किसी भी कंपनी का ब्रांड अचानक हेडलाइंस में और जन-जन की जुबान पर आ जाए तो कंपनी के मार्केटिंग और ब्रांडिंग वालों की बल्ले-बल्ले हो जाती है। UGC का नाम इतने कम समय में इतनी बार पहले कब जपा गया था? बीते 10 दिनों में डिजिटल मीडिया पर UGC एक वायरल ब्रांड बन गया है। बाजार की भाषा में UGC का ब्रांड हिट है। कुछ इस तर्ज पर जैसे भोपाल में प्राणलेवा MIC गैस रिसने पर यूनियन कार्बाइड का ब्रांड हिट था।
UGC के पूर्व चेयरमैन एम जगदीश कुमार को भोपाल में अभी जिस दिन पद्मश्री का शुभ समाचार मिला तब UGC ही ट्रेंड कर रहा था। वे विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के अधिकारियों से विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल 2025 पर ही संवाद करने आए थे।
यह भारत में उच्च शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक और प्रभावी सुधार की दिशा में बनाया गया एक शानदार प्लान है। इसमें UGC, AICTE और NCTE के स्थान पर तीन स्वतंत्र परिषदों के साथ एक ही आयोग के गठन की तैयारी है। इसे तैयार करने में निश्चित ही कई सालों का अभ्यास किया गया होगा और अब इस पर व्यापक संवाद हो रहा है। पूर्व चेयरमैन से UGC की ताजा कुख्याति से जुड़े प्रश्न भी आए, जिनके उत्तर नहीं ही मिलने थे। वे केवल इसी बिल पर सीमित रहे, जिसे संक्षिप्त में VBSA-2025 कहा गया है।
एक तरफ, यह विधेयक बहुत स्पष्ट संकेत करता हुआ दिखाई दिया कि सरकार भारत के उच्च शिक्षा जगत के पूरे डिजाइन को एक नए स्वरूप में ढालने के लिए अच्छी तैयारी से अग्रसर है। इसका नामकरण ही ‘विकसित भारत’ के नाम पर है। मतलब साफ है कि उच्च शिक्षा संस्थानों, उनकी संरचना और उनके प्रबंधन को एक बड़े लक्ष्य के लिए एक नए स्वरूप में सामने लाया जाए और वह लक्ष्य है- विकसित भारत। यह ऐसे प्रयास हैं, जो किसी भी दूरदृष्टिवान सरकार से अपेक्षित हैं। पूर्व चेयरमैन के नाते एम जगदीश कुमार इस महात्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए जुटे हैं। निश्चित ही एक बड़ी टीम यह काम कर रही होगी।
दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट में कुछ पुराने मामलों की फाइलें भी सरक रही हैं। यह विश्वविद्यालयों में घटे अप्रिय घटनाक्रमों की हैं, जो एक समय मीडिया में जातीय विवादों की सुर्खियाँ बने। विषय संवेदनशील है तो निश्चित ही सरकार का पक्ष रखने के लिए उच्च शिक्षा विभाग के ‘जिम्मेदार अधिकारियों’ को इसमें लगाया ही गया होगा।
सरकार के लिए असुविधाजनक स्थिति की आशंकाओं से जुड़े मामलों में कड़ी और बड़ी एहतियातें बरती ही जाती हैं। UGC के मनीषियों को जो ‘जातीय ज्ञान’ अचानक प्राप्त हुआ है, उसकी जड़ें ऐसे ही प्रकरणों की फाइलों में फैली हैं, जिसके बारे दिशा सूत्र सुप्रीम कोर्ट से मिले होंगे। तो जिम्मेदार अधिकारियों ने ‘अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए’ वह ऐतिहासिक रचना की, जिसने चाय की प्याली में तूफान नहीं ला दिया, पूरी गरम केतली ही अयोध्या से सोमनाथ तक उड़ेल दी। किए कराए पर पानी फिरना यही है।
अब कुछ प्रश्न हैं। अव्वल तो सिस्टम में कौन क्या देख रहा है? UGC में कौन क्या देख रहा है? सुप्रीम कोर्ट में कौन क्या देख रहा है? मंत्रालय में कौन क्या देख रहा है? मंत्रालय से UGC की ओर कौन क्या देख रहा है? UGC की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कौन क्या देख रहा है? जिसे जो भी दिखाई दे रहा है, वह अपने ऊपर किसे क्या दिखा रहा है?
प्रस्तुत प्रकरण में किसे क्या दिखाई दिया और उसने उसे क्या समझा, कागजों पर क्या लिखा और अंतिम रूप से जारी करने के पहले उसने किसको क्या दिखाया और समझाया? क्या किसी की बुद्धि में नहीं आया कि इसके क्या दुष्परिणाम अगले कुछ ही घंटों में सरकार के सारे अच्छे-किए कराए पर पानी फेरने वाले हैं? या UGC में सब यह मान रहे थे कि उनके सर्कुलरों को देखता ही कौन है। आए दिन कुछ न कुछ जारी करते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में ज्यादातर फाइलों में समाते रहते हैं। साफ कहें तो डस्टबिन में। क्या UGC के बुद्धिमानों ने यह सोचा था कि यह भी ऐसा ही एक रद्दी का कागज होगा?
एक और महत्वपूर्ण बात है। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष है। देश भर में सामाजिक समरसता के सम्मेलन हो रहे हैं। ये आयोजन बड़े सामाजिक धरातल के हैं, जिनमें जातियों के छोटे और संकीर्ण दायरों से परे जाने की प्रेरणा है। संघ की समग्र शक्ति इसमें लगी हुई है और ये कोई हजारों की भीड़भाड़ वाले विशाल सम्मेलन नहीं हैं। सक्रिय रूप से सघन आयोजनों की इस श्रृंखला में संघ समाज के हर कोने का सीधा स्पर्श कर रहा है। इनकी चहल-पहल गाँव और कस्बों में हैं। बड़े शहरों के छोटे मोहल्लों के समूहों में है।
प्रधानमंत्री सोमनाथ को रेखांकित कर रहे हैं और अतीत से सबक लेने का संदेश दे रहे हैं। एक ऐसा अतीत जिसमें हमारे लिए हर तरह के भेदभाव से मुक्त एक संगठित समाज के रूप में सामने आने के संकेत हैं। न हम बटेंगे, न हम कटेंगे। हमारे बटने की बहुत बड़ी कीमतें देश ने चुकाई हैं और समाज को भी गहरे आघात झेलने पड़े हैं। इसलिए सब एक बड़े कोष्ठक में स्वयं को एक रखें, न कि छोटे और मध्यम कोष्ठकों में और उस बड़े कोष्ठक का नाम है कि हम सब हिंदू हैं। हमारी एक जाति है और एक ही धर्म है।
अब टाइमिंग महत्वपूर्ण है। ठीक ऐसे ही समय अचानक UGC की प्रयोगशाला में बैठे वैज्ञानिक एक नया रसायन लेकर आते हैं और वह सारे वातावरण को कसैले धुएँ से भर देता है। इस प्रभाव का रँग भी है, गँध भी है और स्वाद भी है। यह रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन नहीं है। सामाजिक समरसता के सम्मेलनों में हिस्सा ले रहे करोड़ों लोग एकदम से सन्नाटे में आ गए हैं। सोमनाथ से सबक ग्रहण करने की प्रक्रिया को अचानक ग्रहण लग गया है। कोई हिसाब नहीं लगा सकता कि इसमें किस-किसके हिस्से की कितनी हानि हो चुकी है और किनके चेहरे इस अचानक खुली लॉटरी से चमके हुए हैं? वे अवसरवादी जो चाहते ही हैं कि सरकार की ताकत खत्म हो और उनके अच्छे दिन लौटें। समाज बिखरे, टूटे, लड़े, भिड़े, मरे, कटे अपनी बला से।
क्या UGC में या मंत्रालय में ऐसे लोग आज भी जमा हैं, जो यह रेखांकित कर रहे हैं कि सरकार किसी की भी हो, सिस्टम में वे ही हैं और वे वह करके रहेंगे, जो वे करना चाहते हैं। अगर दुश्मनों की जमीन पर आतंकियों को निपटा रहे अज्ञात हमलावरों के पीछे कहीं भारत की प्रेरक शक्ति काम कर रही है तो अपने घर में अपने ही दीए के नीचे पसरे इस अंधेरे पर गौर करना जरूरी है। इस अंधेरे में कौन किस शक्ल में घात लगाकर बैठा है?
घात में वो जो भी है, उसने UGC के एक कागज को आगे सरकाकर वह सब कर दिया है, जो नहीं होना चाहिए था। ऐसे तत्व किसी भी पद पर हों, किसी भी विभाग में हों, संगठन में हों या सरकार में हों, इनके रहते किसी दुश्मन की जरूरत नहीं है। वे कुल्हाड़ी हाथ में लिए ही बैठे हैं। एक कुल्हाड़ी पूरी ताकत से पैरों पर मार ली गई है।
पता नहीं UGC मुख्यालय के मनीषियों में ठीक इसी समय क्या चल रहा होगा, जब चारों तरफ उनका ही नाम जप हो रहा है। उनके चियर लीडर्स किस मुद्रा में क्या भाव प्रकट रहे होंगे। UGC के महामतियों ने बैठे-ठाले किस-किस के हिस्से की कितनी हानि कर दी है, इसका हिसाब लगाना कठिन है।
UGC दिल्ली में है और दिल्ली की नाक के नीचे ऐसा कैसे हो सकता है?


