सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को राम जन्मभूमि विवाद के अंतिम फैसले के साथ दशकों पुराने विवाद को समाप्त कर दिया। लेकिन इसके बावजूद देश में आज भी मुगलिता आताताइयों से जुड़े ऐतिहासिक जख्मों को राजनीतिक लाभ के लिए भुनाने की कोशिशें जारी हैं, जिन्हें तथाकथित ‘सेक्युलरिज़्म’ की आड़ में आगे बढ़ाया जा रहा है।
इसी कड़ी में, पश्चिम बंगाल के भारतपुर से निलंबित ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) विधायक हुमायूँ कबीर, जिन्होंने हाल ही में जनता उन्नयन पार्टी (JUP) की स्थापना की है, मजहबी ध्रुवीकरण और मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति को हवा देने में जुटे हुए हैं।
हुमायूँ कबीर ने अयोध्या में ढाँचे के ध्वंस की तर्ज पर बाबर के नाम पर एक मस्जिद बनाने की घोषणा कर सांप्रदायिक तनाव भड़काने का प्रयास किया है। 6 दिसंबर 2025 को मस्जिद की आधारशिला रखी गई, जिसके तुरंत बाद उन्होंने अपनी नई राजनीतिक पार्टी भी लॉन्च की।
शहर में एक नई ‘बाबरी मस्जिद’
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा इलाके में बुधवार (11 फरवरी 2026) को हुमायूँ कबीर ने ‘बाबरी मस्जिद’ जैसी दिखने वाली एक नई मस्जिद का निर्माण कार्य शुरू कर दिया।
हुमायूँ कबीर के अनुसार, इस परियोजना को दो सालों में पूरा किया जाएगा और इसके निर्माण पर लगभग 50 से 55 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। दोपहर के समय ईंट-चिनाई का काम शुरू हुआ, जिसमें हजारों मुस्लिम लोगों ने हिस्सा लिया और निर्माण में सहयोग किया।
इस दौरान हुमायूँ कबीर ने अपने विरोधियों को निशाने पर लेते हुए कहा कि जो लोग इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं, वे रास्ते से हट जाएँ। उन्होंने दावा किया कि लोग अपने-अपने धर्मों के अनुसार मंदिर, चर्च या अन्य धार्मिक स्थल बनाने के लिए स्वतंत्र हैं और वह इस्लाम के नाम पर किसी का विरोध नहीं करेंगे। उन्होंने इसे अल्लाह को प्रसन्न करने और अपनी मजहबी आस्था निभाने का प्रयास बताया।
हालाँकि आलोचकों का कहना है कि मुद्दा मस्जिद के निर्माण का नहीं, बल्कि एक पहले से सुलझ चुके विवाद को दोबारा भड़काने और वोट बैंक की राजनीति के तहत सांप्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश का है। आरोप है कि यह कदम मजहबी भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक लाभ हासिल करने की रणनीति का हिस्सा है।
कुछ समय तक संयमित रुख अपनाने के बाद हुमायूँ कबीर ने जल्द ही अपना आक्रामक और विवादास्पद चेहरा दिखा दिया। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा, “दुनिया की कोई ताकत इस मस्जिद के निर्माण को नहीं रोक सकती। अल्लाह की मेहरबानी से हम दो साल के भीतर इसका निर्माण पूरा करेंगे। इस पर 50–55 करोड़ रुपए की लागत आएगी।”
इसके बाद जनता उन्नयन पार्टी (JUP) के प्रमुख हुमायूँ कबीर ने घोषणा की कि वह फिलहाल अपनी प्रस्तावित ‘बाबरी यात्रा’ को स्थगित कर रहे हैं। यह यात्रा नदिया जिले के पलाशी से उत्तर दिनाजपुर के इटाहार तक लगभग 235 किलोमीटर लंबी रैली के रूप में आयोजित की जानी थी। उन्होंने बताया कि बोर्ड परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है।
हुमायूँ कबीर ने कहा, “मालदा पुलिस ने मुझे सूचित किया कि बाबरी यात्रा से माध्यमिक परीक्षा देने वाले छात्रों को असुविधा होगी। इसलिए मैंने 100 गाड़ियों के काफिले के साथ होने वाली इस यात्रा को स्थगित करने का फैसला किया है। इसके बजाय, मैं पलाशी से बेलडांगा जहाँ मस्जिद का निर्माण हो रहा है, तक 50,000 लोगों के साथ पैदल मार्च करूँगा।”
उन्होंने आगे दावा किया कि मस्जिद के मुद्दे पर उन्हें निलंबित करने के कारण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मुस्लिम वोटों का नुकसान होगा। हुमायूँ कबीर ने आरोप लगाया कि “ममता बनर्जी ने झूठे वादों के जरिए मुसलमानों को अपना वोट बैंक बनाया है, लेकिन अब अल्पसंख्यक उनकी सच्चाई समझ चुके हैं। उन्होंने मुझे केवल इसलिए निलंबित किया क्योंकि मैंने जनता के समर्थन से बाबरी मस्जिद स्थापित करने की घोषणा की थी।”
हुमायूँ कबीर ने दावा किया कि 2026 में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी और यह मुद्दा उनके राजनीतिक भविष्य को नुकसान पहुँचाएगा। उन्होंने कहा, “अगर मैं TMC में बना रहता, तो पार्टी को मस्जिद के निर्माण से फायदा होता और उन्हें और ज्यादा वोट मिलते।”
इसके साथ ही, हुमायूँ कबीर ने इस कदम के पीछे की असली राजनीतिक मंशा को सामने लाते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) राम मंदिर के निर्माण से राजनीतिक लाभ उठा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP सनातनी मतदाताओं के समर्थन को मजबूत कर पश्चिम बंगाल में अपना वोट बैंक बढ़ा रही है, और वह इस राजनीतिक विस्तार को किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देंगे।
यह बयान इस पूरे विवाद को मजहबी भावना से ज्यादा राजनीतिक रणनीति और वोट बैंक की लड़ाई के रूप में सामने लाता है, जहाँ मजहबी प्रतीकों का इस्तेमाल चुनावी फायदे के लिए किया जा रहा है।
एक ही सिक्के के दो पहलू
हुमायूँ कबीर, जिन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस (कॉन्ग्रेस) से शुरू की थी, अपने विवादास्पद और भड़काऊ बयानों के लिए कुख्यात रहे हैं। उन पर विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी को धमकाने और हिंदुओं को भागीरथी नदी में डुबोने की धमकी देने जैसे गंभीर आरोप रहे हैं। उन्होंने यहाँ तक दावा किया था कि मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी 70% और हिंदू केवल 30% हैं और इसी आधार पर उन्होंने खुलेआम हिंदू विरोधी बयान दिए।
गौरतलब है कि मुर्शिदाबाद पहले ही इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर हुए हिंसक हमलों का गवाह रहा है, जिससे क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव और असुरक्षा की स्थिति बनी हुई है।
बाद में हुमायूँ कबीर ने यह भी दावा किया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ही उन्हें ऐसे सांप्रदायिक बयान देने के लिए प्रेरित किया था, ताकि 2024 लोकसभा चुनाव में पूर्व क्रिकेटर और TMC उम्मीदवार यूसुफ पठान की जीत सुनिश्चित की जा सके।
उनका खुलेआम हिंदू विरोधी रवैया और आक्रामक राजनीतिक व्यवहार भी उनके राजनीतिक करियर पर कोई खास असर नहीं डाल सका। इसके उलट, वह TMC का अहम हिस्सा बने रहे और मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाते रहे।
अगर हुमायूँ की बातों को अगर सच माना जाए, तो TMC सुप्रीमो उनके विवादित कमेंट्स के पीछे थीं। इससे भी जरूरी बात यह है कि उन्होंने जिहादी एलिमेंट्स समेत मुसलमानों के प्रति अपनी तरफदारी दिखाने में कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई, इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि वह पूरे राज्य की मुख्यमंत्री हैं, न कि सिर्फ़ किसी खास कम्युनिटी की।
मुस्लिम वोटों की भूख इतनी ज्यादा है कि यह बंगाल की सीमाओं से बाहर निकलकर बांग्लादेशी घुसपैठियों तक पहुँच गई है, जिन्हें न सिर्फ अपनाया जा रहा है बल्कि उनकी सरकार उनकी मदद भी कर रही है। यह साफ है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के मामले में ये दोनों नेता एक जैसे हैं।
आगामी राज्य विधानसभा चुनाव के लिए एक चालाक रणनीति
हुमायूँ कबीर और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) नेतृत्व के बीच सालों से टकराव और मनमुटाव रहे हैं, लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए मुस्लिम वोट बैंक को साधने का साझा लक्ष्य दोनों को बार-बार एक साथ जोड़ता रहा है। भले ही पहले उन्हें पार्टी से निकाला गया हो, वह हर बार किसी न किसी रास्ते से TMC में लौट आए और फिर स्वीकार कर लिए गए।
ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि राज्य विधानसभा चुनाव से पहले ‘बाबरी’ मस्जिद के मुद्दे के जरिए मुस्लिम वोटों को मजबूत करने के बाद हुमायूँ कबीर दोबारा TMC में वापसी कर सकते हैं।
दोनों पक्षों के पुराने रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि उनके बीच कोई गहरा वैचारिक मतभेद नहीं है, बल्कि यह पूरा विवाद राजनीतिक रणनीति और नाटक से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर वह अपना राजनीतिक उद्देश्य पूरा कर लें, तो TMC में लौटने से उन्हें आखिर रोकेगा ही क्या?
इस पूरे मामले पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने TMC और हुमायूँ कबीर पर एक गुप्त राजनीतिक साजिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “हुमायूँ कबीर कौन है? वह अब भी TMC के साथ है। यह उनकी प्लान-बी रणनीति है। TMC पिछले दरवाजे से मुस्लिम वोट हासिल करने की कोशिश कर रही है और उन्हें डिप्टी चीफ मिनिस्टर बनाने की योजना है। जिस तरह एक बार क्षेत्र का विभाजन हुआ और पश्चिम बंगाल बना, अब इसे बांग्लादेश जैसा बनाया जा रहा है, पूरे माहौल को ‘मिनी पाकिस्तान’ में बदला जा रहा है। इसके खिलाफ देश के सभी हिंदुओं को एकजुट होना चाहिए।”
बीजेपी का दावा है कि TMC और हुमायूँ कबीर द्वारा रची गई इस साजिश को पार्टी ने पहचान लिया है। खुद हुमायूँ कबीर के बयानों से भी संकेत मिलता है कि यह मस्जिद हिंदुओं के राजनीतिक एकीकरण के जवाब के तौर पर बनाई जा रही है, जिससे यह संदेह और गहरा होता है कि यह पूरा कदम मुस्लिम वोट बैंक को बढ़ाने और जनता को भ्रमित करने की एक सुनियोजित रणनीति है।
हिंदू एकता का डर
2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद देशभर में एक मजबूत भगवा लहर देखी गई और पश्चिम बंगाल भी इससे अछूता नहीं रहा। पिछले कुछ सालों में राज्य में हिंदू पहचान का उल्लेखनीय पुनरुत्थान हुआ है, जिसका प्रमाण यह है कि भाजपा ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बड़ी संख्या में सीटें हासिल की हैं।
स्वाभाविक रूप से, यह बदलाव तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) और हुमायूँ कबीर जैसे नेताओं के लिए चुनौती बन गया, जो लंबे समय से खुद को मुस्लिम समुदाय के पैरोकार के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार मुसलमानों को खुश करने की अपनी नीति को लेकर विवादित बयान देते हुए कहा था, “जे गोरु दूध देय, तार लाठी खेते राजी आछी” (जो गाय दूध देती है, उसके लात मारने पर भी मैं तैयार हूँ) यह बयान उनके खुले मुस्लिम तुष्टिकरण के रूप में देखा गया।
हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि कट्टरपंथी तत्वों ने केवल TMC सरकार ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य, खासकर हिंदू समुदाय को भी नुकसान पहुँचाया है। इसके अलावा, घटनाओं की एक श्रृंखला ने हिंदू समाज में असुरक्षा और अलगाव की भावना को बढ़ाया, जिससे वे एकजुट होकर किसी राजनीतिक विकल्प की तलाश में आगे आए।
यहीं पर भाजपा ने हस्तक्षेप किया पीड़ितों का समर्थन किया, न्याय की माँग उठाई और खुलकर TMC का विरोध किया। इसके कारण हिंदू समुदाय को भाजपा में एक नई उम्मीद दिखाई देने लगी, जो TMC के लिए चिंता का कारण बन गई।
इसी राजनीतिक दबाव के चलते, TMC ने अपने चर्चित मुस्लिम चेहरे से दूरी बनाने जैसे राजनीतिक हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए, ताकि बदलते समीकरणों और बढ़ती हिंदू एकजुटता से निपटा जा सके।
TMC सरकार के मुसलमानों के प्रति पक्षपाती लगाव ने हिंदू एकता को बढ़ावा दिया
तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति उस समय खुलकर सामने आई, जब उसने अपने दबंग नेता शेख शाहजहाँ को बचाने का प्रयास किया। शेख शाहजहाँ एक कुख्यात अपराधी रहा है, जिस पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारियों पर हमले, जमीन हड़पने, और संदेशखाली में हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।
शेख शाहजहाँ पर आरोप है कि वह लगातार हिंदुओं पर अत्याचार करता रहा, लेकिन इसके बावजूद TMC ने न केवल उसे सजा देने से परहेज किया, बल्कि उसके आपराधिक नेटवर्क को फलने-फूलने में मदद भी की। बाद में जब उसके अपराध सार्वजनिक रूप से उजागर हुए, तो TMC सरकार ने पहले उसकी गिरफ्तारी से बचने के लिए हरसंभव प्रयास किए, लेकिन जनता भाजपा और न्यायपालिका के दबाव के चलते आखिरकार कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ा।
इसके बाद भी सरकार ने उसे कानून से बचाने के लिए हर तरह की रणनीति अपनाई और उसकी निर्दोषता का दावा करती रही। अपने नेता के समर्थन में सरकार इतनी आगे बढ़ गई कि कलकत्ता हाईकोर्ट को TMC सरकार की कड़ी आलोचना करनी पड़ी, खासकर अपराधी को संरक्षण देने और स्थानीय लोगों को डराने-धमकाने के मामलों को लेकर।
तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार पर बार-बार यह आरोप लगता रहा है कि वह अपराधी और कट्टरपंथी मुस्लिम तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में नाकाम रही है। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध और वक्फ संशोधन अधिनियम को खारिज करने के नाम पर हुई हिंसक घटनाओं के दौरान मुस्लिम भीड़ को हिंदुओं पर हमले करने का खुला अवसर मिला, जबकि सरकार मूकदर्शक बनी रही।
पिछले साल मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा के दौरान प्रशासन पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगे, जब संकट में फंसे हिंदुओं की बार-बार की गई मदद की अपीलों को नजरअंदाज कर दिया गया। आरोप है कि एक TMC पार्षद ने लक्षित हमलों में अहम भूमिका निभाई, जिसमें हाशिए पर पड़े हिंदू परिवारों के घर जला दिए गए, जिससे उन्हें महिलाओं और बच्चों के साथ घर छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा।
जैसा कि पहले भी देखा गया है, ममता बनर्जी का मुस्लिम तुष्टिकरण केवल बंगाल या भारत तक सीमित नहीं है। CAA, NRC और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) जैसे कदमों का उनका विरोध बार-बार अवैध मुस्लिम घुसपैठियों के समर्थन के रूप में देखा गया है। उन पर आरोप है कि वह देश में अवैध रूप से रह रहे लोगों को न केवल संरक्षण देती हैं, बल्कि उनके कथित मताधिकार के लिए भी लड़ रही हैं, जो लोकतंत्र और संविधान की भावना के खिलाफ माना जाता है।
इससे अलग, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को लेकर ममता बनर्जी की संवेदनहीनता भी सवालों के घेरे में रही है। वहाँ हिंदुओं के समर्थन में निकाले गए एक शांतिपूर्ण मार्च पर उनकी पुलिस द्वारा की गई कठोर कार्रवाई ने बड़े अस्तर पर आलोचना को जन्म दिया।
हालाँकि उदारवादी खेमे में ममता बनर्जी को एक नारीवादी आइकन के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन हिंदू महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनका रवैया उदासीन और असंवेदनशील रहा है। संदेशखाली और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसे मामलों में बलात्कार और हत्या पीड़ितों के परिवारों ने जाँच पर असंतोष जताया, जिससे सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
ममता बनर्जी अपने विवादित बयानों के लिए भी जानी जाती हैं, जिनमें उन्होंने बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को हल्के में लेते हुए लड़कियों को घर में रहने की सलाह तक दी है। इन मामलों में भी उनकी सरकार की जाँच प्रक्रिया को कमजोर और लापरवाह बताया गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि ये घटनाएँ केवल बड़े संकट की एक झलक हैं, क्योंकि TMC और ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति हिंदुओं की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों की कीमत ने राज्य में हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरकर सामने आई है।
निष्कर्ष
मौजूदा हालात और राज्य में नजदीक आते अहम चुनाव को देखते हुए यह संभावना जताई जा रही है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) और हुमायूँ कबीर ने मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने के लिए आपसी तालमेल बना लिया है, जिसमें प्रस्तावित मस्जिद एक रणनीतिक और राजनीतिक आधार की भूमिका निभा रही है।
कयास लगाए जा रहे हैं कि ममता बनर्जी ने हुमायूँ कबीर को सार्वजनिक रूप से पार्टी से दूर दिखाकर अपनी कमजोर पड़ती ‘सेक्युलर’ छवि बचाने और हिंदू मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिश की। लेकिन अंदरखाने दोनों के बीच मिलीभगत जारी हो सकती है, क्योंकि ममता को आशंका है कि हिंदू मतदाताओं के एकजुट होने के चलते भाजपा उनकी पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका दे सकती है।
ऐसे में TMC और हुमायूँ कबीर के बीच दिखाई जा रही मौजूदा तनातनी और एक-दूसरे के खिलाफ दिए जा रहे तीखे बयान महज एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। यह टकराव वोटरों को गुमराह करने और राजनीतिक समीकरण साधने का एक नाटक भी माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य मुस्लिम समर्थन बनाए रखना और हिंदू मतदाताओं को बाँटकर भ्रम में रखना हो सकता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


