मुक्ति मार्ग पर 2 कदम और… कॉन्ग्रेस वह ‘बैल’ है जिसे अब गॉंधी भी हाँकना नहीं चाहते

वो दूसरी कॉन्ग्रेस थी जिसने गॉंधी की भी नहीं सुनी। ये आज की कॉन्ग्रेस है, जो मोदी की भी सुनती है। मोदी ने कहा- कॉन्ग्रेस मुक्त भारत। और गॉंधी पूरे जोशो-खरोश से इसे हकीकत बनाने में जुटे हैं। अब चुनाव में भी पसीना बहाना उन्हें गॅंवारा नहींं। जमीन की धूल उन्हें सुहाती नहीं।

कल्पना कीजिए आप युद्ध के मैदान में हैं और आपका सेनापति सीन से गायब है। आपका ‘बाहुबली’ बैक फायर कर चुके हथियारों के साथ मैदान में है। यकीनन, आप खुद को कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता महसूस करेंगे। हताश, निराश और पस्त।

लोकतंत्र में चुनाव युद्ध सरीखे ही होते हैं। विचारों का यह द्वंद्व लोकतंत्र के लिए ऊर्जा सरीखा होता है। लेकिन, तब क्या हो जब विपक्ष बिना लड़े हथियार डाल दे? कुछ-कुछ वैसे ही जैसा महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव में दिख रहा है। दोनों राज्यों में लोग अगले पॉंच साल के लिए प्रदेश सरकार चुनने के लिए वोट डाल चुके हैं और नतीजे 24 अक्टूबर को आएँगे। लेकिन, आप महसूस कर रहे होंगे कि मुकाबला बिल्कुल एकतरफा है। दोनों राज्यों की सत्ता में भाजपा फिर दमखम के साथ लौटती नजर आ रही है।

इसका कारण जानना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। जिस दौर में 20-20 खेलने से पहले घंटों नेट पर पसीने बहाए जाते हैं, उसी कालखंड में 288 सदस्यीय महाराष्ट्र और 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा चुनाव के प्रचार से कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार दूर-दूर रहा। पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी ने एक भी रैली नहीं की। हरियाणा की उनकी एकमात्र रैली भी अंतिम क्षणों में अस्वस्थता की वजह से टाल दी गई। उनके बेटे और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने 7 रैलियॉं की। 5 महाराष्ट्र में और 2 हरियाणा में। पार्टी महासचिव और राहुल की बहन प्रियंका गॉंधी ने भी एक रैली करने की जहमत नहीं उठाई। जबकि तीनों का नाम चुनाव के लिए पार्टी की ओर से जारी स्टार प्रचारकों की सूची में था।

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महाराष्ट्र और हरियाणा की गिनती आप यूपी और बिहार जैसे उन राज्यों में भी नहीं कर सकते जहॉं कॉन्ग्रेस दशकों से दफन है। पॉंच साल पहले जब इन दो राज्यों की सत्ता से कॉन्ग्रेस बेदखल हुई थी, उससे पहले वह महाराष्ट्र में डेढ़ दशक तो हरियाणा में दशकभर तक लगातार सत्ता में बनी रही थी। बावजूद इन दो राज्यों का इस बार का चुनाव कॉन्ग्रेस को केवल इसलिए याद रहेंगे कि उसके नेता आपस में जमकर लड़े। थोक के भाव नेता पार्टी छोड़ गए। परिवार की शपथ खाने वाले नेताओं ने एक के बाद एक ऐसे बयान दिए जिससे लगा कि मॉं-बेटे में भी अब साम्य नहीं है। मुंबई कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे संजय निरुपम और हरियाणा के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर ने तो साफ-साफ शब्दों में कहा कि सोनिया के नेतृत्व सॅंभालने के बाद से राहुल के करीबी नेताओं का काम लगाया जा रहा है।

यह सब ऐसे वक्त में हुआ जब कॉन्ग्रेस अपने सब मुश्किल वक्त से गुजर रही है। उसके मुकाबिल मोदी-शाह की जोड़ी है। जिस जोड़ी ने भाजपा को ऐसी चुनावी मशीनरी में बदल दिया है जो केवल जीत का वरण करना जानती है। रणनीति ऐसी कि चूक फटकने भी न पाए। बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र और हरियाणा में 50 के करीब रैलियॉं की। विकास के साथ-साथ हर उस मुद्दे को उभारा जिसके आधार पर वोटरों को गोलबंद किया जा सकता था। दूसरी तरफ, राहुल गॉंधी राफेल से उतर नहीं पाए। आर्थिक मोर्चे पर सरकार को घेरने के लिए कॉन्ग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उतारा। लेकिन, खुद की पार्टी के गुनाह गिना उन्होंने इस रणनीति का भी भट्टा बिठा दिया।

मनमोहन के इस पाश्वाताप पर कॉन्ग्रेस से ज्यादा आश्चर्य गॉंधी परिवार को हुआ होगा। क्योंकि, कॉन्ग्रेसी चाल में अब तक नहीं ढल पाए पूर्व प्रधानमंत्री ने बीते कुछ सालों में कई मौकों पर साबित किया है कि गॉंधी परिवार के इशारे पर वे मोदी सरकार पर अनर्गल आरोप लगा सकते हैं। चाहे इसके चक्कर में अर्थशास्त्री होने की उनकी कुल जमा पूॅंजी ही क्यों न खाक हो जाए। वैसे जिस परिवार की कृपा से आप 10 साल पीएम रहे हों, उसके लिए इतना करना तो बनता है!

भाई-बहन की जुगलबंदी में भी जीत का फॉर्मूला नहीं तलाश पाई कॉन्ग्रेस

असल, में कॉन्ग्रेस के पास दोनों राज्यों में चुनाव लड़ने को लेकर रणनीति पहले दिन से ही नहीं थी। वह तो भाजपा से चूक होने और फिर चमत्कार होने की उम्मीद में बैठी थी। ऐसा होना नहीं था और हुआ भी नहीं।

यह सच है कि गॉंधी-नेहरू परिवार सियासी घाघ है। यह भी सोलह आने सच है कि उन्हें पसीना बहाना रास नहीं आता। लेकिन, चुनावी मौसम में इस परिवार ने आज तक वैसी बेरुखी नहीं दिखाई थी, जैसा इस बार दिखा। बिहार के मुख्यमंत्री रहे दिवंगत डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने अस्सी के दशक में कहा था कि कॉन्ग्रेस की बनावट वैसी नहीं हो पाई है जिससे कार्यकर्ताओं में कमिटमेंट डाला जा सके। जब ​डॉ. मिश्र ने यह बात कही थी तब वे कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता हुआ करते थे। उस समय राजीव गॉंधी देश के प्रधानमंत्री और कॉन्ग्रेस के सर्वेसर्वा हुआ करते थे। डॉ. मिश्र ने कॉन्ग्रेस की जिस बीमारी की ओर इशारा किया था, उसे न तो कभी नेहरू ने भाव दिया और न इंदिरा और राजीव ने। ऐसे में इलाज की उम्मीद तो बीते तीन दशक से बैसाखियों के सहारे टिकी कॉन्ग्रेस ने सोनिया और राहुल से भी नहीं की होगी। लेकिन, लगातार दो आम चुनावों में करारी पराजय ने कॉन्ग्रेस की उस बीमारी को भी उजागर कर दिया है जिसका पता डॉ. मिश्र को भी नहीं था। यानी, पार्टी का शीर्ष परिवार भी कमिटेड नहीं है। महाराष्ट्र और ​हरियाणा के प्रचार ने इस पर ठप्पा लगा दिया है।

मोदी ने जब कॉन्ग्रेस मुक्त भारत की बात की थी तब उन्हें भी उम्मीद नहीं रही होगी कि इसे हकीकत में तब्दील करने की उनसे भी ज्यादा जल्दी खुद कॉन्ग्रेस को होगी। कहते हैं कि आदमी को आगे से हॉंकते हैं और बैल को पीछे से। पार्टी तो जीते-जागते, विचारों से लैस लोगों का ही संगठन होता है। सो, कायदे से उसका भी नेतृत्व आगे से होना चाहिए। पर कॉन्ग्रेस का हाल तो उस बैल जैसा लगता है जिसे उसका मालिक (गाँधी परिवार) भी हॉंकने को तैयार नहीं है। वह दूसरी कॉन्ग्रेस थी जिसने आजादी के बाद ​संगठन का अस्तित्व खत्म कर देने की गॉंधी की सलाह ठुकरा दी थी। यह कॉन्ग्रेस मोदी की भी सुनती है, इसलिए मुक्ति मार्ग पर सरपट भाग रही है।

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सोनिया गाँधी
शिवसेना हिन्दुत्व के एजेंडे से पीछे हटने को तैयार है फिर भी सोनिया दुविधा में हैं। शिवसेना को समर्थन पर कॉन्ग्रेस के भीतर भी मतभेद है। ऐसे में एनसीपी सुप्रीमो के साथ उनकी आज की बैठक निर्णायक साबित हो सकती है।

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