The Print वालों, रोना बंद करो- हिन्दुओं की हालत मुसलमानों से बदतर है तुम्हारे ‘सेक्युलर’ राज में

कड़वा सच यही है फातिमा खान जी कि इस देश पर लगभग 1000 साल तक राज करने और उसके बाद से आज तक हर एक सरकार की आँखों के तारे बने रहने के बाद भी मुसलमान पिछड़ा है, 'डरा हुआ' है तो उसे अपने अंदर ही झाँक कर देखने की ज़रूरत है कि ऐसा क्यों है?

मुसलमान इस देश पर कमोबेश 700 साल राज कर चुके हैं- उससे पहले मुहम्मद बिन कासिम के 670 के दशक में सिंध पर हमले से 1200 ई. के करीब दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बीच करीब 400-500 साल मुसलमानों ने हिन्दुस्तान को लूटा, औरतों को नोंचा-खसोटा, मर्दों का कत्ले-आम किया, यानि कुल मिलाकर भरपूर राज किया। उसके बाद 90 सालों की अंग्रेजी हुकूमत में भी अधिकांश नवाबों की नवाबी सलामत ही रही, और उसके बाद नेहरू का तो यह मानना ही था कि इस देश के दो टुकड़े कर देने और लाखों के खून की होली के बाद भी मुसलमानों को ‘विशेष ध्यान से’ इस देश में रखा जाना चाहिए।

670 ईस्वी से 500 साल हमलावर-हत्यारे-लुटेरे, अगले 700 साल निरंकुश शासक, उसके बाद 90 साल के अंग्रेजी राज में सीमित शक्तियों के साथ शासन और उसके बाद 70 साल से एक सेक्युलर राज्य के ‘लाडले’ बने रहने के बाद भी अगर कोई कौम ‘भेदभाव’ की शिकायत करे तो इससे ज्यादा क्रूर मज़ाक कोई नहीं हो सकता। The Print में छपे लेख के मुताबिक़ हिंदुस्तान में मुस्लिम होना आसान नहीं- “राज्य की एजेंसियों का इस्तेमाल हमें निशाना बनाने के लिए किया जाता रहा है।” इस बेहूदा तर्क के लिए सहारा लिया जाता है कुल दो घटनाओं का- हाशिमपुरा हत्याकाण्ड, और 11 मुसलमानों को 25 साल बाद टाडा मुकदमे में बरी कर दिया जाना। महज इन दो घटनाओं के दम पर यह साबित हो गया कि मुसलमान सताई हुई ‘माइनॉरिटी’ कौम हैं।

पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार कौन?

इस लेख की शुरुआत में ही मुसलमानों को आत्ममंथन करने और अपनी कमज़ोरियों, अपने पिछड़ेपन के लिए दूसरों को दोषी ठहराने की बजाय खुद से ज़िम्मेदारी उठाने की बात करने वाले एक दूसरे लेख पर हमला किया जाता है। यह तर्क दिया जाता है कि हाशिमपुरा और टाडा से डरकर मुसलमान अपनी ‘ghetto’ के नाम से जानी जाने वाली बस्तियों तक सीमित हो गए। लेखिका फातिमा खान ने रोना रोया कि मुसलमानों में स्वच्छता की कमी की धारणा उनके खिलाफ ‘नैरेटिव’ है। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि स्कूलों, कॉलेजों आदि सार्वजनिक स्थलों पर मुसलमानों को ‘इस्लामोफ़ोबिया’ झेलना पड़ता है।

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इसके बाद ‘हर कौम को मूलभूत सुविधाएँ निष्पक्ष रूप से मुहैया कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है’ का ज्ञान बाँचा जाता है। वह इसलिए ताकि इसकी आड़ में यह घटिया तर्क दिया जा सके कि जबकि मुसलमानों ने खुद को अपनी मर्ज़ी से उन बस्तियों में कैद कर लिया जहाँ घुसने में गैर-मुस्लिमों के प्राण निकलते हों, लेकिन फिर भी उन तक मूलभूत सुविधाएँ पहुँचाना सरकार की जिम्मेदारी है।

आगे न बढ़ पहले इतने ही प्रोपेगण्डे की बात करें। तो हाशिमपुरा तो हुआ 1987 में, और टाडा के अंतर्गत गिरफ्तारियाँ हुईं 1994 में। तो हमारी पिछली पीढ़ी, और उसके पहले की पीढ़ी, और उनके भी पहले की पीढ़ी और न जाने कितनी पीढ़ियों से मौजूद मुसलमान बस्तियों के पीछे क्या था? किसका डर था? मुसलमानों में स्वच्छता के अभाव की धारणा भी, चाहे जितनी गलत हो या न हो, हाशिमपुरा से कम-से-कम दो पीढ़ी पुरानी है। रही बात अपनी जान जोखिम में डालकर इस्लामी बस्तियों में घुसने और स्वच्छता सेवाएँ पहुँचाने की, तो फातिमा जी को यह पता होना चाहिए कि अगर मुसलमानों ने ‘ghettos’ के रूप में अपनी बंद बस्तियाँ बना लीं, जिनमें कोई अपराध होने पर पुलिस भी जाने में डरती रही, तो उनमें सफ़ाई व्यवस्था पहुँचाना न ही सरकार की ज़िम्मेदारी है, और न ही सरकार ने झाड़ू लगाने या नालियाँ साफ़ करने वालों की जान खरीद रखी है कि उन्हें ज़बरदस्ती ऐसी जगह धकेल दे जहाँ जाने में हथियारों से लैस पुलिस बल भी घबराते रहे हों।

हिन्दू-मुस्लिम अशांति का ज़िम्मेदार कौन?

फातिमा के लेख में कम-से-कम एक बात की सत्यनिष्ठ अभिव्यक्ति है- हिन्दू-मुसलमान इस देश में ‘शांतिपूर्ण’ नहीं, तनावपूर्ण माहौल में ही रहे हैं; आधुनिक युग में केवल यही तनाव असल हिंसा के रूप में अभिव्यक्त होने लगा है, और सूचना-क्रांति के बाद से हमारे टीवी और मोबाइल के ज़रिए हमारी ज़िंदगियों तक पहुँचने लगा है। लेकिन फातिमा को यह बताना चाहिए कि इस तनाव के पीछे ज़िम्मेदार कौन रहा?

अगर हिन्दू जिम्मेदार रहे तो मुसलमानों (और कुछ हद तक ईसाईयों) को छोड़ कर और किसी से कभी टकराव क्यों नहीं हुआ? हिन्दू खुद में हजारों जात-पाँत, सम्प्रदाय में विभाजित रहे, लेकिन कभी सुना क्या कि किसी शाक्त क्षत्रिय ने बौद्ध पर या यहूदी पर या किसी शूद्र वैष्णव पर भी पंथिक टकराव के चलते हमला कर दिया हो? हिन्दू-इस्लामिक इतिहास लगभग इस्लाम जितना ही पुराना है, शायद एक-आध सदी का फ़र्क हो। क्या किसी भी हिन्दू राजा ने किसी भी मुसलमान को उसके मज़हब के चलते मारा है? या आधुनिक काल में भी आ जाएँ तो एक भी ऐसे हिन्दू-मुस्लिम दंगे का रिकॉर्ड है क्या जो हिन्दुओं ने भड़काया हो? या मुसलमानों के गैर-हिंसक उकसावे पर भी हिन्दुओं ने हिंसा की हो?

फिर से मॉब-लिंचिंग का झूठ

‘मॉब-लिंचिंग’ पत्रकारिता के समुदाय विशेष का नया ‘वॉट अबाउट 2002’ बन चुका है- यह जानकर भी कि काठ की यह हांडी फिर नहीं चढ़नी, कोशिश जारी रहेगी। बार-बार मॉब लिंचिंग का नैरेटिव झूठा निकला, ‘हमसे जय श्री राम बुलवाया गया’ की कलई खुल रही है, लेकिन कोशिश बदस्तूर जारी है।

हिन्दुओं की हालत

अब ज़रा फातिमा द्वारा ही तय किए गए मानदंडों पर हिन्दुओं की हालत देख लें- फिर ही यह सोचा जा सकता है कि किसे देश में शोषण और प्रताड़ना का रोना रोने का अधिकार है।

सबसे पहले स्वच्छता की बात करें। लिबरल गैंग का ही पोर्टल है लाइवमिंट। उस पर 2014 में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हिन्दू बस्तियों की हालत स्वच्छता के मामले में मुसलमानों से भी बुरी है- इतनी अधिक कि हिन्दुओं के घर शिशुओं की मौत भी गंदगी से हो जाती थी। यानि या तो गंदगी का हिन्दू-मुस्लिम कनेक्शन नहीं है, और हर गरीब, हर हाशिए पर पड़ा इंसान गंदगी में जीने के लिए मजबूर है, और नहीं तो अगर गंदगी को साम्प्रदायिक एंगल देना ही है तो रोना रोने का अधिकार तो हिन्दुओं को है!

अगर बात गलत आतंकी हमले के आरोप में ज़िंदगी बर्बाद होने की करें तो बेशक उन 11 आरोपितों के साथ गलत हुआ, लेकिन यही तो साध्वी प्रज्ञा, स्वामी असीमानन्द, और समझौता धमाकों के आरोपितों के साथ भी हुआ! उन्हें भी तो समझौता मामले में बरी कर दिया गया! उनके लिए फातिमा कूदीं पैरवी में कि इनकी ज़िंदगी महज़ शक में जेल में सड़ा कर बर्बाद मत करो, अदालत का फैसला आने दो? उनका लेख जिस पोर्टल में छपा, उसके सम्पादक शेखर गुप्ता बिना साध्वी प्रज्ञा पर मालेगाँव का आरोप साबित हुए उन्हें शर्म का विषय कहते हैं। इस पर फातिमा का क्या कहना है?

फातिमा सरकारी मशीनरी की बात करना चाहतीं हैं? जिस सरकारी मशीनरी को वह महज़ दो घटनाओं के चलते अपनी पूरी कौम के खिलाफ खड़ा मान रहीं हैं, वही मशीनरी सबरीमाला, तिरुपति बालाजी समेत हिन्दुओं के हज़ारों मंदिरों को निगल चुकी है। RTE का बोझ केवल हिन्दू शैक्षिक संस्थान उठा रहे हैं- मुसलमानों के मदरसे इससे आज़ाद हैं। सरकारी AMU और जामिया मिलिया इस्लामिया आरक्षण देने से मना करते हैं और उसके पक्ष में तोड़-मरोड़ कर कुतर्क देते हैं। केवल हमारे गुरुओं, पूजा-परम्पराओं पर ‘वैज्ञानिकता’ की आड़ में हमला ‘fair game’ और ‘free speech’ होता है। तबरेज़ और इकलाख की मौत पर मीडिया से लेकर प्रधानमंत्री तक सब बोले, भारत यादव और मंगरू का नाम भी आपको पता है?

कड़वा सच यही है फातिमा खान जी कि इस देश पर लगभग 1000 साल तक राज करने और उसके बाद से आज तक हर एक सरकार की आँखों के तारे बने रहने के बाद भी मुसलमान पिछड़ा है, ‘डरा हुआ’ है तो उसे अपने अंदर ही झाँक कर देखने की ज़रूरत है कि ऐसा क्यों है? यही नसीरुद्दीन शाह ने कहा था, जिन्हें आपने आड़े हाथों ले लिया; यही आरिफ मोहम्मद खान ने कहा, जिनपर आप हमलवार हो गईं; और यही बात उस लेख में कही गई थी, जिसके जवाब में आपने यह झूठा विषवमन किया है।

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