Monday, January 18, 2021
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मस्जिद में महिलाएँ Vs मर्द: बहनो… एक साथ खड़े होने का समय अब नहीं तो कब?

"एक महिला पुरुषों की इमामत कर सकती है या नहीं, पुरुष महिला के पीछे नमाज पढ़ सकते हैं या नहीं इस मामले में हमें शरियत का पालन करना चाहिए। कुरान की रोशनी में मुफ्ती हजरात क्या कहते हैं, उसी को मानना चाहिए।”

कुछ समय पहले सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर काफ़ी विवाद खड़ा किया गया था। इस दौरान मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं को दरकिनार करके हर जगह से सवाल उठाए जा रहे थे। सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश निषेध को महिलाओं के अधिकारों का दमन बताया जा रहा था। उस समय अनेकों तर्क देने के बाद भी कुछ तथाकथित फेमिनिस्टों का जोश ठंडा नहीं हुआ था, उस दौरान उन्हें किसी भी प्रकार से मंदिर में प्रवेश की लड़ाई लड़नी थी। चाहे फिर उस मंदिर से जुड़ी सभी मान्यताएँ ही क्यों न तार-तार हो जाएँ।

सबरीमाला के विवादों में घिरे रहने के बीच एक ऐसा ही मामला सामने आया है। इस मामले में और सबरीमाला में फर्क सिर्फ़ इतना है कि ये मुद्दा उस समुदाय के ठेकेदारों से जुड़ा है, जिन पर आवाज़ उठाने का मतलब ट्रोल हो जाना है। हुआ यह कि पुणे के एक मजहबी दंपति ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दायर करते हुए न्याय व्यवस्था से गुहार लगाई कि भारत के मस्जिदों में औरतों की रोक को अवैध और असंवैधानिक घोषित किया जाए।

आगे बात करने से पहले बता दूँ कि भारत में अधिकांश मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, जिसके मद्देनज़र इस दंपति ने याचिका दायर की है। याचिका में यासमीन जुबेर अहमद पीरजादे और जुबेर अहमद पीरजादे नामक दंपति ने जिक्र किया है कि कुरान और हदीस में ऐसे किसी बात का उल्लेख नहीं है, जो लिंग भेद को जरूरी बताए। इसके अलावा संविधान में प्राप्त अधिकारों को रखते हुए दंपति ने अपनी याचिका में धारा 14, 15, 21 और 25 का हवाला देते हुए इस प्रैक्टिस को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।

दंपति ने याचिका में इस बात का भी जिक्र किया है कि देश में बहुत सी औरतें इस भेदभाव से पीड़ित हैं लेकिन वो कोर्ट तक अपनी आवाज़ पहुँचाने की हालत में नहीं हैं। याचिका में इस बात का भी उल्लेख किया है कि लिंग भेद को लेकर विभिन्न जगहों पर अलग-अलग मान्यताएँ हैं। एक ओर जहाँ कनाडा के अहमद कुट्टी के अनुसार लिंगभेद की इस्लाम में कोई आवश्यकता नहीं है। वहीं दूसरी ओर सउदी अरब के अब्दुल रहमान अल-बराक इस्लाम में लैंगिक भेदभाव को मिटाने की बात करने वाले लोगों पर फतवा (डेथ वारंट) जारी कर चुके हैं।

मतभेदों के बीच दंपति की याचिका में इस बात का भी उल्लेख है कि जमात-ए-इस्लामी और मुजाहिद वर्ग के लोग महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने की अनुमति देते हैं जबकि सुन्नी समुदाय में महिलाओं के मस्जिद में जाने पर प्रतिबंध है। हालाँकि जिन मस्जिदों में महिलाओं को जाने दिया जाता है वहाँ पर उनके प्रवेश द्वार से लेकर उनके नमाज पढ़ने वाले स्थान को अलग रखा जाता है। जबकि समुदाय के सबसे पाक स्थल मक्का में इस तरह का भेदभाव नहीं किया जाता है। काबा में महिलाएँ और पुरूष दोनों गोले में बैठकर नमाज़ अदा करते हैं।

दंपति द्वारा दर्ज याचिका में दिए तर्कों से जाहिर होता है कि महिलाओं का मस्जिदों में प्रवेश निषेध होना कुरान या अल्लाह के बताए रास्तों में से एक तो बिलकुल भी नहीं हैं। बावजूद इसके कभी भी इस मुद्दे पर सवाल उठाने का प्रयास किसी तथाकथित प्रोग्रेसिव फेमिनिस्ट टाइप लोगों ने नहीं किया। गलती उनकी भी नहीं है। बीते कुछ सालों में हमारे इर्द-गिर्द जिस माहौल का निर्माण किया गया है, वो हमें अपनी छवि को बूस्ट करने के लिए हिंदू धर्म पर सवाल उठाने का ही एकमात्र विकल्प देता है। सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम लोगों की जमात है, जो दंपति के समर्थन में अपना एक पोस्ट तक लिखना जरूरी नहीं समझेंगे, न ही उनकी इस कोशिश को सराहेंगे, लेकिन वहीं अगर बात हिंदू धर्म और किसी मंदिर से जुड़ी होगी, तो उनके अधिकारों का हनन भी होगा और समाज असहिष्णु भी हो जाएगा।

याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि विधानमंडल आम महिलाओं और मजहबी महिलाओं की गरिमा और उनके समानता के अधिकार सुनिश्चित करने में विफल रहा है, विशेष रूप से तब जब बात महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश को लेकर हो या फिर उनके बुर्के पहनने को लेकर हो।

याचिका में सबरीमाला मंदिर विवाद का भी हवाला दिया गया है, जिसका फैसला सुनाते समय शीर्ष अदालत ने कहा था कि महिलाओं को पूजा-अर्चना के अधिकारों से वंचित रखने के लिए धर्म का उपयोग नहीं किया जा सकता है। साथ ही यह भी उदाहरण स्वरूप बताया गया है कि सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर की मस्जिदों में महिलाओं को जाने की अनुमति है। याद दिला दिया जाए कि सबरीमाला विवाद के दौरान महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिए ह्यूमन चेन तक बनाई गई थी, जिसमें समुदाय की महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर महिलाओं के साथ हो रहे भेद-भाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी।

ह्यूमन चेन में महिलाओं का योगदान

अब ऐसे में देखना ये है कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई करते हुए किसके पक्ष में फैसला करेगा, और मजहबी महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए कहाँ तक आवाजें बुलंद कर पाएँगी? या फिर मज़हब की बात आने पर कुरान (फर्जी मजहबी धर्म गुरुओं द्वारा परिभाषित) द्वारा दर्शाए मार्ग पर आश्रित हो जाएँगी। शाइस्ता अम्बर का कहना है, “महिलाएँ मस्जिद में नमाज पढ़ सकती हैं। महिलाएँ इमामत करते हुए दूसरी महिलाओं को नमाज पढ़ा भी सकती हैं। लेकिन एक महिला पुरुषों की इमामत कर सकती है या नहीं, पुरुष महिला के पीछे नमाज पढ़ सकते हैं या नहीं इस मामले में हमें शरियत का पालन करना चाहिए। कुरान की रोशनी में मुफ्ती हजरात क्या कहते हैं, उसी को मानना चाहिए।”

एक ओर मक्का का उदाहरण देने वाले दंपति हैं। जिन्होंने तर्कों के आधार पर अपनी याचिका की बुनियाद रखी। तो दूसरी ओर इस्लामिक पीस ऐंड डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्यक्ष मोहम्मद इकबाल के तर्क भी जरा पढ़ लीजिए। वो कहते हैं, “महिलाओं के नमाज पढ़ने के लिए देश में कई मस्जिदें हैं। कुछ जगहों पर एक महिला दूसरी महिलाओं की इमामत भी कर रही है। मालेगाँव, महाराष्ट्र के मदरसे जामिया मोहम्मदिया के परिसर में बनी एक मस्जिद में लड़कियाँ नमाज पढ़ती हैं। उनकी नमाज महिला इमाम ही पढ़ाती हैं।”

बात अगर सभी मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की हो रही है तो यह कैसा तर्क कि फलां-फलां में चले जाओ! फिर सबरीमाला मामले में मजहबी महिलाओं की वायरल होती तस्वीर क्या थी? क्या भारत के हर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है? नहीं। इसीलिए बहनो! यह सही वक्त है चोट करने का। मस्जिद में पल रही मर्दवादी सोच पर प्रहार करने का। एक साथ उठ खड़ी हो, हजारों किलोमीटर लंबी ह्यूमन चेन बनाओ। अल्लाह ने चाहा तो सुप्रीम कोर्ट भी आपके हक में फैसला सुनाएगा!

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