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बंगाल में मुस्लिम आरक्षण का TMC वाला ‘खेला’ खत्म, 77 जातियाँ आरक्षण से बाहर: जानिए शुभेंदु सरकार के OBC संशोधन वाले बिलों से क्या बदला

ओबीसी आरक्षण संशोधन से जुड़े दो बिल के माध्यम से बंगाल सरकार ने मुस्लिम आरक्षण खत्म कर दिया है। इस संशोधन का उद्देश्य कोर्ट के निर्देशों और आयोग की सिफारिशों के अनुरूप आरक्षण व्यवस्था को मजबूत करना है।

बंगाल विधानसभा में सोमवार (29 जून 2026) को OBC से जुड़े दो संशोधन बिल ध्वनिमत मत से पास किए गए। ये बिल हैं – पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) बिल, 2026 और पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) संशोधन बिल, 2026।

दरअसल इन विधेयकों के जरिए राज्य के ओबीसी आरक्षण के ढाँचे को पूरी तरह से बदल दिया गया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के मई 2024 टीएमसी सरकार को आदेश दिया था, जिसे अब विधेयक में शामिल किया गया है। इसमें टीएमसी के कार्यकाल में जोड़ी गई 77 मुस्लिम जातियों समेत कुल 113 समुदायों को आरक्षण सूची से बाहर कर दिया गया है, साथ ही ओबीसी आरक्षण को 17 % से घटाकर 7 % कर दिया गया है। दरअसल कोलकाता हाईकोर्ट ने 2011 के बाद ओबीसी सूची में किए गए विस्तार और 17 फीसदी तक के कोटे को रद्द कर दिया था।

विधानसभा में बिल पेश करते हुए पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरीशंकर घोष ने कहा कि पूर्व टीएमसी सरकार ने बगैर सर्वे किए मुस्लिमों को फायदा पहुँचाने के लिए ओबीसी सूची में मुस्लिम समुदाय को शामिल कर लिया था, इसलिए इसे कोलकाता हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। उन्होंने कहा कि सर्वे के आधार पर 66 समुदायों को ओबीसी कटेगरी में बरकरार रखा गया है।

ममता बनर्जी सरकार का फॉर्मूला रद्द

तृणमूल सरकार के कार्यकाल के दौरान OBC को दो कटैगरी में बांटा गया था। OBC ‘A’ और OBC’B’ कैटेगरी बनी थी। अब इसे हटा दिया गया है और OBC कटेगरी बन गई है। इसमें OBC ‘A’ कैटेगरी में शामिल 65 समुदायों को शामिल किया गया है। अब 2010 से पहले शामिल 66 जातियाँ ही आरक्षण की पात्र होंगी। इस तरह से एक नया आरक्षण का ढाँचा बनाने का रास्ता साफ हो गया है।

2012 के आरक्षण कानून में कई अहम बदलाव किए जा रहे हैं। इस कानून का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (पदों में आरक्षण) अधिनियम, 2012’ किया जा रहा है।

अब OBC का दर्जा ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993’ के आधार पर तय किया जाएगा। इसका मतलब है कि OBC सूची में समुदायों को शामिल करने या हटाने में आयोग की भूमिका और भी अहम होगी।

संशोधन के तहत, राज्य सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग से सलाह लेकर OBC आरक्षण का प्रतिशत तय करेगी। जरूरत पड़ने पर, सरकारी गजट नोटिफिकेशन के जरिए आरक्षण की दर बढ़ाई जा सकती है। हालाँकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC को मिलाकर कुल आरक्षण किसी भी हाल में 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकती। इसके अलावा आयोग की सिफारिशों के आधार पर OBC समुदायों को उनकी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के अनुसार कई समूहों में बांटा जा सकता है, जिससे हर कैटेगरी के लिए अलग-अलग आरक्षण दरें तय की जा सकेंगी।

पिछड़ा वर्ग आयोग में बड़े बदलाव

एक और संशोधन बिल पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग के ढांचे में बदलाव लाता है। नई व्यवस्था के तहत, आयोग में एक अध्यक्ष, तीन सदस्य और एक सदस्य-सचिव होंगे। सदस्य-सचिव के तौर पर ऐसे सरकारी अधिकारी को नियुक्त किया जाएगा जिसने कम से कम तीन साल तक अतिरिक्त सचिव के रूप में काम किया हो।

आयोग की जिम्मेदारियों का भी विस्तार किया गया है। किसी व्यक्ति या समुदाय को ‘पिछड़ा वर्ग’ के रूप में मान्यता देने, सूची में शामिल करने या सूची से हटाने से पहले, आयोग एक विस्तृत सर्वेक्षण करेगा और राज्य सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपेगा। असल में, भविष्य में OBC सूची तैयार करने के लिए आयोग की राय ही मुख्य आधार होगी।

बंगाल के मंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग को टीएमसी सरकार ने दरकिनार कर दिया था और फर्जी ओबीसी जातियाँ बना दी थी। नई सरकार इन्हें खत्म कर रही है और अब ओबीसी समुदाय की सामाजिक आर्थिक स्थिति का आकलन भी किया जाएगा।

सरकार का कहना है कि इस संशोधन से OBC आरक्षण व्यवस्था अधिक पारदर्शी, कानूनी रूप से सही और सुव्यवस्थित होगी। इसके अलावा, नए कानून को लागू करने से सरकार पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा।

सरकार ने इस संशोधन बिल के जरिए पूर्ववर्ती ममता सरकार के मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर बड़ा प्रहार किया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बिल को लेकर कहा कि यह कदम तुष्टिकरण की राजनीति को खत्म कर संवैधानिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम है। सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश का पालन किया है और पुरानी दोषपूर्ण ओबीसी सूची को रद्द कर दिया है।

पूर्व की टीएमसी सरकार ने जो ओबीसी आरक्षण बढ़ा कर 17 फीसदी किया था, जिसे अब पहले की तरह 7 फीसदी कर दिया गया है। साथ ही बगैर सर्वे के ओबीसी श्रेणी में शामिल किए गए जातियों को हटा दिया है।

बंगाल के आमूलचूल परिवर्तन में ये बिल अहम भूमिका निभाएगा। दरअसल ओबीसी के तहत मुस्लिम जातियों को शामिल कर वोट बैंक बनाने की नीति के दम पर ममता बनर्जी चुनाव दर चुनाव जीतती रहीं। संविधान में धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था नहीं होने के बावजूद मुस्लिमों को जातियों के नाम पर आरक्षण दिया गया। अब शुभेंदु सरकार ने इस आरक्षण को खत्म कर और कोलकता हाईकोर्ट के आदेश को संशोधन बिल में शामिल कर राज्य में आरक्षण के नए ढाँचे के निर्माण का रास्ता बना दिया है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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