रवीश जी, साध्वी प्रज्ञा पर प्राइम टाइम में आपकी नग्नता चमकती हुई बाहर आ गई (भाग 4)

रवीश जैसों के अजेंडे को बाहर लाने के लिए उसकी हर बात पर लेख लिखना ज़रूरी है। उनकी हर धूर्तता पर यह कहना ज़रूरी है कि सर आपने दो बार में, एक ही तरह की बात पर दो अलग बात कही थी क्योंकि एक हिन्दू था, एक मुसलमान।

कुछ समय पहले की बात है एक नवयुवक को 1994 में पुलिस ने पकड़ा था और 2016 में उसे कोर्ट ने रिहा किया क्योंकि वो बेगुनाह था, और सबूत नहीं मिले। नाम जानना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि रवीश कुमार के प्राइम टाइम का यह इंट्रो आप आँख मूँद कर सुनेंगे तो भी आपको नाम और मज़हब का अंदाज़ा हो जाएगा। रवीश ने सालों को 365 से गुणा करके दिन निकाले और बताया कि वो संख्या कितनी बड़ी है।

सामान्य आदमी इसे देख कर दुःखी हो जाएगा कि कई बार निर्दोष लोग जेल पहुँच जाते हैं, और उन्हें न्याय के लिए कितना इंतजार करना पड़ जाता है। ये जानना ज़रूरी नहीं है कि किस सरकार के कार्यकाल में वो व्यक्ति पकड़ा गया था, और किस सरकार के कार्यकाल में रिहा हुआ। वो बताने पर दोनों का क्रेडिट गलत सरकारों को चला जाएगा। हें, हें, हें…

अब नया प्राइम टाइम आया साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर। असीमानंद और कर्नल पुरोहित को कोर्ट से राहत मिल चुकी है, और हिन्दू टेरर, या भगवा आतंकवाद की लॉबी और कोरस का सच बाहर आ चुका है। चिदम्बरम और कॉन्ग्रेस ने मुसलमानों को लुभाने के लिए जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया था, और मकोका जैसी धाराएँ लगा कर, भाजपा, संघ और यहाँ तक सेना से जुड़े डेकोरेटेड अफसर को इसमें लपेटा था, उसे कोर्ट और एजेंसियों ने बारी-बारी से या तो रिहा किया या चार्ज हटा लिए।

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रवीश कुमार एक ज्ञानी व्यक्ति हैं। ज्ञानी व्यक्ति के साथ एक समस्या होती है। चूँकि, उसके पास शब्द होते हैं, तो वो प्रोपेगेंडा करने में महारत हासिल कर लेता है। वो मुसलमान व्यक्ति पर केस साबित न होने पर आपको इस तरह के शब्द सुनाएगा कि आप रो देंगे। वो बताएगा कि जब वो जेल गया था, तब उसकी उम्र क्या थी, और बाहर आने पर कितने हजार दिन बीत गए।

मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा कहना गलत है। लेकिन प्रपंच तब बाहर आता है, और क्लीन, स्मूथ तरीके से चमकता हुआ बाहर आता है जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को, जिस पर हिन्दू आतंक की मुहर लगाकर, पुलिस ने कॉन्ग्रेस के आकाओं को संतुष्ट करने के लिए मकोका लगाया था, और उसे आतंकवादी बनाने की सारी क़वायद पूरी की, भाजपा उसे चुनाव लड़ने के लिए टिकट देती है।

यहीं पर ज्ञानी आदमी धूर्त हो जाता है। यहाँ पर वो यह भूल जाता है कि जो संवेदना उसने मुसलमान आरोपित पर दिखाई थी, जैसे 365 को सालों से गुणा करके दिनों की संख्या निकाली थी, वही संवेदना उसे उस लड़की के लिए भी दिखानी थी जिसे युवावस्था में आतंक के आरोप में जेल में जाला गया। सबूत के नाम पर एक स्कूटर जो उसने सालों पहले बेच दिया था, और उसके काग़ज़ात पुलिस को दे दिए। फिर टॉर्चर का एक निर्मम दौर जिसमें मार-पीट से लेकर अश्लील ऑडियो और विडियो दिखाने और पुरुषों के साथ जेल में रखना तक शामिल है।

यहाँ पर रवीश ने गम्भीर चेहरा बना यह नहीं कहा कि यहाँ दो तस्वीरें हैं, एक युवती की जो अपने जीवन को सही तरीके से जी रही थी, जो साधना और ईश्वर को समर्पित थी, और एक दिन पुलिस उसे उठा कर ले जाती है, उस पर भगवा आतंक का ठप्पा लग जाता है। दूसरी तस्वीर सालों बाद की है जब वो बाहर आती है, और उस पर लगे इल्जाम हटा लिए जाते हैं क्योंकि पुलिस के सबूत बेकार और कोर्ट में नकारे जाने योग्य साबित हुए।

रवीश और भी गम्भीर होकर कहते कि सोचिए उसने अपने परिवार के साथ बिताए कितने लाख सेकेंड खोए, सोचिए कि एक युवती जिसके सामने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और रचनात्मक साल थे, उसे पुलिस ने सिर्फ इसलिए नोंच लिया क्योंकि उसका कपड़ा भगवा था, और वो ईश्वर की साधना करती थी, और सबसे बड़ी बात कि वो सनातन थी, वो हिन्दू थी।

लेकिन रवीश ने ऐसा कहना नहीं चुना। रवीश भूल गए कि संविधान, कानून और चुनाव आयोग हर उस व्यक्ति को चुनाव लड़ने की आज़ादी देता है जिस पर अपराध साबित न हुए हों। रवीश का दोहरापन तब सामने आ जाता है जब वो बेगूसराय जाकर कन्हैया को लगभग माउथ-टू-माउथ फ़्रेंच किस विद टंग एक्शन दे देते हैं, लेकिन चूँकि साध्वी प्रज्ञा पर कभी आतंक के इल्जाम लगे थे तो इल्ज़ाम लगने मात्रा से आतंकी हो जाती है।

जब-जब मैं सोचता हूँ कि ये व्यक्ति और कितना गिरेगा, तब-तब यह मुझे आश्चर्य में डाल देते हैं कि अजीत भाई, ये तो इब्तिदा है, रोता है क्या, आगे-आगे देख, होता है क्या!

रवीश इतने घटिया स्तर के पत्रकार हो चुके हैं कि लालू तक के फ़ेवर में बोल लेते हैं, और ममता के बंगाल की तस्वीर बताने में उन्हें शर्म आती है, लेकिन किसी पर महज़ आरोप लगने को, अगर वो उनकी विचारधारा से अलग हो, उसे अपराधी मान लेते हैं। ये जो भी हो, पत्रकारिता तो नहीं है। रवीश को अपने दर्शकों में यह ज़हर भरने का कोई अधिकार नहीं है।

रवीश एक घोर साम्प्रदायिक और घृणा में डूबे व्यक्ति हैं जो आज भी स्टूडियो में बैठकर मजहबी उन्माद बेचते रहते हैं। साम्प्रदायिक हैं इसलिए उन्हें मुसलमान व्यक्ति की रिहाई पर रुलाई आती है, और हिन्दू साध्वी के कानूनी दायरे में रह कर चुनाव लड़ने पर यह याद आता है कि भाजपा नफ़रत का संदेश बाँट रही है।

अवसादग्रस्त रवीश के लिए उनका स्टूडियो ही लोकतंत्र के तीनों पिलर पर ब्रासो मारने वाली अकेली जगह है जहाँ वो हर सुबह इन तीनों पिलर की जड़ों में पानी डालते हैं, फिर उसके आस-पास झाड़ू लगाते हैं, और फिर ध्यान में बैठकर कहते हैं कि हे पिलरो! मैंने सालों से तुम्हारा ख़्याल रखा है, अब मैं चाहता हूँ कि मैं ही लोकतंत्र बन जाऊँ, मैं ही न्यायाधीश, मैं ही संविधान, मैं ही विधायिका, मैं ही सब कुछ हो जाऊँ। अतः, आप मेरे अंदर समाहित हो कर मुझे ऊर्जा प्रदान करें।

फिर रवीश स्वयं ही संविधान को अपने हिसाब से देखते हैं, न्यायपालिका जब उनके हिसाब की जजमेंट देती है, तो लोकतंत्र की जीत बताते हैं, वायर पर मानहानि का दावा करती है तो उसे डाँटते हैं कि आखिर जज नेताओं को कैसे एंटरटेन कर लेते हैं। वो बताते हैं कि चुनाव आयोग, या रीप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट तब ही सही होगा जब उनके द्वारा सत्यापित लोग चुनाव लड़ें। अन्यथा, बाकी किसी पर आरोप भी लगे हैं, तो भी वो चुनाव नहीं लड़ सकता।

रवीश कुमार पत्रकार हैं, और फेसबुकिया बुद्धिजीवी भी। वो जो कर रहे हैं, उसे अभिव्यक्ति कहते हैं। लेकिन वो जो कर बैठते हैं, और स्वयं को सर्वेसर्वा मान कर ज्ञान बाँच देते हैं, कि दाग़ी और ऐसे आरोप वाले लोगों को चुनाव लड़ाना गलत है, तो फिर रवीश कुमार के बौद्धिक आतंकवाद का क्या इलाज है?

स्वयं पूरी दुनिया को टीवी देखना छोड़ने से लेकर मोबाइल बंद कर लीजिए, और टीवी फोड़ लीजिए बताने वाले, स्वयं टीवी पर क्या घास छीलने आते हैं? ज़ाहिर है कि इनका प्रपंच और प्रोपेगेंडा उसी दुकान से चलेगा जहाँ हर दिन इनके चेहरे की चमक, मोदी सरकार द्वारा तमाम एलईडी बाँटने के बाद भी, मंद पड़ती जाती है।

आखिर रवीश कुमार अपने ही टाइमलाइन पर पड़ने वाली गालियों का संज्ञान लेकर, स्वयं ही इसे अपनी घटिया पत्रकारिता पर जनता की वृहद् राय मानते हुए, इसे ऑनररी (अर्थात मानद) आरोप मान कर, पत्रकारिता की दुनिया से निकल कर कहीं किसी पार्टी में क्यों नहीं चले जाते? क्योंकि इनका मालिक तो पैसों की हेराफेरी में भीतर जाएगा ही, नौकरी भी बहुत दिन नहीं कर पाएँगे।

लेकिन रवीश ऐसा नहीं करेगा। रवीश एक घाघ व्यक्ति हैं। रवीश कोर्ट पहनते हैं, और अब टाई नहीं लगाते। रवीश अब मज़े नहीं ले पाते। रवीश पूरे पाँच साल से स्टूडियो से कैम्पेनिंग कर रहे हैं। रवीश को राहुल गाँधी द्वारा ‘हम बीस लाख सरकारी नौकरियाँ देंगे’ विजनरी बात लगती है, लेकिन वो पूछ नहीं पाते कि कैसे दोगे? लेकिन रवीश मोदी जी से रात के चार बजे भी फेसबुक पर कुछ भी पूछ लेते हैं।

फ़िलहाल, रवीश की धूर्तता आती रहनी ज़रूरी है ताकि ऐसे नकली पत्रकारों पर से लोगों का विश्वास उठे जो कि समाज में घृणा और भय के अलावा कुछ नहीं पहुँचा रहा। ये वो व्यक्ति है जो शांत समुदायों को यह कह कर भड़काता रहता है कि मोदी और उसके नेता उन्हें सताते हैं, डराते हैं, उनके खिलाफ माहौल बनाते हैं। इस व्यक्ति को लोकतंत्र में कोई विश्वास नहीं क्योंकि इस लोकतंत्र ने मोदी को चुना है, और वो उस मोदी को जिसे बहुमत प्राप्त है, सुप्रीम लीडर, यानी तानाशाह कहता रहता है।

खैर जो भी हो, रवीश जैसों के अजेंडे को बाहर लाने के लिए उसकी हर बात पर लेख लिखना ज़रूरी है। उनकी हर धूर्तता पर यह कहना ज़रूरी है कि सर आपने दो बार में, एक ही तरह की बात पर दो अलग बात कही थी क्योंकि एक हिन्दू था, एक मुसलमान। रवीश जैसे लोग पत्रकारिता के नाम पर कलंक हैं, और इस बात का अच्छा उदाहरण हैं कि पक्षपाती पत्रकारिता आपको किस गर्त में ले जा सकती है।

साध्वी प्रज्ञा चुनाव लड़ेगी क्योंकि आज ही चुनाव आयोग ने उन पर उठाए जा रहे प्रश्नों को निरस्त करते हुए कहा है कि जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाते, कोई भी व्यक्ति चुनाव लड़ने को स्वतंत्र हैं। ये बात और है कि रवीश कुमार स्वयं को हर बात का सबसे बड़ा विशेषज्ञ मान कर चलते हैं, और गाँव की कहावत की तरह विष्ठा को देखने के बाद, छू कर पहचानने की कोशिश करते हैं, तब भी मन नहीं भरता तो नाक तक लाकर सूँघते हैं, और कहते हैं, ‘अरे! ये तो टट्टी है!’

हें… हें… हें…

यह रविश शृंखला पर चौथा लेख है, बाकी के तीन लेख यहाँ, यहाँ, और यहाँ पढ़ें।

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