Friday, January 22, 2021
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हिन्दू आज खौफ में है, लेकिन वो क्या करे, इसका समाधान क्या है? वहाँ मारो जहाँ सबसे ज्यादा दर्द हो?

चुप रहने वालों से ज्यादा डरिए क्योंकि हो सकता है वो इस इंतजाम में लगा हो कि उस पर तो किसी को शक होगा ही नहीं, और एक दिन वो जेब से छुरा निकाले और घोंप दे… और समय मिले तो रेत कर हलाल कर दे।

एक अखबार की एक रिपोर्ट पढ़ रहा था कि अयोध्या के दीपोत्सव की तैयारियाँ जोरों पर हैं: कलीम और कासिम बना रहे खड़ाऊँ, मल्लो, गुलाबो, सब्बो गूथ रहीं मालाएँ! एक लाइन में कितना सद्भाव है, आँखों में आँसू आ जाते हैं कि यही तो है गाँधी के सपनों का भारत, जहाँ स्वामी श्रद्धानंद की हत्या करने वाले अब्दुल के बारे में गाँधी ने कहा था कि अब्दुल भाई को माफ कर दो। लेकिन अब्दुल के बंधु-बांधव कमलेश तिवारी को माफ नहीं कर सके।

गाँधी के सपनों के इस भारत में बहुसंख्यक खौफ में जी रहा है। हिन्दू आज अपने ही देश में डर कर जीने को मजबूर है क्योंकि हर सोशल मीडिया पोस्ट पर किसी सरफराज को मेरा पता चाहिए ताकि वो मेरा गला रेत दे, इंशाअल्लाह! यही लिखता है सरफराज, अब्दुल, मोहिउद्दीन, अनवर और कई वैसे लोग। नाम आप बदल दीजिए, धमकी वही है कि पता बता दे, बताता हूँ आ कर।

ये वो नकारे लौंडे है जिन्हें पैदा कर दिया गया है और बताया नहीं गया कि अपने जीवन में करना क्या है। ये जो इधर-उधर से सुनते हैं, उन्हें वही सही लगता है। पढ़े-लिखे भाईजान टीवी पर बोलते हैं कि कमलेश तिवारी की हत्या जायज है। वो अपने मुसल्लम ईमान की लाज रख लेते हैं, उन पर गुलाब की पंखुड़ियाँ बरसाई जाएँगीं, बंदनवार सजाए जाएँगे, मरहबा-मरहबा कह कर नाचा जाएगा।

लेकिन भारत के ईमान की लाज कौन रखेगा? ये जिम्मेदारी सिर्फ हिन्दुओं पर है कि वो अपने देवता की पूजा के लिए खड़ाऊँ और फूल मालाएँ गरीबुल निशाँ और उसकी बेटी नाजरा बानो से बनवा रहे हैं। कासिम के घर में प्रसाद का डिब्बा तैयार हो रहा है। संत-महंतों को लिए खड़ाऊँ और पोथी रखने के लिए रेहल बनाने वाले सलीम खुश हैं। कलीम खुश इसलिए हैं कि माहौल ठीक हो रहा है। मुस्लिम बहुल सुतहटी, रायगंज, बुराईकुआँ, राजघाट में भी यही माहौल है।

माहौल तो है, लेकिन क्यों है? यहाँ एक पूरा तंत्र है जो हलाल है, जिसका मतलब यह है कि किसी सामान या सुविधा के किसी के घर में पहुँचने तक की प्रक्रिया में सिर्फ एक मजहब के लोगों को ही काम मिला है, और यहाँ दूसरे धर्म के लोग हैं जो देवताओं के लिए मालाएँ उनसे बनवा रहे हैं जिनके मजहब के लिए हर हिन्दू अछूत है, काफिर है और हत्या के योग्य है।

यहाँ विधायक तक ऐलान करता है कैराना में कि हिन्दुओं से सामान मत खरीदो, थोड़ी दूर चलना पड़े तो चलो, इन हिन्दुओं की दुकानें बंद हो जाएँगी, ये खुद ही चले जाएँगे। इन्हें कितनी समस्या है हिन्दुओं से वो देख लीजिए। पहले कैराना से उन्हें भगाया, जो बचे हैं, उन्हें भी भगाना है। इनकी योजना कितनी सही है कि आर्थिक नुकसान पहुँचाओ, हिन्दू भाग जाएगा। लेकिन हिन्दू ऐसा नहीं करता।

हिन्दू ये देख कर सिनेमा नहीं देखता कि उसमें पांडे है कि खान। हिन्दू ये देख कर सामान नहीं खरीदता कि दुकानदार चौधरी है कि मलिक। हिन्दुओं का कोई हलाल सिस्टम है ही नहीं जहाँ बकरे के पैदा होने से लेकर, उसके कटने, छिलने, पैक होने और दुकान में रखे जाने तक बस एक ही मजहब के लोग हैं। हिन्दू तो अपनी मालाएँ भी उनसे बनवाता है जो कमलेश तिवारी की हत्या पर टीवी पर कहते हैं कि बिलकुल सही किया, उसने जो किया, उसे वही मिला। क्योंकि हिन्दुओं से मूर्ख प्रजाति और मिलेगी भी कहाँ!

जो चुप हैं उनसे बहुत ज्यादा डरिए

ऐसा नहीं है कि लेख या विडियो के कमेंट में आने वाला हर खास तरह के नाम वाला आदमी मुझे जान से मारने की ही बात करता है। नहीं, कुछ हैं जो मुझे बताते हैं कि फलाँ मजहब शांति का मजहब है और मुझे फलाँ किताब पढ़नी चाहिए ताकि मैं फलाँ मजहब को समझ सकूँ! बात तो वही है न कि जिस किताब और मजहब को उसी मजहब के लोग नहीं समझ सके, वो मैं कहाँ से समझ पाऊँगा! आखिर कमलेश तिवारी की गर्दन रेतने वाले ने तो दो-चार लाइन जरूर पढ़ी होगी, और उन सबके कृत्य को सही ठहराने वाला भी तो पढ़ा-लिखा ही लग रहा था, मजहब भी सेम बाय सेम। फिर मैं क्यों पढ़ूँ वो किताब? अगर इसे पढ़ने वाले करोड़ों लोग, एक लाख तो ऑन रिकॉर्ड उसकी जान लेने की माँग कर रहे थे, इस हत्या को जायज कहते हैं, तो मैं उस तरह की किताब क्यों पढ़ूँ?

आप डरिए इनसे क्योंकि डरना ज़रूरी है। डरिए और संभल कर रहिए क्योंकि कुछ लोग या तो घात लगाए बैठे हैं, या फिर मौन सहमति दे रहे हैं कि जो हो रहा ठीक ही है। चुप रहने वालों से ज्यादा डरिए क्योंकि हो सकता है वो इस इंतजाम में लगा हो कि उस पर तो किसी को शक होगा ही नहीं, और एक दिन वो जेब से छुरा निकाले और घोंप दे… और समय मिले तो रेत कर हलाल कर दे। ये चुप रहने वाले ज़्यादा खतरनाक होते हैं। इनसे डरिए।

डरने का मतलब यह नहीं है कि आप कमज़ोर हैं। डरने का मतलब है कि आप चौकन्ने हैं, आप की इन्द्रियाँ जागृत हैं। इनसे डरना ज़रूरी है क्योंकि इनमें से कुछ तो मिठाई के डिब्बे में छुरा ले कर घूम रहे हैं। और जो न मिठाई का डब्बा लेकर घूमते, न ही छुरा है उनके पास, वो या तो बिलकुल चुप हैं या फिर खुल्लमखुल्ला बोल रहे हैं कि जो हुआ कमलेश तिवारी के साथ, वो बिलकुल सही था। इसलिए डरना ज़रूरी है क्योंकि:

लिए डिब्बों में वो चलते हैं अब पिस्तौल और चाकू,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए
रहो बच कर, रहो डर कर, रहो चुप-चुप, रहो गुम-सुम
न जाने कब कहाँ कोई कहीं पिस्तौल ले आए

इन पंक्तियों पर आप हँस सकते हैं, लेकिन कविता का बेकार शिल्प उसके कथ्य को झुठला नहीं सकता।

मुझसे लोग पूछते हैं कि हम क्या करें?

जब किसी ने यह कह दिया हो कि यह युद्ध की शुरुआत है, और आप अगर उनसे सामान खरीद रहे हैं, जो हलाल सर्टिफिकेट के साथ आता है, तो आप अपनी मौत का भी सामान खरीद रहे हैं। ऐसी हर जगह से कमाई का एक हिस्सा ‘जिहाद’ के लिए जाता है। ‘जिहाद’ को कई बुद्धिमान लोग अलग परिभाषा देते हैं कि ये तो कोशिश है। होती होगी, लेकिन कोशिश किस बात की है, ये पूरी दुनिया को दिख रहा है जहाँ, अगर पिछले तीस दिन की बात करूँ तो 118 जिहादी हमले में 642 लोग 21 देशों में मारे गए हैं, 913 घायल हैं।

आप ही के पैसे से, आप ही के खिलाफ युद्ध छेड़ा जा रहा है। आप यह मत पूछिए कि आप क्या करें, चुनाव आपका है कि आपको क्या करना है। मैं आपको यह क्यों कहूँ कि आपको अपने सामान खरीदने के लिए थोड़ी मेहनत करनी पड़े, कीजिए। थोड़ा दूर चलना पड़े चलिए। कम से कम आपको किसी दिन जो गोली लगेगी, या जिस चाकू से रेता जाएगा, किसी दंगे में जो आपकी बच्ची का बलात्कार होगा, उसमें आपके पैसे नहीं लगे होंगे। मैं आपको यह नहीं कह सकता कि आप किसी खास मजहब के लोगों से सामान न खरीदें, उनकी टैक्सी में न बैठें, उनकी फिल्मों का सामूहिक बहिष्कार करें… ऐसा कहना बिलकुल ही अनैतिक है, और गलत भी। मैं ऐसा क्यों कहूँगा भला। आप अपने विवेक का इस्तेमाल कीजिए।

लेकिन मैं यह तो कह ही सकता हूँ अपनी पूजा-पाठ का सामान तो कम से कम अपने धर्म के लोगों से खरीदिए। दुकानदारों से पूछिए कि वो कहाँ से बन कर आता है, कौन बनाता है। बस जानकारी लीजिए और विवेक का इस्तेमाल कीजिए। किसी से मजहब के आधार पर भेदभाव करना हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ है, लेकिन अपने धर्म को कस कर पकड़ना, उससे जुड़े माली से फूल खरीदना, उन तमाम गरीबों के घर में रोटी की व्यवस्था होने लायक खरीदारी करना न तो असंवैधानिक है, न ही भेदभावपूर्ण।

आपको पता है कथित निचली जातियों में कितनी गरीबी है? आपको मालूम है कि उनमें से कई लोग बहुत छोटे स्तर पर रोजगार करते हैं? आपने अपने पैसे का उपयोग क्या उनके स्तर को ऊपर उठाने के लिए किया? क्या आपने दिवाली के दिए उन कुम्भकारों से लिए जो मिट्टी के लोंदे से दीपक बनाते हैं? हर जाति के लोगों के पास उनका अपना कौशल है, आप स्वयं से पूछिए कि आपने उनकी बेहतरी के लिए क्या आर्थिक योगदान दिया है? मैं आपको उन्हें दान देने नहीं कह रहा, मैं कह रहा हूँ कि उन्हें पहचानिए, और उनके कौशल के लिए, उनकी प्रतिभा को अपना योगदान दीजिए।

आप अगर इन्हें ऊपर नहीं लाएँगे तो कौन लाएगा? आपने सोचा भी है कि मतपरिवर्तन कराने वाले इतनी आसानी से इन लोगों को क्यों खींच ले जाते हैं? क्योंकि आम आदमी तक ने इन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया। गंगाजल छिड़क कर हर चीज को शुद्ध मान कर धारण मत कीजिए, क्योंकि हो सकता है उसे बनाने में वो लोग लगे हों जिनके हाथों मजहबी जिहाद रक्त लगा हो। मानव रक्त बहुत अशुद्ध होता है। इसलिए थोड़ी मेहनत कीजिए, अपने धर्म को कस कर पकड़िए, अपने धर्म के व्यापारियों को कस कर पकड़िए। लेकिन हाँ, मजहब जान कर भेदभाव मत कीजिए, विवेक से चुनाव कीजिए। आपकी मानवता और नैतिकता दोनों बची रहेगी।

वैयक्तिक चुनाव ही सामूहिक बन कर फलित होगा

मैं ये नहीं कह रहा कि यही समाधान है क्योंकि मेरे पास ऐसा कहने के पीछे कोई आँकड़ा नहीं है। मैं जानता हूँ कि हिन्दू कभी भी सामूहिक रूप से कुछ भी नहीं करता। हर लेख के नीचे, हर विडियो के कमेंट में यही बात होती है कि हम बँटे हुए हैं। हम बँटे हुए नहीं है, हम टोलरेंट हैं, हम आदिकाल से सहिष्णु हैं, हम थोड़ी देर में उबलते हैं।

साथ ही, आज की दुनिया में जहाँ एक बच्चा पैदा कर के, उसे पाल लेना एक उपलब्धि है, तो उस दौर में आप दूसरों की तरह यह नहीं सोच सकते कि फलाने की राह में ये कुर्बानी है। वो सोच हिन्दुओं की है ही नहीं, तो सामूहिक रूप से अपनी रक्षा हेतु कुछ भी करने के लिए हम नहीं सोच पाते। लेकिन हाँ, वैयक्तिक तौर पर तो कुछ कदम उठाए ही जा सकते हैं।

अंग्रेजी में एक कहावत है कि ‘हिट देम व्हेयर इट हर्ट्स द मोस्ट’। इसका हिन्दी यह है कि उन्हें वहाँ मारो जहाँ सबसे ज़्यादा दर्द होता हो। कमलेश तिवारी को इन्होंने गोली ही नहीं मारी, समय लिया और गला रेता। एक बार फिर से सोचिए कि छटपटाते आदमी को एक ने पकड़ा होगा, दूसरा आराम से गले पर छुरा चला रहा होगा, हृदय से सर की तरफ जाती खून की नलियों से किस रफ्तार से खून निकला होगा, लेकिन वो दरिंदा रुका नहीं होगा।

क्योंकि उसका काम सिर्फ हत्या नहीं था, उसका काम एक संदेश देना था। मारना तो आसान है, उससे संदेश नहीं जाता। उससे आप ठीक तरह से सफल नहीं होते। उससे आप स्टेटमेंट नहीं दे पाते कि देखो हमारे उनको अगर वैसे कहोगे तो हम ये करेंगे। अब हम और आप छुरा लेकर तो चल नहीं सकते क्योंकि वो गैरकानूनी है, और हमारा धर्म हत्या की बात नहीं करता, इसलिए हम सब को अपने स्तर से संदेश भेजना चाहिए कि समय बदल रहा है।

संविधान और कानून के दायरे में रह कर, इस भारतभूमि के हर आदर्श का आदर करते हुए, अपनी प्रतिरक्षा में हमें हर वो कदम उठाना चाहिए जो आपको मजबूत करता है, आपको संगठित करता है। ये मैं नहीं बता सकता कि आपकी लड़ाई किस से है, हमारी लड़ाई किस से है। वो किन हथकंडों को अपना कर, विक्टिम बन कर, हम तो शांतिप्रिय हैं कह कर, किस तरह से आपके द्वारा बढ़ाए हाथ को काट देते हैं, ये छुपा नहीं है। समाधान यही नहीं है, और भी होंगे। सब पर गौर कीजिए, विवेक का इस्तेमाल कीजिए, रंगीन चश्मों से देखना बंद कीजिए, और अंग्रेजी के इस कहावत को बस यूँ ही याद करते रहिए ‘हिट देम व्हेयर इट हर्ट्स द मोस्ट’।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

 

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