उर्मिला ‘भटकी’ मातोंडकर का राजनीति में आना देश के लिए घातक, न कि PM मोदी पर फिल्म बनना

उर्मिला मातोंडकर ने नरेंद्र मोदी पर बनी बायोपिक को आधार बनाकर कहा है कि उन पर तो कॉमेडी फिल्म बननी चाहिए। उनकी मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी फिल्म केवल एक मजाक है, क्योंकि उन्होंने अपना कोई वादा पूरा नहीं किया है।

राजनीति एक ऐसा आइना है, जो किसी भी व्यक्ति के स्वभाव और उसकी विचारधारा को जनता के समक्ष जस का तस लाकर सामने रख देता है। राजनैतिक पार्टी को दिए समर्थन से लेकर मंच पर दिए गए भाषणों के जरिए जनता किसी भी राजनेता को आँकती है और फिर तय करती है कि उसे अपना वोट किसे देना है।

बीते दिनों राजनीति में चुनावों के चलते बहुत उठा-पटक देखने को मिली। इस बीच कई बॉलीवुड कलाकारों ने राजनीति में दिलचस्पी दिखाते हुए अपनी पसंद की पार्टियों की सदस्यता भी ली। इसमें एक नाम उर्मिला मातोंडकर का भी है। उर्मिला ने कुछ दिन पहले कॉन्ग्रेस को ज्वाइन किया है। और अब वह सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन चुकी हैं।

उर्मिला ने कॉन्ग्रेस से जुड़ने के बाद एबीपी न्यूज़ पर एक इंटरव्यू दिया था। इस इंटरव्यू में उन्होंने राजनीति में कदम रखने के साथ ही भाजपा पर जमकर निशाना साधते हुए बताया था कि उन्होंने कॉन्ग्रेस को क्यों चुना है।
हमेशा से बॉलीवुड फिल्मों में अपनी अदाकारी से जलवा बिखेरने वाली उर्मिला मातोंडकर एक दम से देश के लिए इतनी जागरूक हो गईं कि उन्होंने इस साक्षात्कार में अपना दम लगाकर ये साबित करने का भरसक प्रयास किया कि पिछले 5 सालों में देश में कोई विकास नहीं हुआ है। उनकी मानें तो आजादी से पहले देश को सुई तक नहीं मिली थी, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने सत्ता में रहते हुए देश को वो सब दिया जिसकी जरूरत थी।

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हेट्रेड पॉलिटिक्स जैसे संवेदनशील मुद्दे को अपना अजेंडा बनाकर राजनीति से जुड़ने वाली उर्मिला मातोंडकर इन दिनों कॉन्ग्रेस के प्रचार-प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। वो आए दिन चुनावी रैली का हिस्सा बनी दिखाई देती हैं। हालाँकि, इस बीच वो कॉन्ग्रेस को वोट देने की अपील करने से ज्यादा भाजपा की कमियाँ जनता को गिनवाते हुए ज्यादा दिखाई पड़ती हैं।

कॉन्ग्रेस से जुड़ने के बाद उर्मिला ने अपना पक्ष एकदम स्पष्ट कर लिया है। वो जान चुकी हैं कि इन चुनावों में जनता को मोदी सरकार के ख़िलाफ़ भड़काए बिना, किसी भी कीमत पर जीत हासिल नहीं होने वाली है। इसलिए वो पार्टी के दिग्गज नेताओं के पदचिह्नों पर चलते हुए, जनता के बीच पहुँचकर मोदी विरोधी नैरेटिव तैयार करती हैं।

बीते दिनों बोरिवली में चुनावी जनसभा करने पहुँची उर्मिला मातोंडकर के समर्थकों ने इसी के चलते में मोदी-मोदी नारे लगाने वालों को गुस्से में पीटा था, लेकिन इस पर भी उनकी प्रतिक्रिया शून्य थी। पार्टी के समर्थकों के व्यवहार पर आपत्ति जताने की बजाए वो इस दौरान भी भाजपा पर ही उंगली उठाती नज़र आईं थी। और अब तो वे प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेंद्र मोदी पर तंज भी कसने लगी हैं।

उर्मिला मातोंडकर ने नरेंद्र मोदी पर बनी बायोपिक को आधार बनाकर कहा है कि उन पर तो कॉमेडी फिल्म बननी चाहिए। उनकी मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी फिल्म केवल एक मजाक है, क्योंकि उन्होंने अपना कोई वादा पूरा नहीं किया है।

सोचिए 10 साल की उम्र से अपने अभिनय करियर की शुरुआत करने वाली उर्मिला मातोंडकर को राजनीति में आने के बाद भी तंज कसने का मौका सिर्फ़ मोदी की बायोपिक पर ही मिला। जिस महिला को किसी व्यक्ति के जीवन संघर्षों पर बनी फिल्म कॉमेडी टाइप लगती है, तो संदेह होता है कि उन्होंने अभिनय की दुनिया में इतने वर्ष बिताने के बाद भी क्या सीखा? और जो व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र से ही अनुभव न हासिल कर पाया हो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है कि वो राजनीति में कदम रखने के बाद कैसे देश बदल देगा? ये राजनीति का ही एक चेहरा है कि कलाकार फिल्म में निहित भावनाओं को समझने से ज्यादा उसे कॉमेडी करार दे रहा है।

देश के स्वतंत्रता समय का जिक्र करते हुए कॉन्ग्रेस का साथ देने वाली मातोंडकर को इस बात से कोई सरोकार नहीं हैं कि बीते दशकों तक कॉन्ग्रेस ने देश के साथ ऐसा क्या किया, कि आखिर नरेंद्र मोदी पिछले 5 सालों में उसे सुधार नहीं पाए, आखिर क्यों कॉन्ग्रेस को सत्ता में आने के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है? अगर वाकई कॉन्ग्रेस ने देश के हित में काम किया होता तो क्या जनता भाजपा को 2014 में भारी मतों के साथ विजयी बनाती।

खैर, धीरे-धीरे मातोंडकर के सफ़र को देखते हुए लग रहा है कि गलती उनकी नहीं है। ये सालों की प्रैक्टिस है, उन्हें बॉलीवुड में हर डायलॉग और सीन के लिए पहले से स्क्रिप्ट मिली। लेकिन राजनीति में वह कैसे खुद को बूस्ट करतीं? ये बड़ा सवाल था।

राजनीति में आते ही उन्होंने विपक्ष के एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया। नतीजन आज वो राजनीति के दलदल में सराबोर होकर इस हद तक डूब चुकी है कि उन्होंने अपने भीतर सभी नैतिक मूल्यों को समतल कर दिया है। वे अब सिर्फ़ इन दिनों विपक्ष के समान मौक़े का फायदा उठाकर अपनी चुनावी रोटियाँ सेंकने में जुटी हुईं हैं। अब ऐसा करने के लिए चाहे उन्हें देश की बहुसंख्यक जनता पर ही निशाना साधना पड़े और हिंदू धर्म को हिंसक करार देना पड़े।

कहना गलत नहीं होगा उर्मिला मातोंडकर जैसे भटके बॉलीवुड कलाकारों का राजनीति में आना देश के लिए बेहद घातक है। जो मोदी सरकार के संकल्प सबका साथ और सबका विकास में भी धर्म और जाति की बातों की ही छटनी करते हैं। जिनके पास देश के विकास के लिए कोई एजेंडा नही, लेकिन हाँ विपक्ष द्वारा भुनाए ‘हेट्रेड पॉलिटिक्स’ पर राजनीति करने के कॉन्सेप्ट को वे अच्छे से जानती हैं।

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