Monday, January 25, 2021
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धूमल सिंह: बिहार का वो मोस्ट वॉन्टेड बाहुबली MLA, जिसकी धमक मुंबई तक थी

लालू प्रसाद यादव के ज़माने में ही बिहार में अपराध ने ख़ुद को राजनीति में स्थापित कर लिया। 2005 में बिहार में लालू राज का अंत हो गया। किंतु इसके बाद भी हुए विधानसभा चुनावों में अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए सभी दलों ने इनका सहारा लिया।

बिहार विधानसभा चुनावों की तारीख का ऐलान हो चुका है। बिहार में मतदान तीन चरणों- 28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को होंगे। नतीजों का ऐलान 10 नवंबर को किया जाएगा। नीतीश कुमार की वापसी होगी या फिर जनता इस बार जनता का मूड बदलेगा, ये तो चुनाव के बाद नतीजे आने पर ही साफ हो पाएगा। लेकिन राजनीति और दबंगई के कॉकटेल वाली बिहार की सियासत बड़ी दिलचस्प रही है। कई राजनेता दबंगई के दम से चुनाव जीतते आए हैं। बिहार में चुनाव हों और बाहुबलियों का जिक्र ना हो, ऐसा तो मुमकिन नहीं है।

पार्टी बदली, इलाका बदला, जेल भी गया लेकिन फिर भी इस बाहुबली का दबदबा कायम रहा। पुलिस की लिस्ट में 1987 से सालों तक मोस्ट वांटेड रहे मनोरंजन सिंह को लोग उनके इलाके में ‘धूमल सिंह’ के नाम से बुलाते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं, ‘धूमल सिंह’ नाम ज्यादा वजनदार लगता है, इसलिए मनोरंजन सिंह के राजनीति में उतरने से पहले से लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं।

आज हम बात कर रहे हैं ऐसे बाहुबली नेता की, जो 70 के दशक में मोस्ट वॉन्टेड की लिस्ट में शामिल थे। उनका नाम है मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल सिंह, जो फिलहाल बिहार स्थित सारण के एकमा से जनता दल यूनाइटेड (JDU) से विधायक हैं। कहा जाता है कि सारण में धूमल सिंह के नाम की तूती बोलती है और उनकी इजाजत के बिना इलाके में परिंदा भी पर नहीं मार सकता।

रंगदारी वसूलने से लेकर हत्या और हत्या के प्रयास करने तक के आरोप धूमल सिंह पर लग चुके हैं। कहा जाता है कि एक वक्त था जब बिहार, यूपी, दिल्ली, मुंबई और झारखंड में धूमल सिंह पर सैकड़ों मामले दर्ज थे। हालाँकि यह बात अलग है कि साल 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नामांकन के वक्त एफिडेविट में बताया था उन पर 9 आपराधिक मामले चल रहे हैं। इसमें 4 मर्डर और हत्या के प्रयास के 2 मामले भी शामिल थे।

CM नीतीश के करीबी हैं धूमल सिंह

70 के दशक में वो मोस्ट वॉन्टेड की सूची में शामिल थे। लेकिन जब उन्होंने सियासी चोला पहन लिया तो ना सिर्फ उनकी शख्सियत बदल गई बल्कि उनकी पहचान भी एक ‘सफेदपोश’ की बन गई। अपराध की दुनिया से सियासत में आकर किस्मत आजमाने वाले मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल सिंह आज बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबियों में शुमार हैं।

कहा जाता है कि अपराध की दुनिया में जितना धूमल सिंह का सिक्का चला, उतना ही उन्होंने सियासत की गलियों में भी धाक जमाई है। सारण में उनकी छवि बाहुबली की है। ऐसा नहीं है कि जब धूमल सिंह राजनीति में उतरे तब उन पर आपराधिक आरोप लगने बंद हो गए। सियासत में आने के बाद भी उनका नाम कई विवादों से जुड़ा लेकिन वो आज भी ‘माननीय’ विधायक हैं। साल 2000 में धूमल सिंह सारण के बनियापुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक बने और यह उनकी राजनीति में एंट्री थी।

कैसा रहा राजनीतिक करियर

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले बाहुबली मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल सिंह अभी सारण के एकमा से जदयू के विधायक हैं। धूमल सिंह ने सारण की सियासत में साल 2000 में एंट्री मारी थी। तब वह सारण के बनियापुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक चुने गए थे। 2005 के फरवरी का चुनाव उन्होंने लोजपा और उसी साल नवंबर का चुनाव जदयू के टिकट पर लड़ा और जीते।

फिर उन्होंने अपना क्षेत्र बदल लिया और बतौर जदयू प्रत्याशी एकमा से किस्मत आजमाई। मनोरंजन सिंह ने 2010 के विधानसभा चुनाव में RJD के कामेश्वर कुमार सिंह को 29201 वोटों के अंतर से हराया था। बनियापुर सीट से विजेता बने धूमल सिंह का दिल जल्दी ही इस विधासनभा से भर गया और उन्होंने अपना विधानसभा क्षेत्र बदलने का फैसला किया।

साभार: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस

2014 के आम चुनाव में भी धूमल ने सांसद बनने की हसरत लेकर महाराजगंज लोकसभा सीट से JDU के टिकट पर किस्मत आजमाई, पर इन्हें हार का सामना करना पड़ा था। साल 2015 के विधानसभा चुनाव में मनोरंजन फिर एकमा सीट से उतरे और बीजेपी के कामेश्वर कुमार सिंह को शिकस्त दी।

वही कामेश्वर सिंह, जिन्होंने 2015 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था। 2015 के विधानसभा चुनावों एक बार फिर धूमल सिंह ने उन्हें करीब 8 हजार वोटों के अंतर से मात दे दिया। लेकिन इस बार का चुनावी मौसम 2015 से बिलकुल अलग है। 2015 में एक दूसरे के खिलाफ लड़ने वाली जदयू और बीजेपी इस बार एक साथ हैं और इस सीट का टिकट धूमल सिंह के खाते में जाते दिख रही है। ऐसे में आरजेडी और अन्य दलों के लिए यह सीट थोड़ी मुश्किल हो सकती है।

हमेशा लकी रहा है पत्नी का नॉमिनेशन

मनाेरंजन सिंह की पत्नी सीता देवी ने 2010 में उनके खिलाफ निर्दलीय के तौर पर नॉमिनेशन दाखिल किया था, पर वो हार गई थीं। असल बात ये है कि सीता देवी को चुनाव जीतने से कोई मतलब नहीं था। चूँकि धूमल उन्हें अपने लिए लकी मानते हैं, लिहाजा उनके कहने पर ही सीता देवी ने पर्चा भरा था। हालाँकि वोट उन्होंने अपने पति के लिए माँगा था। इससे पहले 2005 के विधानसभा चुनाव में जब धूमल जेल में थे, उस वक्त भी सीता देवी ने उनके चुनाव में अहम भूमिका निभाई थी और पति के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा था। उस बार भी धूमल चुनाव जीतने में सफल रहे थे।

घर से मिले थे हथियार और गाँजा

साल 2005 में जब विधायक धूमल सिंह बक्सर जेल में थे तो सारण जिले में उनके आवास पर पुलिस ने छापेमारी की थी। तब पुलिस को हथियार, 4 मोटरसाइकिल, एक क्वालिस कार, एक बोलेरो, 300 ग्राम अवैध गाँजा और 1.5 लाख रुपए कैश मिले थे। धूमल के भजौना और गोपेश्वर आवास से तीन साथियों को गिरफ्तार भी किया गया था।

पुलिस रिपोर्ट में रंगदारी का था जिक्र

साल 2018 में बोकारो में लोहा ऑक्सन और आयरन ओर के ढुलाई में धूमल सिंह के गिरोह समेत बिहार- झारखंड के तीन आपराधिक गिरोह की सक्रियता को लेकर खुफिया विभाग ने रिपोर्ट तैयार की थी। पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया था कि बीएसएल में लोहा ऑक्शन होने पर ऑक्शन प्राप्त ठेकेदार से 400 रुपए प्रतिटन रंगदारी ली जाती थी।

विधायक धूमल सिंह को 200 रुपए प्रतिटन के हिसाब से रंगदारी पहुँचाई जाती थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि ट्रांसपोर्टिंग के जरिए वसूली का पहला गिरोह धूमल सिंह का है। वह रणवीर सिंह उर्फ राणा के जरिए रंगदारी की वसूली करवाता था। हालाँकि इन सभी आरोपों के बावजूद धूमल सिंह एक बार फिर सारण की अपनी विधानसभा सीट से ताल ठोकने के लिए तैयार है।

सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप

अक्टूबर 2014 में मनोरंजन सिंह पर 37 एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा करने का आरोप भी लग चुका है। राजीव नगर थाने में उनके खिलाफ बिहार हाउसिंग फेडरेशन की ओर से केस भी दर्ज कराया गया था। इस मामले में जदयू विधायक प्रदीप महतो और 40 अन्य लोगों को भी आरोपित बनाया गया था। मनोरंजन जब बनियापुर के विधायक थे तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनके पैतृक आवास पर साथ में लंच किया था। तब नीतीश के इस कदम की काफी आलोचना हुई थी।

कितनी है संपत्ति

साल 2015 में चुनावी हलफनामे के मुताबिक उन्होंने अपनी संपत्ति 3,10,56,352 रुपए बताई थी। जबकि उनकी देनदारी 20,02,581 रुपए की थी।

बिहार में जंगलराज के दावे यूँ ही नहीं किए जा रहे

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का उत्थान एक बड़ी घटना थी। उनके शासन के संदर्भ में ही बिहार में ‘जंगल राज’ की बात होती है। उनके शासन काल की ख़ासियत थी कि उन्होंने विकास की आधुनिक अवधारणा से बिहार को अलग कर, अपनी ख़ास सोच पर पूरी व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया। पिछड़ी जातियों को सत्ता के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थापित करने में लालू यादव सफल रहे थे। लेकिन, ऐसा करने के लिये उन्होंने जो क़दम उठाए, वह व्यवस्था की मूल अवधारणाओं को ध्वस्त करने वाला था। 

पहले से ही भ्रष्ट व्यवस्था को ठीक करने के झमेलों से ख़ुद को बचाते हुए, उन्होंने भ्रष्टाचार को अपराध की ज़मीन से जुड़ने का पूरा मौक़ा दिया। उनकी अघोषित मान्यता थी कि व्यवस्था का आधुनिक स्वरूप और बनावट, पहले से स्थापित जातियों के हित वर्धन के अनुकूल था। इसीलिए, ऐसी व्यवस्था को पिछड़ी जातियों के अनुकूल बनाने के लिए उन्होंने, व्यवस्था को पीछे की तरफ़ ले जाकर, उसमें नए वर्गों को बेहतर तरीके से समायोजित करने की पूरी कोशिश की। इसी कोशिश में, पिछड़ी जातियों के अपराधियों को भी आगे बढ़ने में सरकार का पर्याप्त सहयोग मिला। 

लालू प्रसाद यादव के ज़माने में ही बिहार में अपराध का राजनीतिकरण का काम पूरा हुआ। इससे पहले, अपराध का राजनीति में इस्तेमाल होता था, मगर अब, अपराध ने ख़ुद को राजनीति में स्थापित कर लिया। 2005 में बिहार में लालू राज का अंत हो गया। किंतु ऐसा नहीं हुआ कि इसके साथ ही बिहार की राजनीति से आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का खात्मा हो गया। इसके बाद भी हुए विधानसभा चुनावों में अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए सभी दलों ने इनका सहारा लिया।

2015 में 30% दागी प्रत्याशी

राज्य का शायद ही कोई विधानसभा क्षेत्र ऐसा होगा जहाँ एक न एक दबंग चुनाव को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होगा। यही वजह है कि पार्टियाँ अपनी जीत सुनिश्चित करने के इन स्थानीय दबंगों या उनके रिश्तेदारों को अपना उम्मीदवार बनाने से परहेज नहीं करतीं हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस (एडीआर) की रिपोर्ट के अनुसार 2010 में हुए विधानसभा चुनाव में 3058 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे, जिनमें 986 दागी थे। वहीं 2015 के चुनाव में 3450 प्रत्याशियों में से आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों की संख्या 1038 यानी तीस प्रतिशत थी।

इनमें से 796 यानी 23 फीसदी के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने,अपहरण व महिला उत्पीड़न जैसे गंभीर मामले दर्ज थे। 2015 के चुनाव में जदयू ने 41, राजद ने 29,भाजपा ने 39 और कॉन्ग्रेस ने 41 प्रतिशत दागियों को टिकट दिया। यही वजह है कि 243 सदस्यीय विधानसभा के 138 अर्थात 57 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें 95 के खिलाफ तो गंभीर किस्म के मामले थे।

नीतीश कुमार ने कसा बाहुबलियों पर शिकंजा

80 के दशक में बिहार की राजनीति में वीरेंद्र सिंह महोबिया व काली पांडेय जैसे बाहुबलियों का प्रवेश हुआ जो 90 के दशक के अंत तक चरम पर पहुँच गया। इनमें प्रभुनाथ सिंह, सूरजभान सिंह, पप्पू यादव, मोहम्मद शहाबुद्दीन, रामा सिंह व आनंद मोहन तो लोकसभा पहुँचने में कामयाब रहे, जबकि अनंत सिंह, सुरेंद्र यादव, राजन तिवारी, अमरेंद्र पांडेय, सुनील पांडेय, धूमल सिंह, रणवीर यादव, मुन्ना शुक्ला आदि विधायक व विधान पार्षद बन गए। यह वह दौर था जब बिहार में चुनाव रक्तरंजित हुआ करता था। 

इस दौर में यह कहना मुश्किल था कि पता नहीं कौन अपराधी कब ‘माननीय’ बन जाए। 2005 में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद स्थिति तेजी से बदली। बिहार में बीते 15 वर्षों के दौरान कानून के लंबे हाथों ने धीरे-धीरे दबंगों को खामोश करने में सफलता पाई है। राजनीतिक संरक्षण का ही नतीजा था कि शहाबुद्दीन, आनंद मोहन, सूरजभान सिंह, सुनील पांडे, पप्पू यादव, मुन्ना शुक्ला, सतीश पांडे, मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल, रामा सिंह, राजन तिवारी, अनंत सिंह, रणवीर यादव, बूटन यादव, अवधेश मंडल और रीतलाल यादव जैसे बाहुबली अपने-अपने इलाकों में दबदबा कायम करने में कामयाब हुए।

2006 में नीतीश सरकार ने पुराने आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया। इसके बेहतर परिणाम सामने आए। कई दबंग अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए और चुनाव लड़ने के योग्य नहीं रहे। जैसे-जैसे कानून का राज मजबूत होता गया, इन बाहुबलियों की हनक कमजोर पड़ती गई। फिलहाल कुछ जेल में सजा काट रहे हैं तो कुछ से पार्टियों ने ही दूरी बना ली है।

बिहार की सामाजिक राजनीतिक जीवन में जातिगत पहचान आज भी एक सच्चाई

आज के बिहार में, ऐसे कितने ही राजनीतिक परिवार हैं, जो विशुद्ध आपराधिक पृष्ठभूमि के वाहक रहे हैं। साथ ही, अपराधियों का जातिगत विभाजन भी बिहार की राजनीति की ख़ासियत है। हर राजनीतिक दल के लिये उसका अपना एक निरापद आपराधिक समुदाय है, जिसका इस्तेमाल चुनावों एवं उसके बाद भी होता है। लालू प्रसाद यादव के शासन में उनकी जाति से जुड़े अपराधी निरंकुश हो जाते हैं, तो उनके शासन से हटते ही किसी और जाति के अपराधी के अच्छे दिन आ जाते हैं। अपराधियों की जातिगत पहचान का महत्व बिहार की सामाजिक राजनीतिक जीवन में आज भी एक सच्चाई है।

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