000 ऐसी वारदातों को अंजाम दिया। क्यूबा के 1 लाख लोग भाग निकले या उन्हें जेल में डाल दिया गया और 30 हजार लोग भागने के प्रयास में मारे गए।

नस्लवादी चे ग्वेरा

1965 में कास्त्रो की सत्ता सुनिश्चित और सुरक्षित कर लेने के बाद रशियन्स ने ग्वेरा को दक्षिण अफ्रीका के कोंगों तक क्रांति और विद्रोहियों के जरिए सोवियत के प्रसार की जिम्मेदारी सौंपी। जब सोवियत्स के इशारे पर कास्त्रो प्रशासन ने गुरिल्ला विद्रोह को शुरू करने के लिए चे ग्वेरा को कॉन्गो भेजा तो वहाँ के निवासियों की हिंसा के प्रति उदासीनता ने ग्वेरा को निराश किया और बदले में ग्वेरा ने उनकी नस्ल पर ही टिप्पणी की थी।

ग्वेरा ने अफ़्रीकी लोगों की नस्ल पर हमला करते हुए कहा- “अश्वेत, अफ्रीकी जाति के वे शानदार उदाहरण जिन्होंने स्नान ना कर के अपनी नस्लीय पवित्रता को बनाए रखा है। उन्होंने अपने क्षेत्र को एक नए प्रकार के गुलामों से साझा करते देखा है- पुर्तगाली। ये दोनों नस्ल कलह और झगड़ों-टंटों से भरपूर हैं। ये अपनी रोजी-रोटी के लिए लड़ रहे हैं। आलसी अश्वेत, बस सपने देखना जानते हैं. अपनी मुट्ठी भर कमाई भी शराब में खर्च कर देंगे। जबकि यूरोपीय आदमी कमाने, बचने के तरीके और व्यवसाय जनता है।”

रक्तपिपासु क्रांतिकारी – अमेरिका पर परमाणु हमला चाहता था

1962 में कैनेडी प्रशासन के दौरान सोवियत ने क्यूबा को परमाणु बम से लैस किया था लेकिन रूस और अमरीका के बीच बातचीत के बाद परमाणु बम को वापस ले लिया गया था। ग्वेरा और कास्त्रो ने बड़े भाई सोवियत से ठगा हुआ महसूस किया। खासकर, चे ग्वेरा इस कदम से नाखुश था क्योंकि वह न्यूयॉर्क और यूएसए पर बमबारी करना चाहता था। उसकी यह सोच अगले दिन के अख़बारों की सुर्खियों में थी। एक क्रांतिकारी के लिए क्या यह बहुत बड़ी बात होती?

पढ़ा-लिखा मार्क्सवादी ग्वेरा – जिसने क्रांति के नाम पर किताबों-संग्रहालयों को ही जला दिया

कास्त्रो सत्ता द्वारा कैद किए गए लोगों में एक पत्रकार महत्वपूर्ण था, जिसने स्वतंत्र पुस्तकालय का सपना देखा था। वह चाहता था कि पुत्कें सत्ता की कैद से पृथक रहें। दिलचस्प बात है कि भारत के ‘पढ़े-लिखे’ वामपंथियों और उदारवादियों के चहेते चे ग्वेरा ने विद्रोह के दौरान किताबों को इस हद तक जला दिया था कि पठन सामग्री की कमी हो गई थी।

यहाँ पर सवाल पैदा होता है कि वर्तमान वाम-उदारवादी एक ऐसे व्यक्ति को गाते और भजते हैं, जिसने हजारों पुस्तकों को ही जला दिया ताकि उससे पहले का इतिहास ही न रहे और वो कहानियाँ ही न रहें जिन्हें वो नहीं सुनना चाहते? यह भी विडम्बना है कि पुस्तकों को जलाने वाला यह क्रांतिकारी चे ग्वेरा और उसके ‘दर्शन’ उन्हें अपने से भी ज्यादा प्रिय हैं।

समलैंगिकों के प्रति नजरिया

समलैंगिक पुरुषों को चे ग्वेरा ने ‘यौन विकृतियों’ का नाम दिया था। ग्वेरा और कास्त्रो दोनों समलैंगिकता को बुर्जुआ पतन मानते थे। 1965 में एक साक्षात्कार में, कास्त्रो ने बताया कि “उस प्रकृति का एक विचलन इस अवधारणा से टकराता है कि हमारे पास एक उग्रवादी कम्युनिस्ट होना चाहिए।”

मौत के समय माँगी थी जान की भीख

1967 में ग्वेरा विद्रोह के लिए बोलिविया चला गया। मजेदार बात यह है कि निचले तबके के लोगों ने वहाँ इस सोशलिस्ट क्रांतिकारी और सोवियत का समर्थन नहीं किया जबकि बोलीविया के उच्च वर्ग उसके साथ जरूर खड़ा था। विद्रोह में हजारों बोलिवियंस लोग मारे गए। जल्द ही उसे बोलिविया की पुलिस ने अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों की मदद से पकड़ लिया।

उसका पैर गोलियों से छलनी हो गया, उसकी बंदूक उसके हाथ से छूट गई, अर्नेस्टो ‘चे’ ग्वेरा ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसने रहम की भीख माँगते हुए कहा, “गोली मत चलाना! मैं चे ग्वेरा हूँ। मैं मरकर नहीं बल्कि जिन्दा रहकर तुम्हारे ज्यादा काम आऊँगा।”

चे ग्वेरा को कैद करने वालों ने कहा कि 14 साल के बच्चे समेत मासूम लोगों की हत्या करते समय वह साहसी और निर्भीक रहा लेकिन जब उसकी हत्या हुई, उस से पहले उसने स्वयं को जिन्दा छोड़ने की गुहार लगाई।

आखिरकार सैनिकों ने उसकी नहीं सुनी और उसके साथ वही किया गया, जो उसने असंख्य लोगों के साथ किया था – उसे मार दिया गया।

बोलीविया में पकड़े जाने के बाद मार्क्सिस्ट क्रन्तिकारी ग्वेरा

वो तमाम सच जिन्हें ग्वेरा-वादी नकारना चाहते हैं

समय के साथ ग्वेरा के भक्तों ने ऐसी किसी भी चीज़ से मुँह मोड़ लिया, जो ग्वेरा की आदर्श छवि के साथ फिट नहीं बैठती। ग्वेरा निश्चित ही एक जल्लाद था। उसकी नजरों में इंसानों की मौत कुछ भी नहीं थी। वह जानवरों पर भी अत्याचार करता था। मानसिक दिवालिएपन की यह सबसे बड़ी पहचान मानी जा सकती है।

साम्यवादी विचारों से पूरी दुनिया में क्रांति लाने का दावा करने वाले ग्वेरा की ‘क्रांति’ का वास्तविक विवरण जनवरी 1957 में, सिएरा मेस्त्रा से उसकी डायरी बताती है। जिसमें उसका एक किसान और सेना के मार्गदर्शक यूटिमियो ग्वेरा को मारने के बाद दिया बयान है।

दरअसल, ग्वेरा ने उसे सिर्फ इस वजह से मार दिया क्योंकि उसे शक था कि किसान यूटिमियो ग्वेरा खबरों को इधर-उधर करता है। उसने कहा- “मैंने उनके दिमाग के दाएँ हिस्से में एक .32 इंच की गोली दागी जो उसके बाईं और से निकली। यह समस्या का सबसे बेहतरीन समाधान था।” ग्वेरा के अनुसार किसी भी ‘धोखेबाज’ के लिए यही ‘न्याय’ था।

चे ग्वेरा की पत्नी ने अपनी पुस्तक ‘अर्नेस्टो’ में जिक्र किया था कि जनवरी 28, 1957 को अपनी पत्नी को लम्बे समय बाद लिखे एक पत्र में ग्वेरा ने लिखा था – “यहाँ क्यूबा के जंगल में हूँ, जीवित और खून का प्यासा (ब्लडथ्रस्टी)।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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