Thursday, September 29, 2022
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बांग्लादेश में जो हुआ, जैसे हुआ… हिंदू क्यों न माने कि पूरी दुनिया ही उसके विरुद्ध: इकबाल कुरान रखेगा, फिर उसके मजहबी बंधु कत्लेआम करेंगे

मजहबों की यह सोच कि आधुनिक विश्व में भी सैकड़ों वर्ष पुरानी पुस्तकों की रक्षा के लिए ऐसे घिनौने अपराध जायज हैं, विश्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में इन पुस्तकों, उन्हें पढ़ने वालों और तदानुसार आचरण करने वालों का बढ़ता वर्चस्व इस विश्व को लगातार खतरनाक बना रहा है।

बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ पिछले लगभग दस दिनों में जो कुछ हुआ वह पूरी दुनिया ने देखा। वैसे भारतीय परंपरागत मीडिया में इसकी बहुत कम चर्चा हुई, पर सोशल मीडिया के भारतीय यूजर्स ने लूटपाट, हत्याओं, बलात्कार और आगजनी की यथोचित भर्त्सना की। सेक्युलर-लिबरल इकोसिस्टम के सदस्यों ने हमेशा की तरह किंतु-परंतु के सहारे हिंदुओं पर हुए भीषण अत्याचार की आलोचना की। कुछ सदस्यों ने वीडियो ट्वीट कर यह साबित करने की असफल कोशिश की कि बांग्लादेश के मुसलमानों ने भारी संख्या में एकत्र होकर हिंदुओं के पक्ष में नारे लगाए और उन्हें बचाने का उपक्रम किया। हमेशा की तरह ही ऐसे प्रयासों के विरोध में तथ्य सामने आए और फेक न्यूज़ फैलाने वालों ने हमेशा की तरह ऐसे तथ्यों को अपनी मोटी चमड़ी पर झेल लिया। 

बाइडन सरकार के होम डिपार्टमेंट ने भी इन अपराधों का संज्ञान लिया। डिपार्टमेंट के आधिकारिक प्रवक्ता ने हिंदुओं के विरुद्ध योजनाबद्ध तरीके से किए गए इन अपराधों की आलोचना की। बांग्लादेश में पीड़ित हिंदुओं के भारत में रहने वाले रिश्तेदारों और इस्कॉन के लोगों ने कोलकाता में बांग्लादेशी कंसुलेट के बाहर प्रदर्शन किया। तस्लीमा नसरीन से लेकर दक्षिण अफ्रीका के हिंदू संगठन की ओर से विरोध हुआ। इन सबके बीच इसी वर्ष संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस पार्टी और वाम मोर्चे के साथ गठबंधन करने वाले एक राजनीतिक दल के मुखिया अब्बास सिद्दीक़ी ने वीडियो जारी कर हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार को सही ठहराने की कोशिश की। अपनी गला फाड़ू तकरीर में सिद्दीक़ी ने हिंदुओं को भविष्य में और भीषण परिणाम के लिए तैयार रहने की धमकी भी दी।  

कुछ बुद्धिजीवीनुमा बंगाली सिनेमा कलाकारों ने चिंता प्रकट करते हुए यह कहा कि बांग्लादेश के मुसलमानों को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए कि उसका फायदा सांप्रदायिक शक्तियाँ उठा लें। मानो बांग्लादेश में जो कुछ किया गया वह सांप्रदायिक नहीं था। एक शुतुरमुर्ग अपना सिर रेत में बार-बार घुसाकर रखना चाहे तो रखे, पर दूसरों से भी वही अपेक्षा रखना अटपटा लगता है। 

हिंदुओं के विरुद्ध इतने बड़े स्तर पर हुई हिंसा के बाद जब तथाकथित तौर पर कुरान का अपमान करने वाले की पहचान इक़बाल हुसैन के तौर पर हुई है तो अब उन लोगों की प्रतिक्रिया का क्या होगा जो हिंदुओं द्वारा बार-बार यह कहने को मान ही नहीं रहे थे कि हिंदुओं के साथ हुआ अत्याचार एक साजिश का नतीजा है? अब भी क्या किसी को इस बात में संदेह है कि जो भी हुआ वह बिना किसी योजना के नहीं हो सकता था? जिस देश में हिंदू दशकों से हमले झेल रहे हैं और लगातार कम होते जा रहे हैं, उस देश में क्या वही हिंदू अचानक इतने वीर हो जाएँगे कि कुरान को अपने देवता के चरणों में रख देंगे? एक जगह होने वाले कुरान के तथाकथित अपमान के विरोध में कुछ ही समय में इतने अधिक स्थानों पर हिंदुओं पर इतने बड़े और इतने तरह के अपराध सामान्य बात हैं? 

दुर्गा पूजा पंडालों पर आक्रमण, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को खंडित करना, मंदिरों का जलाया जाना, लोगों की हत्या और महिलाओं का बलात्कार, कुरान के तथाकथित अपमान के खिलाफ यह सब मुसलमानों के लिए सामान्य व्यवहार हो सकता है, हिंदुओं के लिए नहीं। कोई हिंदू अपने समुदाय की किसी धार्मिक पुस्तक के किसी अपमान के विरोध में ऐसा कुछ करने की कल्पना भी नहीं कर सकता। वह तो आज के भारत में भी अपने मंदिरों की रक्षा नहीं कर पा रहा है, क्योंकि इसे वह आज भी संविधान सम्मत प्रशासन की जिम्मेदारी मानता है। प्रशासन ने उसके विश्वास को कितना फलीभूत किया है, यह जानने के बावजूद हिंदू आज भी उसी प्रशासन पर भरोसा करता है।

बांग्लादेश के विभिन्न भागों में हिंदुओं के जिन संस्थानों और मंदिरों पर आक्रमण हुआ उनमें नोआखाली में इस्कॉन मंदिर प्रमुख था।इन सबके ऊपर त्रासदी यह कि इस्कॉन के बांग्लादेश चैप्टर का अकाउंट ट्विटर द्वारा इसलिए हटा दिया गया क्योंकि उस अकाउंट से बांग्लादेश के विभिन्न हिस्सों में हिंदुओं के विरुद्ध किए जा रहे अपराधों की रिपोर्टिंग हो रही थी। 

किसी देश के अल्पसंख्यकों के विरुद्ध होने वाली इस स्तर की हिंसा की रिपोर्टिंग यदि उस देश की परंपरागत मीडिया न करे और पीड़ित खुद उसे रिपोर्ट करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लें तो उसका सोशल मीडिया अकाउंट डिएक्टिवेट/डिलीट कर देना जायज है? किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के नियम अपनी जगह, पर क्या सच को रिपोर्ट करने की आवश्यकता हर नियम से ऊपर नहीं है? ऐसे कठिन समय में किसी देश के अल्पसंख्यकों से उनके विरुद्ध हो रहे अपराध की रिपोर्टिंग का अधिकार छीन लिए जाने से शर्मनाक और क्या हो सकता है? भारत में हिंदुओं को लेकर ट्विटर की नीतियों को सबने देखा है। ऐसे में बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ किए गए ट्विटर के व्यवहार को भारत में उसकी नीतियों का विस्तार क्यों न माना जाए? ट्विटर अपने इस व्यवहार को किसी भी तरीके या तर्क से उचित ठहरा सकता है ? 

यह सब देखते हुए यदि हिंदू यह सोचने लगे कि पूरी दुनिया ही उसके विरुद्ध है तो इसमें आश्चर्य कैसा? 

आधुनिक वैश्विक परिवेश में पवित्र धार्मिक पुस्तकों के अपमान पर क्या प्रतिक्रिया हो, इस पर बहस की आवश्यकता है। यदि एक समुदाय अपनी धार्मिक पुस्तकों, देवताओं के अपमान के खिलाफ कानून के पास जाए और बाकी समुदाय उस अपमान के विरोध में हत्या, बलात्कार और हिंसा करें तो यह हर काल की सबसे बड़ी त्रासदी है। यह किसी भी वैश्विक व्यवस्था के लिए सबके बड़ी चुनौती है। मजहबों की यह सोच कि आधुनिक विश्व में भी सैकड़ों वर्ष पुरानी पुस्तकों की रक्षा के लिए ऐसे घिनौने अपराध जायज हैं, विश्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में इन पुस्तकों, उन्हें पढ़ने वालों और तदानुसार आचरण करने वालों का बढ़ता वर्चस्व इस विश्व को लगातार खतरनाक बना रहा है। 

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