जामिया में मजहबी नारे ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ क्यों लग रहे? विरोध तो सरकार का है न?

ये न तो विद्यार्थी हैं, न प्रदर्शनकारी, ये इस्लामी कट्टरपंथ के वो नुमाइंदे हैं जिनका ख्वाब मुसलमानों के लिए अलग दुनिया बसाने की है, जहाँ कोई हिन्दू निगाह के दायरे में न बचे। ये 'उम्माह' की चाहत रखने वाले 'मुसलमान' हैं, 'विद्यार्थी' नहीं।

जिस कानून से भारतीय नागरिकों का कोई लेना-देना है ही नहीं, उस कानून के विरोध में जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी प्रदर्शन कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? क्या ये अनपढ़ लोग हैं जिन्हें यह मालूम नहीं कि इस कानून की मदद से किसी बाहरी देश के नागरिक को, भारत की नागरिकता दी जाएगी? या फिर इन विश्वविद्यालयों के नाम का ‘इस्लामिया’ और ‘मुस्लिम’ अपने ‘उम्माह’ के लिए खड़ा हो रहा है कि दुनिया के सारे मुस्लिम एक हैं, वो एक कौम हैं, और उसके लिए वो हमेशा खड़े होंगे?

चलिए मान लेते हैं कॉलेज में युवा जोश उफान पर होता है, और कॉलेज के बच्चों के मानसिक विकास के लिए सवाल उठाना, विरोध करना, सरकार के खिलाफ खड़े होना न सिर्फ एक आम बात है, बल्कि ऐसा अपेक्षित भी है। अपेक्षित इसलिए क्योंकि स्कूल के यूनिफॉर्म कल्चर से बाहर आ कर, हर तरह की स्वच्छंदता को समझने के लिए कॉलेज-विश्वविद्यालय काल में सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर आवाज उठाना, विद्यार्थियों की वैयक्तिक और सामूहिक सोच को बेहतर बनाता है।

इसलिए तमाम विश्वविद्यालयों के बच्चे अलग-अलग मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन करते रहते हैं। अब आप यह देखिए कि प्रदर्शन के तरीके क्या होते हैं? आमतौर पर तख्तियाँ होती हैं, जिस पर आपने संदेश लिखे होते हैं, नारेबाजी होती है जिसमें प्रशासन, सरकार, नेता या मुद्दे को केन्द्र में रख कर सामूहिक आवाज लगाई जाती है। कई बार मोमबत्तियाँ ले कर शांत ‘कैंडल मार्च’ होता है। कई बार किसी एक जगह से दूसरे जगह जाते हुए ‘यहाँ से वहाँ तक’ नारेबाज़ी करते हुए पैदल मार्च होता है।

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अब बात करते हैं जामिया मिलिया इस्लामिया में चल रहे विरोध का। कल की खबर के अनुसार, विद्यार्थियों के पक्ष से बात की जाए तो जब पुलिस ने उनके संसद भवन तक की विरोध यात्रा को रोका, और बैरिकेड लगा दिए तो उन्होंने ‘आत्मरक्षा’ में हिंसक तरीके आजमाए। एक ने ‘क्विंट’ पर चल रहे एक विडियो में कहा कि पुलिस ने जब लाठी चार्ज किया तो संविधान हमें आत्मरक्षा में हिंसा करने का अधिकार देता है। उनकी किसी मित्र की परीक्षा होनी थी, उनके सर पर लाठी पड़ी और वो हॉस्पिटल में हैं।

घटनास्थल पर गिरे पत्थरों बड़े-बड़े टुकड़े कुछ और कहानी कहते हैं। कल ही की एक रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस के दो जवान ICU में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं, कुल 12 जवान बुरी तरह से घायल हुए हैं। उग्र प्रदर्शनकारी छात्रों ने बताया कि उनके विरोध को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आँसूगैस के गोले दागे, तो उन्होंने पत्थरबाज़ी शुरू की।

उम्माह, टू-नेशन थ्योरी, पत्थरबाजी और इस्लाम

आप गौर कीजिए कि पत्थरबाजी सिर्फ एक ही मजहब से जुड़े लोग क्यों करते हैं? कश्मीर में पत्थरबाजी कौन करते थे? काँवड़ियों पर पत्थरबाजी कौन करते थे? जून से जुलाई 2019 के बीच तोड़े गए दस मंदिरों पर पत्थरबाजी किस मजहब के लोगों ने की? दुर्गा विसर्जन और रामनवमी के जुलूस पर पत्थर कौन फेंकता है? पुलिस जब किसी आरोपित को पकड़ने पहुँचती है तो पत्थर बरसाने वाले कौन होते हैं?

कश्मीर में जब पत्थरबाजी होती थी और तमाम तरह के हिंसक प्रदर्शन होते थे, तो एक खास नारा लगता था। उसमें ‘नारा-ए-तकबीर अल्लाहु अकबर’ तो होता ही था, दूसरा नारा होता था ‘पाकिस्तान से रिश्ता क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह’। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ बहुत ही सीधा है कि पाकिस्तान से रिश्ता मजहब का है, अल्लाह वाला रिश्ता है। इसी को ‘उम्माह’ कहते हैं। ‘उम्माह’ का वास्तविक मतलब इस्लामी कौम है, जो देश और महादेश से परे, मुसलमानों के समुदाय की सबसे बड़ी पहचान है जो यह मनवाने पर मजबूर करता है कि ‘हमारे इस्लाम में ‘वंदे मातरम्’ पर मनाही है, हम नहीं गाएँगे।’

आतंकियों के समर्थन में खड़े रहने वाले सैयद अली शाह गिलानी ने साफ-साफ कहा था कि कश्मीर की समस्या इस्लामी है, राजनैतिक नहीं। वो जिन्ना के ‘हिन्दू-मुसलमान दो अलग मुल्क हैं’ को भी दोहराता है। वो ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ भी मानता है और 2010 में दिए गए एक साक्षात्कार में बताता है कि एक सेकुलर समाज में कोई भी सच्चा मुसलमान अपने मजहब को पूरी तरह नहीं निभा सकता। मतलब साफ है कि इनका लक्ष्य मुसलमानों के लिए अलग देश का है। वरना ‘वो हाफिज देगा… आजादी’ कह कर उस आतंकवादी हाफिज सईद से उम्मीद नहीं लगाती वो भीड़।

इस वर्चस्व को साबित करने के लिए इन ‘इस्लामिया’ और ‘मुस्लिम’ यूनिवर्सिटी के प्रदर्शनकारी विद्यार्थी सरकार द्वारा लाए गए बिल के खिलाफ, कौन सी नारेबाजी करते हैं? आखिर नागरिकता (संशोधन) कानून ने भारत के मुसलमानों के साथ ऐसा क्या किया है कि उन्हें प्रदर्शन करते हुए ‘नारा-ए-तकबीर’ की याद आ गई?

आखिर जामिया में चल रहे प्रदर्शन में, जिसमें ये छात्र-छात्राएँ संविधान के आर्टिकल 19 की बात करते नजर आते हैं, ‘तेरा-मेरा रिश्ता क्या? ला इलाहा इल्लल्लाह’ और ‘आज़ादी कौन दिलाएगा? ला इलाहा इल्लल्लाह’ की जगह कहाँ बनती है? एक शैक्षणिक संस्थान में, सरकारी कानून के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए इस्लामी रिश्तेदारी क्यों निकाली जा रही है? किस आजादी की बात हो रही है यहाँ?

कश्मीर की समस्या अपने पुराने रूप में तो अब है नहीं। वहाँ के लोगों की ‘आजादी’ की ख्वाहिश तो पूरी होने से रही, हाँ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर वाले जरूर आजाद कराए जाएँगे। तो फिर ‘आजादी कौन दिलाएगा’ में ये ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ क्या है?

क्या ये भीड़ किसी नेता की रैली में जुटी भीड़ है जिसे पता नहीं है कि वो वहाँ आई क्यों है? क्या आपको लगता है कि ये भीड़ किसी नेता की पढ़ाई हुई भीड़ है कि ‘मैं आगे-आगे ये बोलूँगा, तुम पीछे से ये बोलना’? ये पढ़े लिखे लोग हैं जिनके दिमाग में हर बात स्पष्ट है कि वो क्या बोल रहे हैं, कहाँ बोल रहे हैं, और क्यों बोल रहे हैं।

ये वो लोग हैं जो देश को बाँटने के सपने पाले हुए हैं। ये वो युवा हैं जो जिन्ना के मरने के बाद, पाकिस्तान बनने के बाद, हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक हिन्दुओं की सहिष्णुता का लाभ उठा कर, उन्हें फिर से उसी दौर में पहुँचाने की ख्वाहिश रखते हैं जब ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम पर मुसलमानों की उन्मादी भीड़ ने हजारों हिन्दुओं को एक दिन में काट दिया था। इसलिए, ये आज भी ‘हिन्दू-मुसलमान दो अलग देश हैं’ की बातों में पूरा विश्वास करते हैं, और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नाम पर बता रहे हैं कि वो इकट्ठा हो सकते हैं और आजादी माँग सकते हैं।

ये कपोल कल्पना नहीं है कि राजनैतिक मुद्दे पर विरोध करते हुए ‘नारा-ए-तकबीर’ चिल्लाया जाता है, और उसका कोई अलग मतलब नहीं है। ये बस यह बताता है कि इनकी आस्था राष्ट्र से इतर सिर्फ इस्लाम में है, संविधान की धाराएँ तो ये लोग शेक्सपीयर के ‘डेविल कैन साइट स्क्रिप्चर फॉर हिज परपस’ (यानी, शैतान अपने मतलब साधने के लिए धर्म ग्रंथों की पंक्तियाँ भी सुना सकता है) की तर्ज पर जब-तब करते रहते हैं।

संविधान में आस्था है तो हर राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान करो। संविधान में आस्था है, और उसी का सहारा ले कर प्रदर्शन कर रहे हो, तो पुलिस पर पत्थरबाज़ी कैसे कर लेते हो? वो इसलिए कि तुम्हें पता है कि वो ‘उम्माह’ तुम्हारी खातिर जहाँ कहीं भी है, उठ खड़ा होगा और बोलेगा। अगर ये प्रदर्शन सिर्फ नागरिकता कानून को ले कर होता, और तुम सिर्फ विद्यार्थी होते तो इस प्रकरण में न तो पत्थर आता, न ही अल्लाह! तुमने अल्लाह को खींच कर बताया है कि संविधान तो बस अपना हित साधने के लिए, इस्तेमाल कर रहे हो, मतलब तो तुम्हें घंटा नहीं है उससे।

ये अकेले नहीं हैं, दुर्भाग्य यही है

इस ‘आजादी कौन दिलाएगा? ला इलाहा इल्लल्लाह!’ की बात करते हुए ऑस्ट्रेलियाई एक्टिविस्ट इमाम तौहिदी की बात याद आती है, जब वो एक टॉक शो में डेव रूबिन से बात करते हुए कहते हैं, “आम तौर पर हर मुसलमान दो देशों का नागरिक होता है- एक उस देश का जिसका वह राजनीतिक रूप से नागरिक होता है और दूसरा मुस्लिम ‘उम्माह’। जब दुनिया के किसी भी कोने में बैठा कोई भी मुल्ला किसी का सर कलम कर देने का फ़तवा जारी करता है तो वह अँधेरे में तीर नहीं मार रहा होता है। उसे यह पता होता है कि उसके इस फ़तवे को पूरा करना किसी न किसी मुसलमान का फ़र्ज़ होगा।”

कमलेश तिवारी पर फतवा किसने जारी किया था? कमलेश तिवारी का गला किसने रेता? कमलेश तिवारी को हलाल करने के बाद किसी ‘इस्लामिया’ या ‘मुस्लिम’ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने सड़क पर आ कर कहा कि ये इस्लाम के खिलाफ है? कहीं किसी मुसलमानों की भीड़ ने कैंडल मार्च निकाला? ये सब नहीं होता क्योंकि एम्सटर्डम से पेरिस के शार्ली एब्दो तक इस्लामी हिंसा जायज ही नहीं, आवश्यक कह कर डिफेंड की जाती है। कितने इस्लामी आतंकी हमलों के बाद इन विश्वविद्यालयों को छात्र बाहर आ कर निंदा करते हैं कि जो हुआ वो गलत हुआ?

ऐसा नहीं होता क्योंकि मुसलमानों की सामूहिक चुप्पी एक मौन सहमति है कि वो दार-अस-सलाम की तरफ बढ़ रहा है, जिसमें ‘सलाम’ का मतलब ‘शांति’ तो ज़रूर है लेकिन वो शांति हर गैर-मुस्लिम की हत्या के बाद पैदा हुआ शांति है। इस मौन सहमति में यही पढ़े-लिखे लोग हैं जो खुलेआम यह कहने से बाज नहीं आते कि ‘हमने तुम पर दो सौ साल राज किया है, अपने पर आ गए तो भागने की जगह नहीं मिलेगी’।

इसलिए जब ये कहते हैं कि ‘हम तो शांतिपूर्ण तरीके से, संविधान के आर्टिकल 19 के तहत, इकट्ठा हो कर आगे बढ़ रहे थे’, तो ये शैतानों की तरह ग्रंथ की पंक्तियाँ दोहरा रहे होते हैं, जिसे इनके नेता संसद में ही फाड़ देते हैं। ये शक्ति प्रदर्शन है, और कुछ भी नहीं। एक कानून को ऐसे देखना जैसे कि मुसलमानों को बाहर किया जा रहा है, जबकि वो तीन मुस्लिम-बहुल राष्ट्रों के मजहबी और सियासी आतंक से त्रस्त अल्पसंख्यकों की नागरिकता के लिए है, यह बताता है कि पढ़ने-लिखने के बाद भी कुछ लोग मजहबी उन्माद से ऊपर नहीं उठ पाते।

वो वही सपने देखते हैं जो मस्जिद से नमाज पढ़ कर बाहर निकलता वो मुसलमान देखता है, जब वो हाथों में पत्थर उठाता है, मशाल लेता है और सामने आई हर चीज को तबाह कर देता है क्योंकि उसे लगता है कि ‘पाकिस्तान से रिश्ता क्या? ला इलाहा इल्लल्लाह’ उसके पत्थर फेंकने से फलित हो जाएगा। ये न तो विद्यार्थी हैं, न प्रदर्शनकारी, ये इस्लामी कट्टरपंथ के वो नुमाइंदे हैं, जिनका ख्वाब मुसलमानों के लिए अलग दुनिया बसाने की है जहाँ कोई हिन्दू निगाह के दायरे में न बचे।

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