प्रिय अमर्त्य सेन जी, ‘अल्लाहु अकबर’ कह कर हत्या करने वालों पर आपके नोबल विचारों का सबको इंतजार है

जब आप छींकते भी हैं तो वो महज आप नहीं छींकते, बल्कि नोबेल पुरस्कार से सम्मानित आदमी छींकता है। इसलिए उस पुरस्कार का लिहाज तो कीजिए। आपने कहा कि आपके विचार से, राम का बंगाल की संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि राम न होते तो बंगाल में दुर्गा पूजा ही नहीं होती।

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद से अमर्त्य सेन अमूमन वाहियात बातें बोलने के लिए ही चर्चा में आते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति के नाम पर इन्होंने जो-जो कांड किए, उसके लिए भी इन्हें याद किया जाता है। लेकिन जब-जब लोग इनके विचित्र बयानों को भूलने लगते हैं, इनका नया बयान तुरंत आ जाता है।

हाल ही में उन्होंने बताया कि ‘जय श्री राम’ के नारे का बंगाल से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि उनकी चार साल की पोती की फ़ेवरेट देवी तो दुर्गा हैं। अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा बंगाल और भारत से अलग बिताने के कारण, सेन साहब शायद भूल रहे हैं कि बंगाल में देवी दुर्गा की पूजा की शुरुआत भी तब से हुई जब से कृत्तिवासी रामायण में राम की शक्तिपूजा का संदर्भ आता है। वही रामायण और रचनाकार जिनसे वो व्यक्ति (टैगोर) भी प्रभावित थे जिन्होंने अमर्त्य सेन को उनका नाम दिया था। कृत्तिवासी ओझा ने बाल्मीकि रामायण का बंगाली अनुवाद किया था और तुलसीदास तक उनकी कृति से प्रभावित थे। यही बकवास प्रीतिश नंदी ने भी की थी तब बंगाल में राम के महत्व और ऐतिहासिकता पर एक लेख हमने लिखा था, जो कि यहाँ पढ़ा जा सकता है।

आजकल लिबरल गिरोह, जिसके सेन साहब एक जानेमाने हस्ताक्षर हैं, ‘जय श्री राम’ के नारे से समस्या पाले बैठा है। कुछ दिनों पहले इसी नारे के फ़ालतू नैरेटिव के नाम पर कि ‘गली में एक मुसलमान को ‘जय श्री राम’ न बोलने पर हिन्दुओं ने मार डाला’, मुसलमानों की भीड़ इकट्ठा की गई और दुर्गा का मंदिर तोड़ दिया गया। ये वही दुर्गा हैं जो सेन साहब की पोती की फ़ेवरेट देवी हैं। अमर्त्य सेन ने इस पर कुछ बयान नहीं दिया क्योंकि ये उन्हें सूट नहीं करता होगा।

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अमर्त्य सेन यह भूल जाते हैं कि ‘जय श्री राम’ का नारा भले ही किसी की जान न ले रहा हो, लेकिन उनके गिरोह के सदस्यों द्वारा इस नैरेटिव की हवाबाज़ी के कारण भीड़ इकट्ठा हो रही है, मंदिर तोड़ रही है, पुलिस के ऊपर हमला बोल रही है। कल ही सूरत में इसी नैरेटिव के दम पर, बिना प्राशसनिक अनुमति के मुसलमानों की एक भीड़ निकली और पुलिस पर हमला किया। पाँच पुलिसकर्मी घायल हुए, उनकी गाड़ियों में आग लगा दिया गया। अब अमर्त्य सेन ही बता दें कि इसको जलाते वक्त, पुलिस पर पत्थरबाज़ी के वक्त कौन सा नारा लगाया जा रहा होगा। उनको बोलने में परेशानी होगी क्योंकि वो नारा ‘जय श्री राम’ का तो बिलकुल नहीं था।

सेन साहब आप डेमोनाइज करते रहिए एक नारे को क्योंकि ये आपके गैंग के नैरेटिव को सूट करता है। लेकिन आप यह मत भूलिए कि आप जो कर रहे हैं वो बहुत घातक है। आप एक आग लगा रहे हैं फर्जी बातें फैला कर। आपके जैसे लोगों ने भीड़ों के हाथ में आहत होकर लड़ने का हथियार दे दिया है जो चंद मिनटों में कहीं भी इकट्ठा हो रही है और मंदिर तोड़ने से लेकर किसी की जान तक लेने को उतारू हो जाती है। दंगाइयों को अपनी हवाबाज़ी के माध्यम से लेजिटिमेसी मत दीजिए।

जब आप छींकते भी हैं तो वो महज आप नहीं छींकते, बल्कि नोबेल पुरस्कार से सम्मानित आदमी छींकता है। इसलिए जब आप कुछ भी कहते हैं तो उस पुरस्कार का लिहाज तो कीजिए। आपने कहा कि आपके विचार से, राम का बंगाल की संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। आपने कहा है, और भले ही आपको समाज शास्त्र, इतिहास या इंडोलॉजी के लिए नोबेल नहीं मिला है लेकिन आम जनता तो यही मानेगी कि सेन साहब ने कहा है तो सच ही कह रहे होंगे, पढ़े-लिखे आदमी हैं।

आज कल पढ़े-लिखे लोग आम जनता की इसी अनभिज्ञता का फायदा उठा कर अपनी धूर्तता से तथ्यों को अपने हिसाब से, ‘मेरे विचार से’ कह कर मोड़ लेते हैं। शोध के छात्र और अब प्रोफेसर बने सेन साहब को ये तो मालूम होगा कि किसी भी चीज को ‘सामान्यीकृत’ करने से पहले उस हिसाब से साक्ष्य या आँकड़े भी तो होने चाहिए। आपने दस ख़बरें सुनी या फिर आपके गैंग के लोगों ने जितनी बार ट्वीट किया, आपको लगा कि हर बार अलग घटना के बारे में कहा जा रहा है, और आप उसे ही आधार बना कर यह कह दिया कि आजकल इसका प्रयोग तो लोगों को पीटने के लिए बहाने के तौर पर इस्तेमाल होता है। ये ‘आजकल’ वाली बारम्बारता की दर कितनी है सेन साहब? उसमें भी पता चलता है कि दो मुसलमान ही एक दूसरे को वीडियो बनाने के लिए ‘जय श्री राम’ बुलवाते हैं ताकि आपके जैसों की दुकान चलती रहे।

अमर्त्य सेन साहब ने आगे कहा कि आजकल कोलकाता में रामनवमी ज्यादा मनाया जाता है जो उन्हें पहले देखने को नहीं मिलता था। सही बात है। आजकल जो हो रहा है, वो गलत क्यों है, कैसे है? दुर्गापूजा भी बंगाल में आदमी के बसते ही शुरु नहीं हुई थी। वो भी एक रामभक्त ने ही शुरु की थी। उसी तरह रामनवमी भी अगर पहले नहीं होती थी, जो कि स्वयं में एक झूठ है, तो अब होने में क्या समस्या है? ‘जय श्री राम’ बोल कर कोई देह में बम बाँध कर फट तो नहीं रहा। अगर एक त्योहार शुरु हो रहा है तो आपके पेट में मरोड़ें क्यों उठ रही हैं? आप ‘समय’ तो हैं नहीं कि आपके पैदा होने के साथ जो था वही सही और शाश्वत है, और बुढ़ापे में जो दिख रहा है वो ब्लासफेमी हो जाएगा!

सेन साहब नारा तो एक और है जिससे भारत नहीं पूरा विश्व परेशान है। वो नारा ‘जय श्री राम’ का नहीं है। आप दिमाग पर ज़ोर डालिएगा तो भी आपको याद नहीं आएगा क्योंकि वो आपके सिस्टम में है ही नहीं। वो आपने फ़ायरवाल से रोक रखा है। वो नारा न तो आपको सुनाई देता है, न ही उसके नाम पर होने वाली घटनाओं की खबर आप तक पहुँचती है, न ही आप उसे सुनना चाहते हैं।

वो नारा है ‘अल्लाहु अकबर’ का। इस नारे को चिल्लाती भीड़ मंदिर तोड़ती है, मॉब लिंचिंग करती है। इसे बुलंद आवाज में बोलते हुए बम धमाके किए जाते हैं, आत्मघाती विस्फोट होते हैं। इस नारे को चिल्लाते हुए हिंसा करने वाले पूरे विश्व के लिए एक कैंसर बन चुके हैं। यूरोप का हर बड़ा शहर इनके आतंकी दस्तखत से दहल चुका है। भारत के एक बड़े हिस्से में इसका आतंक बरक़रार है। अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक इस नारे से लड़ रहा है क्योंकि लोन वुल्फ़ हमले से लेकर सुसाइड बॉम्बिंग तक आम हो गई है।

लेकिन आपकी मति यहाँ भ्रष्ट हो जाती है। आपकी औकात नहीं है किसी भी पब्लिक स्टेज पर यह बोलने की कि ‘अल्लाहु अकबर’ का प्रयोग आतंकी हमलों के लिए किया जाता है। एक तरफ हजारों लोगों की हत्या का ज़िम्मेदार एक नारा है, दूसरी तरफ आपके पास बस इतना है कहने को कि आजकल इस नारे का प्रयोग लोगों को पीटने के लिए किया जा रहा है। पीटने के लिए उपयोग किए गए नारे में और काले झंडे पर लिख कर, अपने आत्मघाती हमले या टेरर अटैक के पहले लिखे पोस्ट या वीडियो में बोले जाने वाले नारे में ‘पीटने’ और ‘कई लोगों की जान ले लेने’ जितना का अंतर है।

आप तो ज्ञानी आदमी हैं। आपके लिए किसी को पीटना ज्यादा दुखदायी है, जान ले लेना तो दुखों का अंत करना है। एक ही दिल है सेन साहब, कितना जहर उसमें लेकर घूम रहे हो!

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