कॉन्ग्रेस के प्रति जनता के साथ-साथ नेताओं और विधायकों, सांसदों का भी धीरे-धीरे मोहभंग हो रहा है। अब हालत यह है कि एक साथ तीन राज्यों के विधायकों ने पार्टी समर्थित राज्य सभा उम्मीदवारों को वोट नहीं किया, जिसकी वजह से वे हार गए।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की ‘पार्ट टाइम पॉलिटिक्स’ का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। पार्टी अध्यक्ष खरगे काफी बुजुर्ग हो चुके हैं। युवाओं को पार्टी से जोड़ने में वे असमर्थ हैं। राहुल गाँधी के मुद्दों ने जनता को जोड़ने के बजाए भ्रमित करने की कोशिश की है। नतीजा है कि पार्टी धीरे-धीरे सिकुड़ती जा रही है और जनता में अपना विश्वास खोती जा रही है।
बिहार में एक भी सीट नहीं जीत पाई विपक्ष
बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद अब महागठबंधन का एक भी उम्मीदवार राज्यसभा चुनाव नहीं जीत पाया। सभी 5 सीटें एनडीए की झोली में गई। महागठबंधन के 4 विधायकों ने वोट ही नहीं डाला।
इन विधायकों की नाराजगी उम्मीदवार को लेकर थी। उनका कहना है कि पार्टी ने अगर मुस्लिम, दलित को प्रत्याशी बनाया होता तो वह वोट डालते, लेकिन एक बिजनेसमैन को टिकट देकर पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं का अपमान किया। दरअसल राज्यसभा चुनाव को लेकर उम्मीदवारों के चुनाव के वक्त पार्टी ने पुराने नेताओं को दरकिनार किया। उसकी जगह बिजनेसमैन एडी सिंह को उम्मीदवार बनाया।
यहाँ तक कि जिस बैठक में नाम तय किए गए, उसमें कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम भी नहीं बुलाए गए थे। इससे पता चलता है कि पार्टी को न तो प्रदेश नेताओं से मतलब है और न ही कार्यकर्ताओं की भावनाओं से। इसका नतीजा रहा कि महागठबंधन के उम्मीदवार हार गए।
हरियाणा में कॉन्ग्रेस की साँसे फूली
हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों में से एक सीट जीतने में भी कॉन्ग्रेस की साँसे फूलने लगी। ये तब हुआ जब उसके पास 37 विधायक थे और उसे 28 से 30 वोट की जरूरत थी। दरअसल कॉन्ग्रेस के 5 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी और 4 वोट को अवैध घोषित कर दिया। हालाँकि बीजेपी का भी एक वोट अवैध घोषित हुआ।
इनेलो के 2 विधायकों ने वोट नहीं डाले। भले ही कॉन्ग्रेस ने जैसे तैसे अपनी सीट बचा ली, लेकिन विधायकों के बागी तेवर कॉन्ग्रेस के लिए चिंता का विषय हैं। ऐसा तब हुआ जब विधायकों को चुनाव से पहले हिमाचल प्रदेश भेज दिया गया था। पार्टी के अंदर चल रहे खींचतान से परेशान होकर हरियाणा प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राम किशन गुज्जर ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया।
ओडिशा में भी क्रॉस वोटिंग
ओडिशा की 4 राज्य सभा सीटों में से दो बीजेपी , एक बीजेडी और एक बीजेपी समर्थक निर्दलीय उम्मीदवार जीत गए। निर्दलीय उम्मीदवार पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप रे के जीतने पर बवाल मचा हुआ है, क्योंकि उन्हें बीजेडी और कॉन्ग्रेस विधायकों के वोट जरूर मिले होंगे। इस मामले में कॉन्ग्रेस ने अपने तीन विधायकों रमेश जेना, दशरथी गमांग और सोफिया फिरदौस को सस्पेंड कर दिया है।
सोफिया फिरदौस राज्य की पहली मुस्लिम विधायक हैं। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोहम्मद मोकीम की बेटी हैं। पार्टी ने 2024 के ओडिशा विधानसभा चुनावों में मोहम्मद मोकीम की जगह फिरदौस को उम्मीदवार बनाया, जो विजयी रहीं। वह ओडिशा की बाराबती-कटक सीट से विधायक बनी। ऐसे में सवाल उठता है कि सोफिया फिरदौस हो या बाकी के विधायक, इनलोगों ने क्रॉस वोटिंग क्यों की। पार्टी की विचारधारा से वह प्रभावित थी और कॉन्ग्रेस की पुरानी परंपरा से आती हैं, तो फिर क्यों छोड़ा ‘हाथ’?
3 साल में राहुल गाँधी ने मिलने का वक्त नहीं दिया
याद कीजिए सोफिया मोहम्मद के पिता मोहम्मद मोकिम ने ओडिशा में पार्टी की हालत पर चिंता जताई थी और सोनिया गाँधी को पत्र लिख कर कॉन्ग्रेस की ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ की माँग की थी। उन्होंने कहा था कि 3 साल की कोशिशों के बावजूद वह राहुल गाँधी ने नहीं मिल पाए।
उन्होंने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पार्टी युवाओं से जुड़ नहीं पा रही है। उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक पतन, नेतृत्व की नाकामियों और तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया था।
पूर्व विधायक मोहम्मद मोकिम ने चेतावनी दी थी कि पार्टी बाहरी विरोधियों की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर लिए गए फैसलों की वजह से अपनी विरासत खो रही है। पार्टी के फैसले इसे अंदर से खोखला कर रही है।

कॉन्ग्रेस पार्टी में वैचारिक शून्यता के साथ साथ पार्टी नेतृत्व का कार्यकर्ताओं से ‘दूरी’ इसके विघटन की अहम वजह है। जब कॉन्ग्रेस के पूर्व विधायक को राहुल गाँधी से मिलने के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है और फिर भी वह नहीं मिल पाते हैं, तो आम कार्यकर्ता कहाँ मिल पाएँगे। इससे नेतृत्व और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच की खाई साफ नजर आती है।
संसद सत्र चालू, राहुल गए विदेश
राहुल गाँधी जो मुद्दे संसद में उठाते हैं उससे भी कार्यकर्ता खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करता है। एपस्टीन फाइल्स के मुद्दे पर पूरा बजट सत्र हंगामा की भेंट चढ़ गया। यहाँ तक कि देश में एलपीजी की कालाबाजारी और केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री के आश्वासन पर कि देश में तेल और एलपीजी की कोई समस्या नहीं है, राहुल गाँधी को बोलने का मौका मिला।
उन्होंने एलपीजी और तेल की किल्लत पर सरकार को घेरने के बजाए एपस्टीन फाइल्स का मुद्दा उठाने की कोशिश की। जनता को एलपीजी की कालाबाजारी से दिक्कत है, ब्लैक मार्केट में हजारों रुपए में गैस सिलेंडर लेने के लिए जनता मजबूर है, लेकिन राहुल गाँधी को ये बात समझ में नहीं आई और एलपीजी पर बात न कर उन्होंने जनता से मुँह फेरा।
यूँ भी जब संसद में राहुल गाँधी की उपस्थिति पर सत्ता पक्ष सवाल उठाते रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा संसद सत्र के दौरान उनके विदेश यात्राओं को लेकर कहा था कि राहुल गाँधी विदेश में रहते हैं और उनकी उपस्थिति 51-52 फीसदी है, जबकि औसत सांसदों की उपस्थिति 80 फीसदी है।
संसद सत्र के दौरान राहुल गाँधी जर्मनी, इंग्लैंड, सिंगापुर और वियतनाम जैसे देशों की यात्रा पर थे। ऐसे में ‘पार्ट टाइम पॉलिटिक्स’ कर वह कैसे पार्टी को एकजुट रख पाएँगे। बीजेपी ने भी इस पर राहुल गाँधी पर तंज कसा और कहा कि राहुल गाँधी संसद में बोलने की शिकायत करते हैं, तो वे मौजूद भी तो रहें। असल में वे विदेश यात्राओं पर होते हैं।
देश में अहम चुनाव और राहुल गए विदेश
राहुल गाँधी अक्सर अहम चुनाव के वक्त विदेश चले जाते हैं। इसको लेकर भी कार्यकर्ताओं और जनता में छवि ‘नॉन सीरियस’ नेता की बनी है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गाँधी बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकाल रहे थे। उसके समाप्त होते ही दक्षिण अमेरिका के 4 देशों की यात्रा पर चले गए। उनकी यह यात्रा कितने दिनों की होगी, ये बात उनके नेताओं को भी पता नहीं थी।
राहुल की यात्रा की वजह से महागठबंधन की सीट शेयरिंग फॉर्मूला भी फँस गया। बिहार की चुनाव रणनीति और प्रचार पर जब उन्हें ध्यान देना चाहिए था, वह विदेश भाग गए।
यहाँ तक कि लोकसभा चुनाव 2024 से पहले जब वह भारत जोड़ो यात्रा कर जनता को जोड़ने की कवायद कर रहे थे, 10 दिनों के लिए गायब हो गए, हालाँकि भारत जोड़ो यात्रा नहीं रुकी।
दिसंबर 2023 में हुए तीन बड़े राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनावों से कॉन्ग्रेस बुरी तरह हार गई। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में मायूसी थी, लेकिन राहुल गाँधी के विदेश जाने की खबर आई। हालाँकि इंडिया गठबंधन के अंदर इस पर चर्चा होने लगी और राहुल गाँधी को विदेश यात्रा रोकनी पड़ी।
दिसंबर 2021 में जब उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। हर पार्टी पूरे जी जान से चुनाव में लगी हुई थी। ऐसे में राहुल गाँधी विदेश में थे। कॉन्ग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। ऐसा ही कर्नाटक चुनाव 2018 में भी हुआ। पार्टी नेतृत्व को राहुल गाँधी के अचानक विदेश दौरे की वजह से सरकार गठन और विभागों के वितरण के लिए इंतजार करना पड़ा।
एआई समिट का विरोध
दिल्ली के भारत मंडपम में जब फरवरी 2026 में एआई समिट हुआ, उसमें दुनियाभर के टेक लीडर्स और बिजनेसमैन पहुँचे। पूरी दुनिया की नजर उस वक्त भारत पर थी। ऐसे में यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं ने विरोध प्रदर्शन कर देश की इज्जत डूबोने की कोशिश की। उस दौरान कॉन्ग्रेस का एक बड़ा वर्ग यूथ कॉन्ग्रेस के विरोध प्रदर्शन को देश के खिलाफ एक्शन माना।
यही वजह थी कि कॉन्ग्रेस के प्रवक्ताओं ने तुरंत इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। करीब 7 घंटे बाद कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इस पर ट्वीट कर यूथ कॉन्ग्रेस की कार्रवाई को सपोर्ट करने की कोशिश की। इस मुद्दे पर कई दिनों बाद राहुल गाँधी की मुँह खुली। यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने शर्ट पहनी थी, जिस पर लिखा था- मोदी इन कॉन्प्रोमाइज्ड।
दरअसल ये भारत-यूएस ट्रेड डील के विरोध में प्रदर्शन था। यूथ कॉन्ग्रेस ने विश्वभर के प्रतिनिधियों के सामने देश का अपमान किया। कॉन्ग्रेस समर्थकों ने भी इसका विरोध किया, लेकिन राहुल गाँधी के यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं को ‘बब्बर शेर’ कहते हुए कहा कि इन्होंने एआई समिट में ‘अपना काम’ कर दिया।
राहुल ने कहा था इंडियन स्टेट से लड़ाई है
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का बयान देश में सुर्खियों में रहा। इसमें उन्होंने इंडियन स्टेट से लड़ने की बात कही थी। इस पर केस भी दर्ज किया गया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश से लड़ने की बात कहना दरअसल जनता को जानबूझकर विद्रोह करने के लिए भड़काना और अराजकता पैदा करने की कोशिश है।
राहुल गाँधी ने कहा था, “यह मत सोचो कि हम निष्पक्ष लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें कोई निष्पक्षता नहीं है। यदि आप मानते हैं कि हम बीजेपी या आरएसएस नाम के राजनीतिक संगठन से लड़ रहे हैं तो आप समझ नहीं पाएँगे कि क्या हो रहा है। बीजेपी और आरएसएस ने हमारे देश की हर एक संस्था पर कब्जा कर लिया है। अब हम बीजेपी, आरएसएस और भारतीय स्टेट से ही लड़ रहे हैं।”
राहुल गाँधी बगैर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष न हों, लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के साथ-साथ कॉन्ग्रेस के कर्ता-धर्ता भी वही हैं। कॉन्ग्रेस के मुद्दे जनता को जोड़ नहीं पाती हैं। इसके अलावा राहुल गाँधी की विदेश यात्रा से पार्टी की कार्यप्रणाली बुरी तरह प्रभावित होती है।
कॉन्ग्रेस में खरगे भले पार्टी अध्यक्ष हों, लेकिन चलती गाँधी परिवार की ही है, खास कर राहुल गाँधी की। सोनिया गाँधी बीमार रहती हैं। प्रियंका गाँधी भी राहुल के पीछे-पीछे चलने में विश्वास रखती हैं। ऐसे में राहुल गाँधी का पार्ट टाइम पॉलिटिक्स ने पार्टी का बेडा गर्क कर रखा है। पार्टी धीरे- धीरे सिकुड़ती जा रही है। भारत की सबसे पुरानी पार्टी जनता पर बेअसर होती जा रही है, इसके पीछे राहुल गाँधी की पॉलिटिक्स ही जिम्मेदार है।


