Friday, June 21, 2024
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बेगानी कामयाबी में बिहारी दीवाना, UPSC टॉपर शुभम कुमार के बहाने कुछ कड़वी बातें

शुभम की सफलता 'एक बिहारी, सौ पर भारी' जैसे जुमलों तक ही सिमट कर नहीं रह जाना चाहिए। क्योंकि जिस कटिहार से शुभम आते हैं, उसी कटिहार के मजदूर शंकर चौधरी की हत्या जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में आतंकी हमले के दौरान कर दी गई थी। सफलता के शोर में पलायन वाले मूल सवालों पर गौर करना जरूरी।

एक व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ा हुआ हूँ। इसके ज्यादातर सदस्य दिल्ली के विभिन्न मीडिया संस्थानों से जुड़े हैं। मीडिया के पेशे के अलावा इस ग्रुप के सदस्यों के बीच एक और जो बात साझा है, वह यह है कि इन सबकी जड़ें बिहार और झारखंड के उन इलाकों से है जो कागजी मिथिला राज्य का हिस्सा हैं। इसी कागजी मिथिला राज्य का हिस्सा बिहार का कटिहार जिला भी है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) 2020 की परीक्षा में शीर्ष स्थान हासिल करने वाले शुभम कुमार भी मूल रूप से इसी जिले के कदवा प्रखंड के कुम्हरी गाँव के रहने वाले हैं। पिता देवानंद सिंह उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक में शाखा प्रबंधक हैं तो जड़ें अब भी बिहार में बची हुई हैं।

शुभम की सफलता और उनकी जड़ों को लेकर पहला विवरण मैथिल पत्रकारों के इसी व्हाट्सएप ग्रुप में प्राप्त हुआ। थोड़ी देर बाद सोशल मीडिया में भी उनकी धूम दिखी। ‘एक बिहारी, सौ पर भारी’ जैसे जुमले पूरी रफ्तार से चल रहे थे। ऐसा लग रहा था कि बेबस हो पलायन करने को, महानगरों में दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को विवश बिहारियों को शुभम कुमार की सफलता के पीछे अपने राज्य के बीमारू होने का सच, सुशासन के रोम-रोम में विद्यमान नग्न छिद्रों को ढक खुद की श्रेष्ठता साबित करने का जो मौका मिला है, उसे वे किसी भी परिस्थिति में हाथ से निकलने नहीं देना चाहते।

आखिर हर साल यूपीएससी का टॉपर बिहारी होता भी तो नहीं है। देश की सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली इस परीक्षा को शुभम से पहले आखिरी टॉपर बिहार ने 21 साल पहले दिया था। शुभम सहित अब तक केवल 4 बिहारी ही इस पायदान तक पहुँचने में कामयाब रहे हैं। लेकिन, सवाल शुभम की सफलता को लेकर जश्न मनाने की इस प्रवृत्ति पर नहीं है। सवाल इन जश्नों के पीछे असली सवालों से मुँह मोड़ने की मानसिकता को लेकर है।

10वीं बिहार के पूर्णिया से करने वाले शुभम आगे की पढ़ाई के लिए बोकारो चले गए थे। 2014 में देश की एक और कठिन परीक्षा पास की और आईआईटी बॉम्बे चले गए। फिर शोध करने अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने तय किया कि उन्हें यूपीएससी परीक्षा की तैयारी करनी है।

शुभम के इस सफर में य​दि उनकी जड़ों (पैदा कहाँ होना है यह तय करना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था) को छोड़ दें तो बिहार का ​क्या योगदान है? आखिर बिहार में ऐसा कोई शैक्षणिक संस्थान क्यों नहीं है जहाँ शुभम अपनी पढ़ाई कर यूपीएससी टॉपर बनने के सपने बुन पाते? क्या शुभम की सफलता बिहार के बीमार स्कूलों का स्वास्थ्य दुरुस्त कर देगी? क्या इस सफलता से बिहार के उन सभी विश्वविद्यालयों के सत्र नियमित हो जाएँगे जो तीन साल की डिग्री देने में 5, यहाँ तक कि 6 साल भी लगा देते हैं? शायद नहीं और इस नग्न सच्चाई से हम भलीभाँति अवगत भी हैं। इसलिए शुभम के बिहारी होने का जोर-जोर से ढोल पीट हम ऐसे हर नग्न सवाल को दफन कर देना चाहते हैं जिनसे हजारों-लाखों शुभम का भविष्य जुड़ा है।

ऐसा नहीं है कि मेरा इरादा शुभम वाले बिहारी रंग में भंग डालने का है या फिर मैं ईर्ष्या से पीड़ित मैथिल हूँ। यूपीएससी की 2019 की परीक्षा में 290वाँ रैंक हासिल करने के बाद इसी शुभम ने एक साक्षात्कार में कहा था, “बिहार की हवा में ही ऐसा होता है कि सब लोग कहते हैं कि आईएस करना है, तो यह बचपन से ही ड्रीम होता है।” जाहिर है सपने आज भी बिहार की मिट्टी-पानी में जिंदा हैं और यही सपने हमारी ताकत हैं। पर यह ताकत केवल ‘एक बिहारी, सौ पर भारी’ जैसे जुमलों तक ही सिमट कर नहीं रह जाना चाहिए।

चर्चों के शोर का क्या? 2019 में इसी परीक्षा में सफल होने के बावजूद शुभम का नगाड़ा इतना नहीं बजा था। 2019 की रैकिंग से IDAS (इंडियन डिफेंस अकाउंट सर्विसेस) के लिए चयनित शुभम ताजा रैकिंग के बाद अपनी पसंद की सेवा का विकल्प चुनेंगे और कुछ दिन बाद चर्चों से गायब हो जाएँगे। अगले बरस मौसम बदलेगा और नए टॉपर का शोर मचेगा। लिहाजा फिजूल के शोर में दबते मूल सवालों पर गौर करना जरूरी है। इन सवालों से ही हर बिहारी का अस्तित्व जुड़ा है।

माटी कहे कुम्हार से

जड़ों का क्या? जड़ तो उस मजदूर शंकर चौधरी की भी कटिहार जिले में ही थी जिनकी हत्या जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में आतंकी हमले के दौरान कर दी गई। यह भी अजीब संयोग है कि चौधरी की हत्या भी शुक्रवार को हुई थी और शुभम की सफलता की खबर भी कटिहार के हिस्से शुक्रवार को ही आई। फर्क तारीखों का था। सफलता 24 सितंबर को आई, मातम 17 सितंबर के नाम रहा। तारीखों का यही फर्क बिहार का भविष्य तय करेगा। तय करेगा कि उसकी जड़ों से कितने टॉपर निकलेंगे, क्योंकि जश्न तो हम उन झा लोगों की सफलता का भी मना लेते हैं जिनके पुरखों ने कई पीढ़ी पहले पलायन कर लिया और फिर उनके बच्चों ने न मिथिला देखी और न मैथिली सीखी।

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अजीत झा
अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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