हिन्दू, मुसलमान से घृणा करने लगा है: कमलेश की हत्या के बाद वामपंथी हिन्दू को ही गुनहगार कह रहे हैं!

संख्या बल तुम्हारे साथ है, गलत भी तुम्हारे साथ हुआ है, मारा तुम्हारा साथी गया है और तुमसे कहा जा रहा है कि घृणा भी तुम्हीं फैला रहे हो। सवाल यह है कि हिन्दू इस नैरेटिव में फँसेगा या सीधा सवाल करेगा कि कमलेश की हत्या व्यक्ति ने की या मजहब ने? जवाब आपके पास है, उसे हर जगह लिखिए, पूछिए, बताइए।

ट्विटर और फेसबुक पर आज-कल एक नई बात सामने आ रही है: हिन्दू घृणा फैला रहे हैं, मुसलमानों के खिलाफ संगठित होने के लिए आवाज़ उठा रहे हैं, ब्ला-ब्ला-ब्ला… सारे हैंडल या तो वामपंथियों के हैं या उनके नाम एक खास मजहब से ताल्लुक रखते हैं। अब मजहब का नाम लेने से भी बचता हूँ क्योंकि मिठाई के डब्बे में चाकू ले कर कौन दरवाजे पर आ जाए, और हाथ-पैर पकड़ कर रेत दे, कोई नहीं जानता।

कमलेश तिवारी की हत्या हुई, गर्दन हलाल किया गया, कुछ मीडिया रिपोर्ट की बात मानें तो तेरह बार गर्दन पर चाकू से हमला हुआ, एक बार गर्दन में चाकू मार कर रीढ़ की तरफ खींचते हुए शरीर का फाड़ दिया गया। गर्दन पर कैसे निशान हैं, वो तो आप सब ने देखे ही होंगे। छाती पर भी तस्वीरों में पाँच-छः बार चाकू से गोदने के चिह्न दिख ही रहे हैं।

नृशंस हत्याएँ होती रही हैं, पूरी दुनिया में होती हैं, और होती रहेंगी, आपसी दुश्मनी में लोग कई बार क्रूरता की हदें पार कर देते हैं। लेकिन ये दुश्मनी आपसी नहीं थी। ये दुश्मनी तो एक हिंसक विचारधारा और मजहबी उन्माद से सनी हुई उस सोच से उत्पन्न हुई, जहाँ कोई फतवा जारी कर देता है, और लाख लोग किसी की हत्या करने के लिए, बेखौफ तैयार हो जाते हैं। किसी ने ये भी नहीं देखा कि कमलेश तिवारी ने क्या कहा था, किस संदर्भ में कहा था, जो बोला जा रहा था, वो कब और कैसे कहा था। लेकिन किसी दाढ़ी वाले ने, टोपी लगा कर, लाउडस्पीकर पर चिल्ला कर कह दिया कि फलाने का अपमान हुआ है, गर्दन काटो इसकी। गर्दन काट दी गई।

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हिन्दुओं से डरने का हक भी छीन रहे हैं लोग

ऐसी हत्याएँ समाज और देश की चेतना को झकझोड़ देते हैं। एक आम आदमी इस देश की न्याय व्यवस्था की प्रक्रिया से गुजरते हुए, उसका सम्मान करते हुए, जेल जाता है, शारीरिक और मानसिक यातनाएँ झेलता है, जबकि उसका अपराध बस ऐसा ही है कि लाखों लोगों द्वारा उसी तरह की बातें हर रोज सोशल मीडिया पर होता हैं, लेकिन उन पर कोई कानून कुछ भी काम नहीं करता। वो आदमी बाहर आता है, एक खास मजहब के लोग, जिसका नाम लेना भी आज-कल गुनाह हो गया है, ताक में रहते हैं कि कब दबोचें और मार दें। फिर एक दिन उसे मार देते हैं।

इससे उस धर्म के लोगों में डर फैलता है जो स्वतः हिंसक नहीं रहा। हिन्दू आज किस कदर खौफ में जी रहे हैं, वो सोशल मीडिया पर दिख रहा है। लोग इसलिए डर रहे हैं कि कोई उनके धर्म के देवी-देवताओं पर अश्लील बातें करे, वो तो बच जाएगा लेकिन आप ने अगर दूसरे मजहब वाले को उसी भाषा में जवाब दिया तो आपको मिठाई के डब्बे में चाकू और पिस्तौल के साथ कोई अशफ़ाक़ या मोइनुद्दीन हलाल कर देगा।

अगर वो डर रहा है तो अब वामपंथी और एक खास मजहब के लोग हिन्दुओं से डरने का अधिकार भी छीन लेना चाहते हैं। मतलब, हिन्दू डर भी नहीं सकता। उसके सामने, सिर्फ और सिर्फ, मजहबी कारणों से किसी की गला रेत कर, हलाल स्टाइल में हत्या की जाती है, क़ातिल जान-बूझ कर गोली मारने के बाद संदेश देने के लिए समय ले कर हलाल करता है, और हिन्दुओं से कहा जा रहा है तुम्हारा डर गलत है, हम तो शांतिप्रिय लोग हैं, हमारे फलाने तो प्रेम की बातें करते हैं, इसलिए तुम भी प्रेम की बात करो।

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ट्विटर पर प्रेम की बात, पर वास्तव में गला रेतने को मौन सहमति

इसी को कहते हैं मुद्दे से भटकाना। मुद्दा है कमलेश तिवारी की हत्या और उसमें शामिल इतने लोग, जो लखनऊ, बरेली और सूरत तक फैले हुए हैं। मुद्दा है कि इसकी योजना बनाई गई, और किसी ने समय ले कर गोली मारने के बाद भी उसे हलाल किया, ताकि हिन्दुओं को संदेश जाए। मुद्दा यही है। और वामपंथी लम्पट समूह और खास मजहब के लोग वहाँ से भटक कर ये बता रहे हैं कि फलाना तो शांति की बात करते हैं, हमारा मजहब तो शांतिप्रिय है।

इसके लिए आम बोल-चाल में उपयोग होने वाला एक उचित शब्द याद आता है: घंटा! सारा विश्व तुम्हारी इस शांतिप्रियता को देख रहा है, और भोग रहा है। हर दिन होती सामूहिक हत्याएँ, बम धमाके, आत्मघाती हमले और मजहबी उन्माद को सर में लिए घूमते आम लोग, हर उस जगह के लोगों का जीना हराम कर रहे हैं, जहाँ वो हैं। दूसरी तरफ ये लोग हैं जो इन दुष्कृत्यों को डिफेंड करते हैं, टीवी पर कहते हैं कि कमलेश तिवारी ने जो किया, उसे उसकी उचित सजा मिली।

इसलिए, सोशल मीडिया पर खूब ज्ञान की बातें करो, लेकिन सत्य यही है कि वास्तव में हर वो जगह इस मजहबी हिंसा का शिकार है जहाँ ये थोड़ी भी ज़्यादा संख्या में हैं। म्याँमार में जिन लोगों ने बौद्ध भिक्षुओं को आत्मरक्षा में हिंसा करने को मजबूर कर दिया, उन्हें और किसी नजरिए से देखा जाए? ये जो ट्विटर पर ज्ञानवाणी कार्यक्रम चला रहे हैं, उन्होंने एक बार भी नहीं कहा कि कमलेश तिवारी की हत्या मजहबी उन्माद का परिचायक है, और फलाने मजहब से ताल्लुक रखने के कारण वो लोग इसकी भर्त्सना करते हैं।

इसलिए, आज अगर हिन्दू डरा हुआ है, चिंतित है, अपने ही देश में एक खास तरह के विचार रखने वालों से बच कर चलता है, तो उसका कारण हिन्दू नहीं है। उसका कारण उसी मजहब के वो लोग हैं जो चुप हैं। उसका कारण यही ज्ञानी लोग हैं जो कभी भी इस्लामी आतंक की निंदा नहीं करते। उसका कारण हर वो आदमी है जो इस तरह की बातों पर चर्चा नहीं करता और एक खास मजहब के लोगों को सही राह नहीं दिखाता। इसलिए, हिन्दुओं के खौफ में होने का कारण वही हैं जिनके नुमाइंदों ने कमलेश का गला रेता।

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क्या हिन्दू घृणा करता है मुसलमानों से?

नहीं, हिन्दू डरा हुआ है मुसलमानों से क्योंकि एक भी मुसलमान यह नहीं कह रहा कि जिसने भी कमलेश का गला रेता उसने गलत किया और ये कानून विचित्र है जिसमें किसी के कहने भर से लोगों को जेल में रहना पड़ता है, और जेल से बाहर आने पर पूरे आसार हैं कि उसे हलाल कर दिया जाएगा। इसलिए हिन्दू घृणा नहीं कर रहा, वो प्रतिक्रिया दे रहा है। इस प्रतिक्रिया के पहले की क्रिया एक खास मजहब के लोगों ने की, और हिन्दू अपनी आवाज उठा रहा है।

हर हिन्दू को एक साथ हो कर इस देश की सरकार से, इस देश के मुसलमानों से, इस देश के बुद्धिजीवियों से एक ही सवाल पूछना चाहिए कि कमलेश तिवारी की हत्या क्यों हो जाती है? आखिर इन मौलवियों को ऐसे फतवा देने पर जेल में क्यों नहीं डाला जाता? ये तो आग लगाने वाले लोग हैं जिनके हाथों में मजहब को राह दिखाने की बागडोर दे दी गई है। कहा जाता है कि फतवा लाने वाले लोग पढ़े-लिखे और समझदार होते हैं।

अब सवाल यह है कि इन्होंने क्या पढ़ा, क्या लिखा और समझदारी किस चीज की है? क्योंकि पढ़ने-लिखने वाले समझदार लोग किसी की गर्दन उतार लेने की बातें तो नहीं करते। जब मजहब शांतिप्रिय है, तो इसके मानने वाले इस तरह के कैसे हो गए हैं जो या तो कमलेश तिवारी जैसों का गला रेतने के लिए छुरा तेज कर रहे हैं, या हत्या के बाद नाच रहे हैं?

आखिर किस तरह की शिक्षा उस आठ साल के बच्चे को दी गई होगी जो तरन्नुम में गा रहा है कि कमलेश की गर्दन काट ली जाए! उसे किसने बताया ये सब? ये जहर किस स्कूल में मिला होगा उसे? इस पर तमाम ट्विटर के शहजादे और सुल्तानों को सोचना चाहिए कि आठ साल के बच्चे को ये मार-काट कौन पढ़ा रहा है? क्या यही आठ साल का लड़का मिठाई के डब्बे में छुरा ले कर कल को किसी की गर्दन नहीं काट लाएगा अगर उसे कोई ऐसे ही समझा दे? कैसा समाज बनाना चाह रहे हो भाई जहाँ ऐसे बच्चों की फौज खड़ी कर रहे हो जो किसी झूठी बात पर हिन्दुओं को मारने के लिए तैयार हो रहा है? और फिर कहते हो हम तो शांतिप्रिय हैं। इसलिए मेरा जवाब वही है कि घंटा शांतिप्रिय नहीं हो तुम लोग! बस आग लगाना चाहते हो इस देश में।

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क्या हिन्दुओं की प्रतिक्रिया हेट-स्पीच है?

हेट-स्पीच होता क्या है? ‘हेट स्पीच’ अंग्रेज़ी का वो शब्द है जिसका विडम्बनापूर्ण आविष्कार वामपंथियों ने किया है। विडंबना इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि अगर आप स्वतंत्र अभिव्यक्ति या ‘फ्री स्पीच’ में विश्वास रखते हैं, तो फिर कोई भी ऐसी बात, जो इस पर किसी भी तरह का ब्रेक लगाती है, वो ‘फ्री स्पीच’ की मूल भावना के खिलाफ हो जाती है। वामपंथी हमेशा फ्री स्पीच का झंडा लेकर दौड़ते हैं, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे‘ फ्री स्पीच है।

दूसरी बात जो ये वामपंथी चम्पक गिरोह और मीडिया का समुदाय विशेष करता पाया जाता है, वो यह है कि जब तक आपने इनसे सहमति दिखाई तब तक ही वो बात मान्य है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है। अगर आप इनके गिरोह के बाहर के हैं, इनसे अलग विचार रखते हैं, तो वो फ़ौरन ‘हेट स्पीच’ यानी ‘घृणा पैदा करने वाला भाषण’ कह दिया जाएगा। असहमति और उनकी विचारधारा से अलग होना स्वतः आपको घृणा फैलाने वाला बना देता है।

इसलिए, कमलेश तिवारी की हत्या एक मजहब की सामूहिक घृणा से जन्मा प्रतिशोध का कार्य नहीं है, लेकिन कमलेश तिवारी की हत्या के विरोध में अगर कुछ हिन्दू खड़े हो कर आवाज़ उठाते हैं तो इन वामपंथियों और खास मजहबी नामों वालों को स्थान विशेष में असह्य पीड़ा उठने लगती है। इनकी धूर्तता पर गौर कीजिए कि हत्या पर कोई चर्चा ही नहीं करनी, लेकिन हत्या के बाद अगर कोई अपनी बात कह रहा है, जिसका अधिकार भारत का संविधान देता है, तो वो हो गया ‘हेट स्पीच’!

कब तक ये लोग ठगते रहेंगे और कब तक हिन्दू ठगे जाते रहेंगे ऐसी मीठी, लेकिन जहर बुझी बातों से? आप सोचिए कि किस स्तर की घृणा है इनके मन में हिन्दुओं के लिए कि एक नृशंस हत्या को दरकिनार कर के ये बात को मोड़ कर वहाँ ले आते हैं जहाँ हिन्दू ही वापस गुनहगार दिखने लगता है। ऐसा करने के लिए किस स्तर का दोगलापन लाना पड़ता होगा अपने विचारों में, इस पर हिन्दुओं को, इसके बुद्धिजीवियों को, ओपिनियन मेकर्स को सोचना होगा।

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प्रिय हिन्दुओ! तुम्हें संगठित तो होना ही पड़ेगा

अब हिन्दुओं को लिए ऐसे भयावह समय में, जहाँ एक खास मजहब का व्यक्ति दो महीने से अपने मजहबी फतवे की तामील करने के लिए कोर्ट-प्रशासन से स्वयं को अलग और ऊपर मानते हुए, योजनाबद्ध तरीके से गोली मारने के बाद गला रेत कर किसी हिन्दू की हत्या कर देता है, इनसे बचने के लिए संगठित तो होना ही पड़ेगा। ये प्रशासनिक खतरा नहीं है कि प्रशासन इससे निपटेगा, ये सामाजिक खतरा है जिसके लिए आत्मरक्षा के लिए कई स्तर पर तैयारी आवश्यक है।

राजनैतिक दृष्टिकोण से भी देखें तो जब तक हिन्दू इकट्ठा हो कर, एक दवाब समूह बन कर, अपनी उपस्थिति और अपरिहार्यता नहीं दिखाएगा, तब तक पार्टियाँ भी इन्हें ‘फॉर ग्रान्टेड’ ले कर चलती रहेंगी। ‘फॉर ग्रान्टेड’ का मतलब है कि तुम अपरिहार्य नहीं, तुम बस हो, और हमें पता है कि तुम कुछ कर नहीं सकते। राजस्थान और मध्यप्रदेश चुनावों में इसकी एक झलक दिखी थी कि अगर आप एक बड़े समूह को लगातार ढकेल कर कोने में ले जाओगे तो वो छटपटाहट में आपका नाक तोड़ सकता है।

सरकार दर सरकार, पार्टी दर पार्टी, हिन्दुओं को इस तरह से देखती रही है जैसे उनका हित कुछ है ही नहीं। दूसरी सबसे बड़ी आबादी को अल्पसंख्यक कहना, उन्हें उन जगहों पर भी अल्पसंख्यकों वाली योजनाओं का लाभ देना जहाँ वो बहुसंख्यक हैं, ये बताता है कि भले ही सरकार बदल गई है लेकिन इन बातों पर ध्यान देने का समय किसी के पास नहीं। अल्पसंख्यक तो हिन्दू भी हैं कई राज्य में, उन्हें सुविधा क्यों नहीं मिलती?

कायदे से हिन्दू समूहों को इन बातों को मुद्दा बना कर, हर चुनाव में, इसे चर्चा में लाना चाहिए कि अल्पसंख्यक होने की पहचान पंचायत स्तर पर हो न कि राष्ट्रीय स्तर पर। सबसे बड़ी बात आती है कि अल्पसंख्यकों को दबाया जाता है, जहाँ बहुसंख्यक होते हैं। लेकिन, जब पंचायत में सबसे बड़ी संख्या तुम्हारी, तब तुम अल्पसंख्यक कैसे? जिले में सबसे बड़ी आबादी तुम, तो वहाँ तुम अल्पसंख्यक कैसे? राज्य में बहुसंख्यक तुम तो वहाँ अल्पसंख्यक का दर्जा कैसे?

बात इस पर नहीं है कि उन्हें क्या मिल रहा है, बात इस पर है तुम्हें क्यों डरना पड़ा रहा है इस देश में? हिन्दुओं को भारत में डर क्यों लग रहा है? क्या हिन्दू ये सुनिश्चित करेगा कि वो राजनीति में अपनी उपस्थिति दिखाए। और उपस्थिति से मतलब यह नहीं है कि लाख लोगों की रैली में भगवा झंडा ले कर नारे लगाए। उपस्थिति दर्ज कराने का आशय इससे है कि अपने स्थानीय नेताओं से ले कर, सांसद और प्रधानमंत्री तक को, चिट्ठी लिख कर सवाल पूछो कि कमलेश तिवारी मर तो गया, लेकिन मरा कैसे?

संगठित होने पर एक लाख लोगों ने बिहार और भारत, दोनों सरकारें, गिरा दी थीं। बस एक लाख लोगों ने। कोई हिंसा नहीं, बस एक तरह का ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ कह लीजिए। क्या हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर, अपनी उँगलियाँ चला कर, हर वामपंथी चम्पक और मजहबी उन्माद को डिफेंड करने वाले खास नामों को आईना दिखा सकते हो?

क्योंकि संख्या बल तुम्हारे साथ है, गलत भी तुम्हारे साथ हुआ है, मारा तुम्हारा साथी गया है और तुमसे कहा जा रहा है कि घृणा भी तुम्हीं फैला रहे हो। सवाल यह है कि हिन्दू इस नैरेटिव में फँसेगा या सीधा सवाल करेगा कि कमलेश की हत्या व्यक्ति ने की या मजहब ने? जवाब आपके पास है, उसे हर जगह लिखिए, पूछिए, बताइए। …और तब तक पूछिए जब तक सही जवाब नहीं मिले। …और सही जवाब सिर्फ़ वही है जो आप सुनना चाहते हैं।

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