तख्ती गैंग, मौलवी क़ुरान पढ़ाने के बहाने जब रेप करता है तो कौन सा मज़हब शर्मिंदा होगा?

आज हमें कहना चाहिए कि दीनी तालीम के नाम पर बलात्कार करने वाले एक मौलवी के मजहब का रंग हरा था। सुरक्षित रहने का यही उपाय है कि हम रंगों की पहचान करना सीख सकें, ठीक उसी तरह जिस तरह से तख्ती-गैंग और मेनस्ट्रीम मीडिया ने पहचाना है।

उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मस्जिद में नमाज पढ़ाने वाले मौलाना ने 9 साल की बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया। यह घटना इतने चुपके से सामने आई है कि मेनस्ट्रीम मीडिया को अपने दफ्तर से विवेकाधीन अवकाश लेना पड़ा। आनन-फानन में छुट्टियाँ घोषित कर कर्मचारियों को घर भेज दिया गया।

हर दूसरी घटना में ‘दलित-हिन्दू-जय श्री राम’ के नारे तलाशने वाले कद्दावर जर्नलिस्ट भी कविता करते नजर आने लगे। इस सबके अलावा एक और बड़े गैंग ने अपने-अपने क्षेत्र में नकार दिए जाने के बाद सामाजिक मुद्दों पर अभिव्यक्ति प्रकट करने की जिम्मेदारी अपनाई थी। लेकिन वो भी आज नदारद ही चल रहा है। इन सबके अंतर्ध्यान होने की बड़ी वजह है। बड़ी वजह यह है कि नौ साल की बच्ची का बलात्कार करने वाला एक मौलवी है, जिसे बच्ची के माँ-बाप ने रोजाना घर पर इसलिए बुलाया था, ताकि वो उनकी बच्ची को ‘दीनी तालीम’ यानी, नमाज पढ़ना और उर्दू सिखा सके।

यह बात सही है कि दुष्कर्म/अपराध करने वालों का कोई मजहब नहीं होता है। अपराध सामाजिक घटनाओं, परिवेश और कुछ विक्षिप्त मानसिक प्रवृत्ति की ही परिणीति होती है। लेकिन हमने देखा है कि एक वर्ग है जो इन विषयों पर ‘अच्छी बातें’ तो खूब करना जाता है, लेकिन वह उसे अपनाने से बचता है। इस तख्ती-गैंग और आदर्श लिबरल-गैंग ने हमारे सामने अनेक उदाहरण पेश किए हैं, जिनसे हमें यह प्रमाण मिलते हैं कि अपराध का भी मजहब होता है।

मौलाना मोहम्मद अफजल नाम का यह बलात्कारी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में नमाज पढ़ाने का काम करता है। यदि सोशल मीडिया पर दिन-रात हिन्दुओं के प्रतीकों को अपमानित करने के लिए कमर कस कर बैठे इस आदर्श लिबरल गैंग का ही अनुसरण किया जाए, तो क्या आज हमें नमाज से लेकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बोर्ड पर कॉन्डोम नहीं लटका देने चाहिए?

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हर दूसरी घटना में भगवा और हिन्दू प्रतीकों को घुसेड़ देने वाले लोगों को क्या बलात्कारी मौलाना की हरकत में हरा रंग नजर नहीं आ रहा है? क्या ‘दीनी तालीम’ सीखाने वाले इस मौलवी को अदालत द्वारा सजा के रूप में सार्वजानिक स्थान पर उस तालीम का विरोध करने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए, जिसका सहारा लेकर उसने अपनी विक्षिप्त मानसिकता का शिकार एक नाबालिग को बनाया है?

हर दूसरे झूठे नैरिटिव को अपने मीडिया प्रमुखों के जरिए फैलाकर खुद तख्ती उठाने वाले इस गिरोह को अगर आज 9 साल की बच्ची का बलात्कार करने वाले मौलाना का विरोध करने के लिए तख्तियों की कमी पड़ रही है, तो मैं अपनी सुन्दर हैंडराइटिंग में दर्जन भर या आवश्यकतानुसार उन्हें तख्तियाँ सप्लाई करवाने के लिए तैयार हूँ। वो कैंडल, जिन्हें यह तख्ती गैंग सुविधानुसार छुपा कर रख लेता है, मैं वो भी उपलब्ध करवाने के लिए तैयार हूँ। बशर्ते, वो 9 साल की बच्ची के बलात्कार की घटना को बलात्कार करने वाले मौलवी की धार्मिक पहचान से बढ़कर समझने का हौसला दिखा सकें।

लेकिन हम सब जानते हैं कि उनके लिए यह नामुमकिन है। बात चाहे हस्तमैथुन और ऑर्गेज़्म के जरिए महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाली स्वरा भास्कर की हो या फिर उन्हीं के जैसी काम के अभाव में सोशल मीडिया पर एक्टिविस्ट्स बने फिर रहे अन्य मीडिया गिरोह हों, सब जानते हैं कि उन्हें कब कैंडल बाहर निकालनी है और किन घटनाओं का विरोध करना है।

हालात ये हैं कि मेरे जैसे किसी आम व्यक्ति को यदि किसी अपराध में शामिल आरोपित के बारे में जानना हो, तो मैं सिर्फ इन गिने-चुने दोहरे व्यक्तित्व के धनी लोगों की प्रतिक्रिया देखकर भी जान सकता हूँ। सामाजिक सद्भाव बनाए रखने का दावा करने वाले ये लोग किस प्रकार से हर दूसरी घटना में मनगढंत तरीके से हिन्दूवादी संगठनों को अपमानित करते आए हैं, इसका उदाहरण हम देखते आए हैं।

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जिस तरह से कठुआ में हुई रेप की घटना के बाद यह मीडिया गिरोह और तख्तीबाज अपने अपने बिलों से बाहर निकलकर एक घटना में ‘मंदिर-हिन्दू-पुजारी’ जैसे शब्दों को गढ़ने का प्रयास कर रहे थे, इस तरह से आज हमें कहना चाहिए कि दीनी तालीम के नाम पर बलात्कार करने वाले एक मौलवी के मजहब का रंग हरा था और जिस तालीम को सिखाने के नाम पर उसने यह घिनौना कृत्य किया है, उसके बारे में ज्यादा कुछ कहने की गुंजाइश बाकी रह ही नहीं जाती है।

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मेनस्ट्रीम मीडिया अपनी बोई हुई फसल काटने के लिए बाध्य है। उसने बिना सोचे समझे 1,000 में से किसी एक अपराध में हिन्दू या फिर ‘जय श्री राम’ के नारे का बहाना बनाकर अपनी विषैली मानसिकता को शांत करने का प्रयास किया लेकिन समाज अब उसका भुगतान एक लम्बे समय तक करता रहेगा। सवाल भी किए जाएँगे, कोई उनका जवाब देने के लिए बाध्य हो या न हो।

सवाल पूछने के शौक़ीन अब दोतरफा संवाद के इस दौर में सवालों से बौखलाने भी लगे हैं। उनकी भड़ास अब उपहास में तब्दील हो चुकी है। आप उत्पात और उपद्रव की सीमा सोच भी नहीं सकते हैं कि इसी देश-काल-वातावरण में तब क्या हो रहा होता अगर यही घटना किसी दूसरे समुदाय से जुड़ी होती। लेकिन आज कोई उपद्रव, हो-हल्ला नहीं होगा। आज उनके प्राइम टाइम में गोबर से गैस बनाने की विधि सिखाई जानी तय की गई होगी। या हो सकता है कि अम्बानी इस समय देश में कौन-कौन से प्रोजेक्ट चला रहे हैं इस पर भी विश्लेषण देखने को मिल जाए। लेकिन, ‘मौलवी-नमाज-AMU’ ये शब्द आज शब्दकोश से मिटा दिए जाएँगे।

फिलहाल, मौलवी को POCSO Act के तहत गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन उस तालीम और उस जगह के बारे में अवश्य सोचते रहिए, जहाँ-जहाँ से ये शख्स गुजरा था। जहाँ-जहाँ 9 साल की बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाने वाला मौलाना मोहम्मद अफजल दीनी तालीम के नाम पर नमाज पढ़ाता और उर्दू सिखाता था। उन सभी संस्थाओं, चाहे वो घर हो या यूनिवर्सिटी हो, सबको शक की नजर से देखना शुरू कर दीजिए। सुरक्षित रहने का यही उपाय है कि हम रंगों की पहचान करना सीख सकें, ठीक उसी तरह जिस तरह से तख्ती-गैंग और मेनस्ट्रीम मीडिया ने पहचाना है।

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