अगर मैं आपको बताऊँ कि बिहार के 2025 विधानसभा चुनाव में जंगल राज वापस आ गया था तो क्या आप मानेंगे? क्या आप यह मानेंगे कि बिहार में जंगल राज चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा था?
दरअसल, जंगल राज को बिहार से बाहर लोग सिर्फ अपराध के राज तक सीमित करके कई बार देखते हैं। लेकिन बिहार में लालू प्रसाद यादव का पर्याय जंगलराज है। 2025 के विधानसभा चुनाव में जितनी बार महागठबंधन के लोग इस बात का दावा करते थे कि उनकी सरकार बनने जा रही है उतनी बार लोगों को लगता था कि जंगलराज आने वाला है। महागठबंधन का अहम हिस्सा राष्ट्रीय जनता दल और राष्ट्रीय जनता दल का मतलब लालू प्रसाद यादव। और जिसने भी पिछले 20 वर्षों का बिहार देखा है वह लालू प्रसाद यादव की सरकार के आने की आहट से भी डरता है।
हालाँकि, विधानसभा चुनाव से दो महीने पहले यह लगने लगा था कि एक ऐसी पीढ़ी भी अब मतदाता बन चुकी है जिसे उसे (जंगलराज का) दूर का कुछ भी नहीं मालूम है। उसे फर्क नहीं पड़ता है कि कितना बड़ा चारा घोटाला हुआ, कितनी महिलाओं का सुहाग लुटा, कितनों का घर और कितनों की इज्जत।
तेजस्वी प्रसाद यादव ने अपने प्रचार के माध्यम से यह कोशिश की कि राष्ट्रीय जनता दल के साथ एक फील गुड फैक्टर जोड़ा जाए। लेकिन तेजस्वी यादव जिस सियासत के वारिस है, उसका वसीयतनामा ही उनका सियासी मर्सिया भी है। और बिहार विधानसभा चुनाव में वही हुआ। तेजस्वी यादव जिन फर्स्ट टाइम वोटर्स के साथ कनेक्ट बनाने के चक्कर में रील बनाने लगे थे, वही ऐन वक्त पर पलट गया।
जंगलराज की वापसी
बिहार विधानसभा चुनावों की कवरेज के लिए ऑपइंडिया की टीम एक महीने बिहार में थी। हमारी यात्रा की शुरुआत गोपालगंज जिले से हुई। वहाँ से निकालकर हम सिवान पहुँचे। उसी दिन राष्ट्रीय जनता दल ने अपना टिकट बाँटते हुए सिवान की रघुनाथपुर विधानसभा सीट से मृतक माफिया शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शाहब को टिकट दिया। सिवान शहर में ही घूमते हुए आई लव मोहम्मद के कई पोस्टर दिखाई दिए। और बगल में ही एक बड़ा सा शहाबुद्दीन का भी पोस्टर लगा था।
लोगों से बात करनी शुरू की तो अधिकतर लोग मुसलमान थे और वह राष्ट्रीय जनता दल के समर्थक थे। पोस्टर क्यों लगा, कैसे लगा? इस तरह का सवाल पूछ ही रहे थे कि एक नौजवान मुसलमान लड़के ने बोलते हुए यहाँ तक कह दिया कि अगर किसी ने पोस्टर को हाथ लगाने की भी कोशिश की तो भइया(ओसामा) ने कहा कि उसे लेकर आओ बाँधकर मारेंगे। उसने आगे कहा कि अगर साहब (शहाबुद्दीन) होते तो पोस्टर को छूने वाले को जिंदा जला देते।
इतना सुनने के बाद मुझे अंदाजा हो गया कि मैं किस तरह के इलाके में खड़ा हूँ। और लोगों से बात करते हुए मैं बाहर की तरफ निकल गया। जब यह रिपोर्ट हमारे यूट्यूब चैनल पर पब्लिश हुई तो इसकी क्लिप निकल कर सर्कुलेट होना शुरू हुई। हजारों लोगों ने निजी फेसबुक और इंस्टाग्राम आईडी से इसको शेयर किया। कुछ क्लिप्स मेरे सामने भी आई तो मैं उनके कमेंट पढ़ने लगा। और यह पहला मौका था जब मुझे समझ में आया कि बिहार के लोगों के मन से अभी भी 90 के दशक के जंगलराज का खौफ गया नहीं है।
देखिए, सिवान से ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्ट
इसके बाद आपइंडिया की टीम आगे की बिहार यात्रा के लिए बढ़ गई। रास्ते में यूँ ही यूट्यूब शॉर्ट में एक क्लिप आई। उस क्लिप में लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले को विजय शंकर दुबे नामक एक IAS अधिकारी के द्वारा पहली बार पकड़े जाने की कहानी बताई जा रही थी। बोलने वाले व्यक्ति का नाम था मृत्युंजय शर्मा। मैंने इनकी पुस्तक Broken Promises: Caste, Crime and Politics in Bihar भी पढ़ी हुई थी। एक पत्रकार के तौर पर इंटरव्यू भी किया था, लेकिन मुझे ये अंदाजा नहीं था कि ये पुस्तक अब इंटरव्यू के क्लिप के तौर पर बिहार के युवा देख रहे हैं।
एक बड़े यूट्यूब चैनल को मृत्युंजय शर्मा का दिया गया इंटरव्यू और उसमें बोली गई हर एक बात पूरे बिहार में वायरल थी। लालू प्रसाद यादव के जंगल राज पर एकेडमिक रूप से सबसे अच्छी लिखी गई किताबों में से एक ही किताब थी। लेकिन किताब की अपनी सीमा होती है। लेकिन लेखक ने इस किताब के कंटेंट को इंटरव्यूज में जिस तरह से एक्सप्लेन किया हो बिहार की युवाओं के लिए इतिहास के सबक जैसा था।
जब मैंने इंटरनेट पर देखना शुरू किया कि यह वीडियो कहाँ तक जा रहा है तो सुदूर बिहार के रहने वाले लोगों की निजी फेसबुक आईडी पर वीडियो के क्लिप तैरते हुए मिले। और नीचे कमेंट में युवा जिस तरह से इन बातों से स्तब्ध हो रहे थे और उम्र दराज लोग समर्थन कर रहे थे कि इसी तरह का सच बोलने की जरूरत है। यह देखकर मुझे दूसरी बार यकीन हुआ कि जंगलराज कहीं नहीं गया है।
मोदी, गमछा, कट्टा, भड़काऊ गीत और जंगलराज
इन सब के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में लालू प्रसाद यादव के दौर की कट्टा उद्योग की चर्चा करनी शुरू की। 24 अक्टूबर 2025को प्रधानमंत्री मन नरेंद्र मोदी ने समस्तीपुर और बेगूसराय की चुनावी रैली जिसमें मैं खुद भी मौजूद था। वहाँ अपने भाषण में 30 बार जंगलराज शब्द का उपयोग किया। उन्होंने नारा दिया कि ‘फिर एक बार एनडीए सरकार, फिर एक बार सुशासन सरकार, जंगल राज वालों को दूर रखेगा बिहार।’
मुजफ्फरपुर की रैली में भी मैं मौजूद था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहाँ अलग ही तैयारी के साथ आए हुए थे। उन्होंने राजद समर्थकों द्वारा गाए गए गीतों के बोल के साथ तंज कसना शुरू किया। पहला गाना था ‘जब तेजस्वी सरकार बनतो, यादव रंगदार बन तो’ इसपर एक वायरल रील का भी जिक्र प्रधानमंत्री ने किया। दूसरे गाने के बारे में जिक्र करते हुए उसके भी बोल पढ़े ‘भैया के आवे दे सत्ता में, रे उठा लेब सटा के कट्टा घरा से रे।’आगे प्रधानमंत्री ने कहा कि आप राजद और कॉन्ग्रेस के खतरनाक नारे सुन रहे होंगे उनके गानों में छर्रा कट्टा और दुनाली शामिल है। यह इनकी सोच का प्रतिबिंब है।
भारतीय जनता पार्टी के बाकी नेताओं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपने मंचों से जंगलराज का जिक्र करना नहीं भूल रहे थे। पूरे बिहार में भाजपा ने चुनाव की आखिरी कुछ दिनों में जंगल राज का नैरेटिव इतना मजबूत कर दिया कि राजद के रंगा सियार वाले चोले का चीथड़ा बन गया।
राजनीतिक अभियानों की अपनी ताकत होती है, पर बिहार के 2025 चुनाव में ‘जंगलराज’ केवल एक चुनावी जुमला नहीं रह गया था। यह एक भावना बन चुकी थी- एक ऐसी भावना जो 20–25 साल पुराने दौर की यादों से बनी, नए मतदाताओं तक वायरल क्लिप्स के जरिए पहुँची और नेताओं के भाषणों से गूँजते हुए पूरे चुनाव को संचालित करती चली गई।
जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे थे, सोशल मीडिया पर 90 के दशक के वीडियो, शहाबुद्दीन के किस्से, किडनैपिंग की खबरें और लालू-राबड़ी के दौर की कहानियाँ लगातार घूम रही थीं। आपइंडिया की टीम के द्वारा पकड़ा गया वह सिवान वाला क्लिप- जिसमें पोस्टर छूने पर ‘ज़िंदा जला देने’ वाले बयान जैसा माहौल था- वह सिर्फ़ एक वीडियो भर नहीं था। वह बहुत से लोगों के लिए 90 का भय फिर से जी उठने जैसा था। हजारों लोगों ने इसे अपने फेसबुक वॉल पर शेयर किया।
और आपको पता है, यह सब कुछ बहस नहीं थे- ये यादें और डर थे, जिन्हें किसी तथ्य-जाँच की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि लोग इन्हें अपने अनुभवों से पहचानते हैं।
उधर मृत्युंजय शर्मा के इंटरव्यू क्लिप बिहार भर में वायरल हो गए। चारा घोटाले का ब्यौरा, अफ़सरों का ट्रांसफ़र, डर का वातावरण- ये सब बातें पहली बार बिहार के नए मतदाताओं ने इतने विस्तार से सुनीं। किताबें सीमित पाठकों तक पहुँचती हैं, लेकिन इंटरव्यूज़ लाखों के मोबाइल में पहुँच जाते हैं।
इतिहास का यह ‘रीटेल’ वर्जन जंगलराज की छवि को और मजबूत करता गया।
इसके बाद जब प्रधानमंत्री मोदी अपनी रैलियों में कट्टा, छर्रा, गमछा और रंगदारों के दौर का तंज कसने लगे और हर सभा में 25–30 बार जंगलराज शब्द को दोहराने लगे, तो माहौल पूरी तरह बदल गया।
नीतीश कुमार ने भी पहली सभा से ही रात में घर से न निकल पाने वाले दिनों को याद दिलाना शुरू कर दिया।
अमित शाह ने भीड़ से पूछा- “विकास चाहिए या जंगलराज?”
और हर तरफ़ से उठी आवाज़- ‘विकास’ ने संकेत साफ़ कर दिया कि यह मुद्दा अब केवल भाषणों का हिस्सा नहीं, बल्कि जनता की प्राथमिक चिंता बन चुका है।

2025 का चुनाव एक अजीब विरोधाभास था-नए युवाओं ने वायरल वीडियो देखकर जंगलराज को जाना और बूढ़ी पीढ़ी ने अपने अनुभवों की पुष्टि पाई।
दोनों की आशंकाएँ एक जगह आकर मिलीं और यही वह क्षण था जब जंगलराज सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया।


