Wednesday, July 15, 2020
Home विचार सामाजिक मुद्दे रोजगार पर ज्ञान देने वाले ज्ञानी समुदाय के नाम

रोजगार पर ज्ञान देने वाले ज्ञानी समुदाय के नाम

हमारी समस्या यह है कि हम संदर्भ से परे, योग्यता की उपेक्षा करते हुए नौकरी तलाशते युवा वर्ग को एक ही खाँचे में रख देते हैं मानो पूरा युवा वर्ग एक तरह की दक्षता के साथ नौकरी ढूँढ रहा है। जबकि ऐसा नहीं है।

ये भी पढ़ें

अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

कुछ सेंसिबल लोगों को जब ‘रोजगार’ पर सरकार को अभी भी घेरते देखता हूँ तो मन बहुत करता है कि कुछ लिखूँ न लिखूँ, एक-दो लिंक ही दे दूँ कि आदमी पढ़ ले कि जिस 45 साल में सबसे ज्यादा दर पर हल्ला कर रहे हो, उसी मंत्रालय ने, उन्हीं अख़बारों ने, यह भी लिखा है कि निर्धारण के मानक बदल दिए गए हैं, इसलिए पिछले डेटा के आधार पर तुलना गलत है।

यही कारण है कि वो महान हस्तियाँ अब विडियो पर खुद स्वीकार रही हैं कि उनसे समझने में गलती हुई कि मोदी की योजनाओं का लाभ किसी को नहीं मिला। सत्य यह है कि रोजगार के जितने अवसर पिछले पाँच साल में बने, और लोगों को चाहे स्वरोज़गार से जीवनयापन का तरीका मिला हो, या फिर इन्फ़्रास्ट्रक्चर बनने के कारण, वो पहले नहीं हुआ

तुम ढोल पीटते रहो, रोते रहो कि नौकरी मतलब सरकारी नौकरी, एसी में बैठने वाली नौकरी। जबकि भारत जैसी जनसंख्या वाले देश में, जो समय-समय पर, वैश्विक प्रोसेस या तय तरीक़ों से अलग स्टेप को स्किप करते हुए, जम्प करते हुए, आगे बढ़ रहा है तो वो वहाँ सरकारी नौकरियों की कमी होती रहेगी। साथ ही, लगभग 90% लोग असंगठित क्षेत्रों में यहाँ रोजगार पाते हैं।

मतलब यह है कि आप माइक लेकर इस जनता के बीच जाइएगा तो आपको हमेशा बेरोज़गारी दिखेगी क्योंकि यहाँ नौकरी का मतलब सरकारी नौकरी है। उस सरकारी नौकरी में जाने का पहला कारण, बहुत बड़े प्रतिशत का, आराम करना और घूस लेने से लेकर ‘पावर मिलता है भैया’ होती है।

सारे ऐसा नहीं करते लेकिन सरकारी विभागों की इनएफिसिएंसी का ज़िम्मा तंत्र के साथ-साथ ‘अब तो लंच हो गया है’ वाले एटीट्यूड वालों को भी लेना होगा। आप खूब आदर्श व्यक्ति होंगे लेकिन आप बहुसंख्यक नहीं हैं।

सच्चाई यही है कि ट्रेडिशनल सरकारी नौकरियाँ कम होंगी क्योंकि नई तकनीक आ रही है। आप दिल्ली यूनिवर्सिटी में सिर्फ एडमिशन को ऑनलाइन कर पाए हैं और कर्मचारी यूनियन अभी भी दसियों फ़ॉर्म पेपर पर माँगता है क्योंकि वो वहाँ कम्प्यूटर नहीं चाहता, भले ही विद्यार्थी का खूब समय नष्ट हो। लेकिन ऐसे लोग एक दिन खत्म होंगे। नया विभाग बनेगा, नए अवसर पैदा होंगे।

ये एक नैसर्गिक चाल है। बाकी, अगर आप रोजगार के तमाम आँकड़ों को न मान कर ‘मैं जब मुखर्जीनगर पहुँचा तो वहाँ सारे युवा बेरोज़गार थे’ वाला लॉजिक लेकर चलिएगा तो मैं कहूँगा कि ‘मैं जब सायबर हब पहुँचा तो वहाँ सारे लोग लाखों की सैलरी पाने वाले थे, भारत बदल गया है, बेरोज़गारी शून्य प्रतिशत है’। जबकि, जितने गलत आप हैं, उतना नहीं तो थोड़ा कम गलत तो मैं भी हूँ।

फेसबुक पर मुद्दों की बात करना आपको बॉन्ड जरूर बना देगा, लेकिन आप सही नहीं हैं। एक पक्ष का डेटा लेना छोड़िए। आपके घर के आगे की सड़क टूटी है तो पूरे देश की सड़क टूटी है, ऐसा मत लिखिए। आप बेरोज़गार हैं, आप तबाह हैं, आप परेशान हैं नौकरी में तो उसके कई कारण हो सकते हैं। लेकिन, आपकी परेशानी पूरे युवा वर्ग की परेशानी नहीं है। खुद को यूनिवर्स मत समझिए, न ही उस व्यक्ति को जो हर शाम टीवी पर झूठ बोलता है और झूठ पकड़े जाने पर शेखर गुप्ता की तरह हिम्मत नहीं दिखाता कि सही बोल सके।

खैर, मुझे क्या। मैं इतनी नकारात्मकता लेकर नहीं चलता, न ही मुझे शौक है इस बात को भूलने का कि भारत में 130 करोड़ लोग हैं, आधे से ज़्यादा युवा और उनको जिस तरह की शिक्षा मिली है, जहाँ से भेड़चाल में वो सब कुछ बन गए, जिसमें उनकी रुचि नहीं थी, वो रोजगार के लिए सरकारी ऑफ़िस ढूँढ रहे हैं।

आप बेशक ढूँढते रहिए, अवसाद में चेहरा मलिन कर लीजिए लेकिन बता देता हूँ कि इस अर्थव्यवस्था में, इस जीडीपी के साथ, इस जनसंख्या के साथ, न तो आप बेहतर शिक्षा दे सकते हैं, न पोषण, न सबको सरकारी या संगठित क्षेत्रों में रोजगार। वो असंभव है इसलिए पीएचडी वाले चपरासी की नौकरी पाना चाहते हैं क्योंकि उनकी पीएचडी 5000 में ख़रीदी गई है, उन्होंने एमए कर लिया है लेकिन विषय का ज्ञान नहीं है, वो बीटेक हैं लेकिन वो नौकरी दिए जाने योग्य नहीं हैं।

अभी जो आँकड़े आए हैं उन तक पहुँचने के लिए मंत्रालय ने जो मानक तय किए थे, वो पिछली बार से बिलकुल अलग हैं। 2011-12 तक के सर्वेक्षणों में सैम्पल के रूप में लिए जाने वाले गाँवों/ब्लॉक्स में घरों के मासिक ख़र्च के आधार पर रोजगार और बेरोज़गारी के आँकड़े इकट्ठा किए जाते थे। इस बार मानक बदल कर लोगों की शिक्षा और आकांक्षाएँ हैं।

इसका मतलब है कि लोगों की शिक्षा का स्तर बढ़ा है और वो संगठित क्षेत्रों में, ज्यादा वेतन वाली नौकरियाँ करना चाहते हैं, न कि असंगठित क्षेत्रों में लेबर या वर्कफोर्स यानी कम पैसे वाली और एक तरह से मज़दूरी का काम। ये हमारे लिए सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों ही है। अच्छी बात यह है कि शिक्षा का स्तर बढ़ा है, लेकिन दुर्भाग्य यह कि जनसंख्या इतनी ज़्यादा होने के कारण हर व्यक्ति की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सकता।

स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल आदि बनाने की बातें होती हैं। मैनुफ़ैक्चरिंग पर ध्यान देने की बातें होती हैं, निवेश लाने की बातें होती हैं, लेकिन ये सारी बातें सिर्फ एक सरकार पर निर्भर नहीं। निवेश या विदेशी कम्पनियों की भागीदारी के लिए दूसरे देश और यहाँ की सरकारों द्वारा तय नियमों का पालन भी ज़रूरी है। ऐसा नहीं है कि उस पर काम नहीं हो रहा। काम हो रहा है लेकिन वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका चीन से उलझा हुआ है, चीन भारत में सामान डम्प करता है, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन के नियमों से भारत के हाथ बँधे हुए हैं।

इन सारी दिक़्क़तों को दूर करने के लिए डिप्लोमैटिक स्तर पर बातचीत ज़रूरी है। उसके बाद, भारत के कॉलेजों से निकलने वाले ग्रेजुएट या नौकरी की तलाश करते लोगों की दक्षता पर हमेशा सवाल उठे हैं। कई बार, कई बड़ी कम्पनियों ने सीधे तौर पर कहा है कि भारतीय कॉलेजों के 70% इंजीनियर काम देने योग्य नहीं होते। ये एक सतत प्रयास से दूर होगा और उसमें समय जाएगा।

सरकार जो त्वरित प्रयास कर सकती थी, वो किया है। उसमें अगर सुधार की आवश्यकता है तो वो भी होंगे। आपके पास कुछ काम का आइडिया है तो आपको लोन लेने में आसानी होगी। लाखों लोगों ने मुद्रा लोन लिया है, और वो दूसरों को भी रोजगार दे रहे हैं। भले ही सरकार के मुँह से निकलने वाले इन आँकड़ों को आप नकारते रहें, लेकिन उससे सत्य बदल नहीं जाता। आप उसी सरकार के दूसरे आँकड़े पर हल्ला कर रहे हैं क्योंकि वो आपके विचारों के अनुकूल है।

हमारी समस्या यह है कि हम संदर्भ से परे, योग्यता की उपेक्षा करते हुए नौकरी तलाशते युवा वर्ग को एक ही खाँचे में रख देते हैं मानो पूरा युवा वर्ग एक तरह की दक्षता के साथ नौकरी ढूँढ रहा है। जबकि ऐसा नहीं है। इसमें एक बड़ा हिस्सा उन लोगों का है, जो हमारे दोस्त हैं, और हम जानते हैं कि उन्होंने आँख मूँद कर एक तरह की डिग्री ले ली। हम शायद जानते हैं कि उनके पास सिर्फ डिग्री ही है, योग्यता नहीं।

इसमें भी दोष सिस्टम का है, लेकिन उतना ही दोष आपका भी कि आपने गलत योग्यता पाने की कोशिश की, जबकि आपको पता होना चाहिए था कि इस डिग्री के साथ नौकरी मिलनी मुश्किल है। हर डिग्रीधारी न तो एक स्तर की योग्यता रखता है, न ही सारे नकारे होते हैं। एक ही क्लास के बच्चे को कैम्पस सलेक्शन से नौकरी मिलती है, बहुतों को नहीं। इन बातों को हम नकार देते हैं क्योंकि सरकारों को कोसने में आसानी हो जाती है।

इसलिए असंगठित क्षेत्र में एक लेबर फ़ोर्स की तरह काम करना भी रोजगार है। उससे भी घर चलता है, वो भी काम है। अपनी शिक्षा या डिग्री का दंभ मत पालिए, आप सक्षम हैं तो नौकरी है। नौकरी खत्म है तो आपको अपना स्किल सेट दोबारा डेवलप करना होगा। लोन लीजिए सरकार से, दूसरों को रोजगार दीजिए।

क्या ये इतना आसान है? जी नहीं, फेसबुक पर रोने और ज्ञान देने से बहुत कठिन है। आप बिना भविष्य को देखे इंजीनियरिंग क्यों पढ़ रहे हैं? आपको ये समझ में नहीं आता कि जितने लाख ये पढ़ाई कर रहे हैं उतनी नौकरियाँ नहीं हैं? आपने कुछ दूसरी चीज सोची कभी करने को?

क्या इस देश में 25 करोड़ लोगों को नौकरी मिल सकती है? नहीं। यह एक सत्य है। रोजगार मिल सकता है, पेट भरा जा सकता है। रोजगार के मौके मिल सकते हैं लेकिन यह कहना कि मेरे पास बीटेक या एमबीए की डिग्री है लेकिन रोजगार नहीं, वो तो पूरी तरह से सरकार पर आरोप फेंकने की बात है क्योंकि आपने रोजगार के बाज़ार को सही से नहीं पढ़ा। आप अपनी ज़िम्मेदारी लीजिए। सारी ज़िम्मेदारी सरकार की नहीं है। कुछ आपकी भी है।

सरकार जो कर सकती है, कर रही है, आगे भी करेगी। आप खुद पर थोड़ा ब्लेम लेना सीखिए। तंत्र अगर पचास सालों से बेकार बनाया गया है तो उसे ठीक होने में भी एक पीढ़ी निकल जाएगी। लेकिन आपको क्या, आप एक तरह की चीज पढ़िए, जनसंख्या को भूल जाइए और चिल्लाइए कि रोजगार नहीं हैं। आपका दुर्भाग्य कि आँकड़े आपकी भाषा नहीं बोलते।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

ख़ास ख़बरें

कामराज प्लान: कॉन्ग्रेस के लिए दवा या फिर पायलट-सिंधिया जैसों को ठिकाने लगाने का फॉर्मूला?

कामराज प्लान। क्या यह राजनीतिक दल को मजबूत करने वाली संजीवनी बूटी है? या फिर कॉन्ग्रेस को परिवार की बपौती बनाने वाली खुराक?

₹9 लाख अस्पताल में रहने की कीमत : बेंगलुरु में बिल सुनते भागा कोरोना संदिग्ध, नहीं हुआ एडमिट

एक मरीज को कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल ने 9.09 लाख रुपए का संभावित बिल थमा दिया। जबकि उन्हें कोरोना नहीं था, वो सिर्फ कोरोना संदिग्ध थे।

विदेश में पढ़ाई के दौरान मोहब्बत, पहले मजहब फिर सारा के CM पिता फारूक अब्दुल्ला बने रोड़ा: सचिन पायलट की लव स्टोरी

सारा और सचिन पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान एक दूसरे से मिले थे। एक दूसरे को डेट करने के बाद, दोनों ने सारा के परिवार की तरफ से लगातार आपत्तियों के बावजूद 2004 में एक बंधन में बँधने का फैसला किया।

केजरीवाल शिक्षा मॉडल: ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ के सिद्धांत की भेंट चढ़ते छात्रों का भविष्य चर्चा में क्यों नहीं आता

आँकड़े बताते है कि वर्ष 2008-2015 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा परिणाम कभी भी 85% से कम नही हुआ। लेकिन राजनीतिक लाभ और मीडिया मैनेजमेंट के लिए बच्चों को आक्रामक रूप से 9वीं और 11वीं में रोक दिया जाना कितना उचित है?

दूध बेचने से लेकर हॉलैंड में F-16 उड़ाने तक: किस्सा राजेश पायलट का, जिसने सत्ता के सबसे बड़े दलाल को जेल भेजा

सत्ता के सबसे बड़े दलाल पर हाथ डालने के 2 दिन बाद ही पायलट को गृह मंत्रालय से निकाल बाहर किया गया था। जानिए राजेश्वर प्रसाद कैसे बने राजेश पायलट।

अल्लाह हू अकबर चिल्लाने वाले चोर ने बुजुर्ग पर की पॉटी, सर पर भी मल दिया

चोर ने कपड़े, टेलीफोन और तीन चाकू चुराया। इसके बाद वह भाग गया लेकिन उसके जूते वहीं छूट गए थे। वह उसे लेने के लिए वापस आया तो...

प्रचलित ख़बरें

‘लॉकडाउन के बाद इंशाअल्लाह आपको पीतल का हिजाब पहनाया जाएगा’: AMU की छात्रा का उत्पीड़न

AMU की एक छात्रा ने पुलिस को दी शिकायत में कहा है कि रहबर दानिश और उसके साथी उसका उत्पीड़न कर रहे। उसे धमकी दे रहे।

टीवी और मिक्सर ग्राइंडर के कचरे से ‘ड्रोन बॉय’ प्रताप एनएम ने बनाए 600 ड्रोन: फैक्ट चेक में खुली पोल

इन्टरनेट यूजर्स ऐसी कहानियाँ साझा कर रहे हैं कि कैसे प्रताप ने दुनिया भर के विभिन्न ड्रोन एक्सपो में कई स्वर्ण पदक जीते हैं, 87 देशों द्वारा उसे आमंत्रित किया गया है, और अब पीएम मोदी के साथ ही डीआरडीपी से उन्हें काम पर रखने के लिए कहा गया है।

‘मुझे बचा लो… बॉयफ्रेंड हबीब मुझे मार डालेगा’: रिदा चौधरी का आखिरी कॉल, फर्श पर पड़ी मिली लाश

आरोप है कि हत्या के बाद हबीब ने रिदा के शव को पंखे से लटका कर इसे आत्महत्या का रूप देने का प्रयास किया। गुरुग्राम पुलिस जाँच कर रही है।

कट्टर मुस्लिम किसी के बाप से नहीं डरता: अजान की आवाज कम करने की बात पर फरदीन ने रेप की धमकी दी

ये तस्वीर रीमा (बदला हुआ नाम) ने ट्विटर पर 28 जून को शेयर की थी। इसके बाद सुहेल खान ने भी रीमा के साथ अभद्रता से बात की थी।

मैं हिंदुओं को सबक सिखाना चाहता था, दंगों से पहले तुड़वा दिए थे सारे कैमरे: ताहिर हुसैन का कबूलनामा

8वीं तक पढ़ा ताहिर हुसैन 1993 में अपने पिता के साथ दिल्ली आया था और दोनों पिता-पुत्र बढ़ई का काम करते थे। पढ़ें दिल्ली दंगों पर उसका कबूलनामा।

विदेश में पढ़ाई के दौरान मोहब्बत, पहले मजहब फिर सारा के CM पिता फारूक अब्दुल्ला बने रोड़ा: सचिन पायलट की लव स्टोरी

सारा और सचिन पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान एक दूसरे से मिले थे। एक दूसरे को डेट करने के बाद, दोनों ने सारा के परिवार की तरफ से लगातार आपत्तियों के बावजूद 2004 में एक बंधन में बँधने का फैसला किया।

कामराज प्लान: कॉन्ग्रेस के लिए दवा या फिर पायलट-सिंधिया जैसों को ठिकाने लगाने का फॉर्मूला?

कामराज प्लान। क्या यह राजनीतिक दल को मजबूत करने वाली संजीवनी बूटी है? या फिर कॉन्ग्रेस को परिवार की बपौती बनाने वाली खुराक?

₹9 लाख अस्पताल में रहने की कीमत : बेंगलुरु में बिल सुनते भागा कोरोना संदिग्ध, नहीं हुआ एडमिट

एक मरीज को कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल ने 9.09 लाख रुपए का संभावित बिल थमा दिया। जबकि उन्हें कोरोना नहीं था, वो सिर्फ कोरोना संदिग्ध थे।

Covid-19: भारत में अब तक 23727 की मौत, 311565 सक्रिय मामले, आधे से अधिक संक्रमित महाराष्ट्र, तमिलनाडु और दिल्ली में

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, पिछले 24 घंटे में देशभर में 28,498 नए मामले सामने आए हैं और 553 लोगों की कोरोना वायरस के कारण मौत हुई है।

विदेश में पढ़ाई के दौरान मोहब्बत, पहले मजहब फिर सारा के CM पिता फारूक अब्दुल्ला बने रोड़ा: सचिन पायलट की लव स्टोरी

सारा और सचिन पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान एक दूसरे से मिले थे। एक दूसरे को डेट करने के बाद, दोनों ने सारा के परिवार की तरफ से लगातार आपत्तियों के बावजूद 2004 में एक बंधन में बँधने का फैसला किया।

फ्रांस के पिघलते ग्लेशियर से मिले 1966 के भारतीय अखबार, इंदिरा गाँधी की जीत का है जिक्र

पश्चिमी यूरोप में मोंट ब्लैंक पर्वत श्रृंखला पर पिघलते फ्रांसीसी बोसन्स ग्लेशियरों से 1966 में इंदिरा गाँधी की चुनावी विजय की सुर्खियों वाले भारतीय अखबार बरामद हुए हैं।

नेपाल में हिंदुओं ने जलाया इमरान खान का पुतला: पाक में मंदिर निर्माण रोके जाने और हिंदू समुदाय के उत्पीड़न का किया विरोध

"पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक अभी भी सरकार द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे हैं। सरकार हिंदू मंदिरों और मठों के निर्माण की अनुमति नहीं देकर एक और बड़ा अपराध कर रही है।"

केजरीवाल शिक्षा मॉडल: ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ के सिद्धांत की भेंट चढ़ते छात्रों का भविष्य चर्चा में क्यों नहीं आता

आँकड़े बताते है कि वर्ष 2008-2015 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा परिणाम कभी भी 85% से कम नही हुआ। लेकिन राजनीतिक लाभ और मीडिया मैनेजमेंट के लिए बच्चों को आक्रामक रूप से 9वीं और 11वीं में रोक दिया जाना कितना उचित है?

‘अगर यहाँ एक भी मंदिर बना तो मैं सबसे पहले सुसाइड जैकेट पहन कर उस पर हमला करूँगा’: पाकिस्तानी शख्स का वीडियो वायरल

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक युवक पाकिस्तान में मंदिर बनाने या बुतपरस्ती करने पर उसे खुद बम से उड़ाने की बात कहते हुए देखा जा सकता है।

विकास दुबे के गुर्गे शशिकांत की पत्नी का ऑडियो: सुनिए फोन पर रिश्तेदार को बता रही पूरी घटना, छीने गए हथियार बरामद

कानपुर कांड में पकड़े गए शशिकांत की पत्नी का ऑडियो वायरल हो रहा हैं। ऑडियो में शशिकांत की पत्नी रिश्तेदार को फोन करके पूरी घटना के बारे में बता रही है।

कोरोना इलाज के लिए 500 की जगह सिर्फ 80 बेड: ममता बनर्जी के झूठ का वहीं के डॉक्टर ने किया पर्दाफाश

सागर दत्त अस्पताल के इस डॉक्टर का ये भी मानना है कि ये स्थिति सिर्फ़ उनके सेंटर तक सीमित नहीं होगी। बल्कि कई अन्य कोविड सेंटर्स का भी बंगाल में यही हाल होगा और वह भी इसी परेशानी से जूझ रहे होंगे।

हमसे जुड़ें

239,591FansLike
63,527FollowersFollow
274,000SubscribersSubscribe