Wednesday, November 25, 2020
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लेनिन: लाखों किसानों-निर्दोषों की लाश के ढेर पर कम्युनिस्ट सत्ता स्थापित करने वाला

वामपंथ की पहचान उसकी विरोध की प्रवृत्ति तक ही सीमित है। सिर्फ समय बदला है, लेकिन मूल में वही है। लेनिन से लेकर आज के जेएनयू के कॉमेरड और खुद को पत्रकारिता के प्रहरी बताने वाले वामपंथी, असल में सत्ता पिपासु हैं। विपरीत विचारधारा का उभार वे तब भी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे, आज भी नहीं कर पाते।

अक्टूबर क्रांति के फलस्वरूप 1917 में विश्व में पहली बार लाशों के ढेर पर एक ऐसी शासन व्यवस्था का सृजन हुआ, जो पूर्ण रूप से नास्तिक प्रकृति की और कार्ल मार्क्स के विचारों के विचारों की ही परिणति थी। इसके पीछे प्रमुख व्यक्ति था सोवियत समाजवादी गणराज्य का वास्तुकार, रूसी साम्यवादी पार्टी का संस्थापक, बोल्शेविक क्रांति का प्रमुख नेता और महान नरसंहारक साम्यवादी व्लादिमीर लेनिन! आज सर्वहारा क्रांति के नायक कहे जाने वाले व्लादिमीर लेनिन का 150वाँ जन्मदिन है।

एक ओर जहाँ समाज का बड़ा वर्ग लेनिन-वाद (Leninism) से सदियों से अनुप्राणित रहा, वहीं वह लेनिन के उस ऐतिहासिक विप्लव (Revolution) के सच को नकारता ही आया है, जो लाखों बेगुनाहों की मौत की विभीषिका का आधार बनी। लेकिन फिर साम्यवाद (Communism) की पहली शर्त भी तो यही है, अर्थात – नकारना, अस्वीकरण और सत्य से विमुख रहने की कला ही साम्यवाद है।

व्लादिमीर लेनिन महज सोलह साल का था जब उसके पिता की मृत्यु ने उसे नास्तिक बना दिया। रही-सही कसर निर्वासन के दौरान पढ़े हुए कार्ल मार्क्स के मार्क्सवाद ने पूरी की। लेकिन इस बीच जिस एक बात ने उसे जारशाही के खिलाफ खड़ा होने की प्रेरणा दी, वह थी ज़ार अलेक्जेंडर तृतीय (Tsar-The Russian monarch Alexander III) को मारने की योजना में शामिल उसके बड़े भाई साशा (Sacha) को दी गई फाँसी की सजा।

सवाल व्लादिमीर इलिच उल्यानोवा के एक ‘वाद’ (-ism) बन जाने तक के सफर मात्र का नहीं है, बल्कि प्रमुख सवाल यह है कि यदि यह लाखों लोगों की लाशों को जरिया बनाकर अपनी सनक को साकार रूप देने वाला लेनिन ना होता, तो भारत जैसे देश में आज खुद को वामपंथ का सिपहसलार बताने वाले कहाँ होते?

यह सीधा सवाल इस वामपंथी विचारधारा की अर्थी ढो रहे उन लोगों के अस्तित्व पर ही है, जिन्होंने महज दक्षिणपंथ और सत्ता के विरोध के लिए खुद को हत्यारे लेनिन और तानाशाह स्टालिन का वंशज होना तक स्वीकार कर लिया है। और यह हो भी क्यों नहीं? क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि यह वामपंथी समुदाय आरम्भ से ही अपनी वस्तुस्थिति को समझ पाने में आज तक सफल नहीं रहा है, फिर भी इसने मानो बाकी सभी विचारधाराओं को लाइसेंस वितरण की जिम्मेदारी अपने सर पर उठाई हुई है।

सर्वहारा और शासन में से शासन को चुनता आया है वामपंथ

वामपंथियों के पास आज के समय में भी खुद को प्रासंगिक बनाए रखने और अपने अस्तित्व को तर्कसंगत साबित करने का बस एक ही बहाना रहा है और वो ये कि इन्होंने खुद को हमेशा किसानों, मजदूरों (सर्वहारा) का शुभचिन्तक होने का मुखौटा ओढ़े रखा। लेकिन क्या खुद वामपंथी उस समय को भूल गए हैं जब जारशाही का निर्मम दमन कर वहाँ विरोधियों की लाशों के ढेर पर विश्व की पहली साम्यवादी सरकार के गठन के बाद रूस में छिड़े गृह युद्ध में उन्हीं किसानों को ख़त्म कर देने का ऐलान किया गया।

फासीवाद का ही व्यापक स्वरुप है लेनिनवाद

कम्युनिस्ट लेनिन की प्राथमिकता शासन थी या सर्वहारा? सत्ता की भूख में लेनिन एक ऐसा नेता बनकर उभरा, जिसने रूस की एक तानाशाही को खत्म करने के लिए खुद को एक क्रूर तानाशाह बना लिया। यहाँ तक कि अपने जीवन के अंतिम समय में वो सत्ता के नौकरशाही का चोला ओढ़ने को लेकर परेशान रहा और जोसफ़ स्टालिन की बढ़ती ताक़त को लेकर भी वह चिंता जताता देखा गया। हालाँकि बाद में स्टालिन ही लेनिन का उत्तराधिकारी बना और उसने भी तानाशाही का ही मॉडल अपनाया।

ऐसे कई प्रमाण हैं जिनसे पता चलता है कि जिस हिटलर को आज के नव-बुद्धिजीवी लेनिन-वादी कॉमरेड फ़ासिस्ट बताते नहीं थकते, उसी फ़ासिस्ट हिटलर की तरह ही लेनिन-वादियों के मसीहा लेनिन ने अपनी सेना को मजबूत करने का काम किया। लेनिन अपनी साम्यवादी तानाशाही को सिर्फ रूस तक ही सीमित नहीं रखना चाहता था बल्कि उसका ख्वाब पूरे यूरोप में इसका प्रसार करना था।

सेना में जबरन नौजवानों और कृषकों को भर्ती किया जाने लगा। किसानों से उनकी फसलों और अनाजों को देश के नाम पर सेना का पेट भरने के लिए छीन लिया गया। परिणाम यह हुआ कि इससे एक बड़ी तादाद में रूसी लोग भूख से मरने लगे और रूस की अर्थव्यवस्था तबाह होती गई।

Red Terror : क्रांति और बोल्शेविकों का लाल आतंक

निर्वासन के बाद रूसी क्रांति के वक्त 1917 में लेनिन के वापस लौटने के बाद रूस तीन साल तक गृहयुद्ध की आग में जला। आखिरकार बोल्शेविक जीते और सारे देश का नियंत्रण हासिल कर लिया। जुलाई, 1918 में बोल्शेविकों ने जार निकोलस द्वितीय को उसकी पत्नी और पाँच बच्चों के साथ फाँसी दे दी। क्रांति के बाद रूस में गृह युद्ध एक बड़ी समस्या बनकर उभरा। सिविल वॉर वहाँ की ‘रेड आर्मी’ और ‘व्हाइट आर्मी’ के बीच था।

रेड आर्मी बोल्शेविक तर्ज के समाजवाद के लिए लड़ रही थी, जबकि व्हाइट आर्मी समाजवाद के विकल्प के रूप में पूँजीवाद, राजशाही के लिए लड़ रही थी। 1920 में बोल्शेविकों ने लेनिन के नेतृत्व में विरोधियों को हरा दिया और 1922 में यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स (यूएसएसआर) की स्थापना हुई।

जब रूस में छिड़े गृहयुद्ध के दौरान लेनिन के सामने शासन और सर्वहारा में से किसी एक को चुनने का समय आया, तब उसने सर्वहारा में ही जार को देखा। कहा गया कि दूसरी क्रांति पहली क्रांति की रक्षा के लिए हुई। लेनिन ने किसानों को अपनी सेना में शामिल होने के लिए मजबूर किया और उसके सैनिक भूखे ना रहें, यह सुनिश्चित करने के लिए उसने किसानों से उनका भोजन भी हड़प लिया।

गृहयुद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था का बहुत कुछ नष्ट कर दिया और लाखों लोग भूख से मर गए। रूस की क्रांति को उस वक्त झटका लगा, जब मार्च, 1918 में वामपंथी पार्टी ने ब्रेस्ट-लिटोवस्क समझौते का विरोध करते हुए बोल्शेविकों से अलग होने का निर्णय लिया। इसके बाद जुलाई से गृह युद्ध की शुरुआत हो गई। इस बारे में इतिहासकार मोशे लेविन कहते हैं कि वर्ष 1914 से 1921 के बीच रूस में जो हुआ, उसका नुकसान रूस को लंबे समय तक उठाना पड़ा।

नरसंहारक बोल्शेविक

लेनिन अपने विरोधियों को किसी भी कीमत पर कुचल देना चाहता था। इसका एक नमूना वह बोल्शेविक क्रांति के दौरान पेश कर चुका था और सत्ता हथियाने के बाद भी वह ऐसा करने से चूकने वाले नहीं था। लेनिन की ओर से रूस की सुरक्षा एजेंसियों ने उसका विरोध करने वाले हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा।

कम्युनिजम-किसान-मजदूर का नारा और कैपिटलिज्म यानी पूँजीवाद की धुर विरोधी सोच वाली बोल्शेविकों की सरकार बनते ही रूस में नरसंहार का खूनी खेल शुरू हो गया। जारशाही से मुक्ति का आह्वान कर सर्वहारा की बलि देकर अब उसी सर्वहारा के लिए कम्युनिस्ट लेनिन एक क्रूर और निर्दयी शासक बन चुका था। उसकी शासन व्यवस्था और उसके खिलाफ उठने वाली हर आवाज की उसके इशारे पर हत्या कर दी जाने लगी।

इस तरह से रेड टेरेरिज्म यानी, लाल आतंक की शुरुआत रूसी क्रांति के साथ ही सन 1917 से हुई और यह तब तक चला जब तक कि बोल्शेविकों के विरोध में उठने वाली हर एक आवाज को दबा नहीं दिया गया। लेनिन के राज्य में विरोधियों को रेड-टेरर का सामना करना पड़ा, ये वो हिंसक अभियान था। जो लेनिन की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा चलाए गए। लाल सेना के साथ ही लेनिन की सरकार से समर्थन प्राप्त बोल्शेविकों की एक गुप्त पुलिस ‘चेका’ द्वारा इस कार्य को अंजाम दिया गया।

लेनिन ने अगस्त 09, 1918 को सार्वजनिक रूप से 100 विरोधियों को फाँसी देने का हुक्म भी दिया। इसके कुछ माह बाद ही चेका पुलिस ने सोशल रिवॉल्यूशनरी पार्टी के 800 सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया और हजारों को मजदूरी कैंपों में भेज दिया गया। हज़ारों लोगों को प्रताड़ना दी गई। वर्ष 1917-1922 के बीच लेनिन की सरकार ने रूसी गृहयुद्ध में दक्षिणपंथी और वामपंथी बोल्शेविक-विरोधी सेनाओं का भी निर्मम दमन किया।

लाल आतंक (1918-22) के दौरान 2,00,000 लोग मारे गए। अकाल और Dekulakization (Dekulakization राजनीतिक दमन का सोवियत अभियान था, जिसमें पहली पंचवर्षीय योजना, 1929-1932 की अवधि में समृद्ध किसान और उनके परिवारों के लाखों लोगों की गिरफ्तारी, निर्वासन सहित फाँसी दी गई। ये वो कृषक थे जिन्होंने बोल्शेविकों को जबरन अनाज देने से मना कर दिया था। लेनिन ने इन किसानों को रक्त चूसने वाले प्रेतों की संज्ञा दी थी) से 11 मिलियन लोग मारे गए। वहीं 7,00,000 लोग 1937-38 के दौरान लाल आतंकियों द्वारा मार दिए गए। 1929 और 1953 के बीच 4,00,000 अधिक मौत के घाट उतार दिए गए, जबकि जबरन जनसंख्या हस्तांतरण के दौरान 1.6 मिलियन लोग मरे और गुलाग, श्रम कालोनियों और उनके बंदोबस्त में कम से कम 2.7 मिलियन लोगों ने अपनी जान गॅंवाई।

इस प्रकार युद्धरत साम्यवाद के तले दशकों तक एक बड़े पैमाने पर निर्मम हत्या का तांडव जारी रहा और कुल मिलाकर, 20,000,000 सोवियत नागरिकों को शासन द्वारा मार दिया गया, या उनकी दमनकारी नीतियों के प्रत्यक्ष परिणामस्वरुप वो मारे गए। उल्लेखनीय है कि इस आँकड़े में वे मौतें शामिल नहीं हैं, जो या तो सैनिक के रूप में मरे या फिर बोल्शेविकों द्वारा मार दिए गए।

सन 1920 तक बोल्शेविकों का रेड-टेरर भयावह शक्ल ले चुका था। ख़ुफ़िया एजेंसी ‘चेका’ में लगभग 2 लाख बोल्शेविक भर्ती हो गए, जिन्होंने विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया। विरोधियों को यातना दी और सरेआम फाँसी पर लटकाया जाने लगा। लेनिन के शासन ने ‘चेका’ को खुली छुट दी थी, ये पूर्ण रूप से लाल आतंकी थे।

इस चेका पुलिस को साम्यवादी सरकार द्वारा सिर्फ एक ही निर्देश दिया गया था- वह ये कि हर विरोधी आवाज को किसी भी तरह से बंद करना! तात्पर्य अंततः यही निकलता है कि वामपंथ और कुछ नहीं बल्कि सत्ता के लिए फासीवाद का ही एक अपेक्षाकृत अधिक विनाशक तन्त्र है।

और एक बात यह कि क्या ये कैम्प द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर के होलोकॉस्ट (The Holocaust) से मेल नहीं खाते? क्या भारत में नागरिकता कानून (CAA) के विरोध में जब भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग यानी नव-वामपंथी डिटेंशन कैम्प की तुलना होलोकॉस्ट से कर रहे थे, तब उनकी कल्पना में लेनिन का यही कैम्प था?

लेनिन ने नरसंहार के बाद बताया था पूंजीवाद को आवश्यक

रूस में विरोधियों का खात्मा करने के बाद वहाँ जो भुखमरी फैली उसने घोर निराशा को जन्म दिया। सर्वहारा के दमन के बाद ‘सर्वहारा का मसीहा’ यही लेनिन एक बार फिर अपने शब्दों और पाखंड की विचारधारा का खुद ही उपहास करता नजर आया। उसने गरीबी, भुखमरी और रसातल में जा चुकी अर्थव्यवस्था से निपटने के लिए नई आर्थिक नीतियों के ज़रिए हालात उलटने की कोशिश की।

एक समय युद्ध को अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद का प्राकृतिक प्रतिफल बताने वाले लेनिन ने गृहयुद्ध के बाद पूँजीवाद का ही समर्थन किया। जब रूसी अर्थव्यवस्था को सोशलिस्ट मॉडल के हिसाब से बदलने की उनकी कोशिशें थम गईं, तो लेनिन ने नई आर्थिक नीति का ऐलान किया, जिसमें प्राइवेट एंटरप्राइज़ को एक बार फिर इजाज़त दी गई और ये नीति उनकी मौत के कई साल बाद भी जारी रहीं।

वामपंथ का भारत में संघर्ष

आज हम सब यह जानते हैं कि कपटी कम्युनिस्टों ने वामपंथ के निकृष्ट अध्याय पर पर्दा डालने के लिए और इस विचारधारा को जायज ठहराने के लिए हर प्रकार का दुराग्रह किया है और इसके समर्थन में सबूत जुटाने के प्रयास किए हैं । कभी ये कहते नजर आते हैं कि भगत सिंह लेनिन के विचारों से ही क्रांतिकारी बने थे और कभी कहे जाते हैं कि यह आज के समाज की भी जरूरत है। जबकि खुद को लिबरल बताने की आड़ में आज इनका पहला संघर्ष सिर्फ और सिर्फ दक्षिणपंथ के अस्तित्व को नकारने तक सीमित हो गया है। वामपंथियों की पूरी ऊर्जा सिर्फ विरोधी विचारधारा को छोटा साबित करने की या फिर उन्हें ‘भक्त’ कहने में खर्च हुई जाती है।

सर्वहारा के मसीहा लेनिन के नाम पर मॉस्को के राज्य ऐतिहासिक संग्रहालय कुछ ऐसा है जो बुर्जुआ वर्ग के वाहनों के कुछ अंतिम उदाहरणों में से एक है- एक रोल्स रॉयस कार, सिल्वर घोस्ट मॉडल!

कम्युनिस्ट लेनिन सिर्फ एक पर ही नहीं रुका। उसके पास ऐसी कुल 9 रोल्स रॉयस कार थीं। यानी, जब रूसी किसान और सर्वहारा पूरे रूस में भूख से मर रहे थे, लेनिन ने अपनी लग्जरी कार में घूम-घूमकर लोगों को कम्युनिस्ट नीतियों के बारे उपदेश दिया। यानी, एक आकर्षक, पूँजीवादी, महँगी, बुर्जुआ रोल्स रॉयस में। क्या लेनिन का यही शगल आजकल के भारतीय स्वघोषित लेफ्ट-उदारवादियों की भी हकीकत से मेल नहीं खाती है?

यह ठीक उसी तरह से है जिस तरह से आज का वामपंथी कॉमरेड तमाम पूँजीवादी संस्थाओं का लाभ लेकर पूँजीवादी व्यवस्थाओं को कोसकर बुद्धिजीवी बना बैठा है। वह कहीं से भी सर्वहारा और कृषक वर्ग का हितैषी नजर नहीं आता, वह अभिजात्यता का दास है, फिर भी कहता है कि उसकी क्रांति का मूल सर्वहारा का विप्लव है।

बुतों को तोड़ने की कविता गाने वाले आज लेनिन के बुतों के उपासक हैं। जो धर्म को अफीम बताते हैं उन्होंने लेनिन को धर्म बना दिया। उसके मृत शरीर के चर्म को जीवित रखने के लिए लेनिन का ममी बन चुका शरीर मॉस्को के लाल चौक पर बने मकबरे में कैद हैं। वामपंथ की विचारधारा एक फूहड़ चुटकुले से अधिक कुछ भी नहीं हैं।

मॉस्को में लेनिन के शरीर को रसायनों की मदद से ममी बनाकर सुरक्षित रखा गया है

सनकी व्लादिमीर लेनिन ने बोल्शेविक क्रांति के दम पर सर्वहारा यानी, कृषकों, श्रमिकों और गरीबों की लाशों के ढेर के ऊपर अपनी साम्यवादी सरकार बनाई। नव-उदारवादी और कम्युनिस्टों के लिए यह बेशक एक उपाधि हो सकती है कि लेनिन के हाथ मासूम लोगों के खून से रंगे हुए थे। उसकी विचारधारा का एकमात्र उदेश्य हर वामपंथी की तरह ही किसी भी हाल में राजनीतिक द्वंद्व में सबसे ऊपर वाली श्रेणी में स्वयं को प्रतिष्ठित करना था। फिर चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़ती, और उसने ऐसा किया भी।

सर्वहारा के ये तथाकथित ‘चिंतक’ और ‘विचारक’ कोरोना की महामारी के दौरान भी नंगे ही नजर आए हैं। इससे पहले जहाँ इनकी सुबहें सोशल मीडिया पर सत्ता के विरोध में प्रलाप और शाम इसी प्रपंच में समाप्त हो जाया करतीं थीं, यही सोशल मीडिया से पैदा हुई ‘वामपंथी विचारक जमात’ कोरोना के दौरान गरीब और बेसहारा लोगों की मदद के दौरान अपने बिलों में छुप गई। वहीं जिन लोगों को ये 2014 से ही ‘भक्त’ और अनपढ़ साबित करने का प्रयास करते नजर आते रहे, वही बेसहारा और जरुरतमंदों की पीड़ा से चिंतित दिखे और उनकी मदद कर रहे हैं।

यानी, वामपंथ की पहचान उसकी विरोध की प्रवृत्ति तक ही सीमित है। सिर्फ समय बदला है, लेकिन मूल में वही है। लेनिन से लेकर आज के जेएनयू के कॉमेरड और खुद को पत्रकारिता के प्रहरी बताने वाले वामपंथी, असल में सत्ता पिपासु हैं। विपरीत विचारधारा का उभार वे तब भी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे, आज भी नहीं कर पाते।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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