एक संजय जिसके कारण बाला साहेब ने कुत्ता पालना छोड़ दिया, दूसरे ने उनके बेटे को धोबी का कुत्ता बना दिया

निरुपम के जाने के बाद एक मौके पर बाल ठाकरे ने कहा था कि मैंने कुत्ता पालना छोड़ दिया है। लेकिन उद्धव में न तो बाला साहेब वाले तेवर हैं और न उन जैसी धमक। सो, शायद ही वह कभी अपना दर्द बयॉं कर पाएँ।

24 अक्टूबर को जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो किसी ने भी यह नहीं सोचा होगा कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगेगा। 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 105 और उसकी सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिली थी। लेकिन, शिवसेना की एक जिद्द ने न केवल राज्य की राजनीति को भॅंवर में फॅंसाया, बल्कि उसकी खुद की हालत भी ‘न राम मिली, न माया’ जैसी कर दी।

इस सियासी ड्रामे में जो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा वह है शिवसेना सांसद संजय राउत का। राउत पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के कार्यकारी संपादक भी हैं। उनकी अति सक्रियता ने लोगों को उस दौर की याद दिला दी है, जब शिवसेना की तरफ से इसी तरह बड़े-बड़े दावे करने के लिए ‘हिंदी का सामना’ के कार्यकारी संपादक संजय निरुपम जाने जाते थे। उस दौर में कहा जाता था कि निरुपम वहीं बोलते हैं, जो बाला साहेब का आदेश होता है। जब राउत बार-बार “शिवसेना का ही सीएम होगा” दोहरा रहे थे, तब भी यही माना जा रहा था कि वे उद्धव ठाकरे के दिल में दफ़न आकांक्षा को ही बयॉं कर रहे हैं।

निरुपम के दिन बहुरने तब शुरू हुए जब 1993 में उन्हें ‘दोपहर का सामना’ का कार्यकारी संपादक बाला साहेब ने बनाया। कुछ दिनों में ही वे बाल ठाकरे की आँखों के तारे हो गए। वफादारी का इनाम भी उन्हें जल्द मिला। बाला साहेब ने 1996 में उन्हें राज्यसभा में भेज दिया। लेकिन, राजनीति में स्थापित होते ही निरुपम 2005 में शिवसेना को छोड़ कॉन्ग्रेस में चले गए।

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इधर, निरुपम कॉन्ग्रेस में गए और उधर शिवसेना में राउत का कद बढ़ने लगा। वैसे, राजनीति में राउत का सितारा भले निरुपम के जाने के बाद चमका हो, लेकिन सामना के कार्यकारी संपादक वे 1992 में ही बन गए थे। कहा तो यह भी जाता है कि निरुपम की मातोश्री में एंट्री भी उन्होंने ही कराई थी। निरुपम की पत्नी गीता वैद्य मराठी हैं और राउत की पुरानी परिचित भी। 1992 के दंगों के और 1993 के बम धमाकों के बाद जब बाला साहेब ने हिन्दी भाषियों के लिए अखबार शुरू करने का फैसला किया तो राउत ने ही उन्हें निरुपम का नाम सुझाया था।

निरुपम के जाने के बाद शिवसेना में बड़बोले नेता की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही थी। उसी जगह को भरने के लिए राउत आगे बढ़ाए गए। लेकिन, इसकी बड़ी कीमत बाला साहेब की हिन्दुत्वादी राजनीति को चुकानी पड़ी है। मातोश्री अब ‘मातेश्री’ का शरणागत है। शिवसेना ने उस कॉन्ग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश की, जिसके सरकार को कभी बाला साहेब ने ‘हिजड़ों का शासन’ कहा था। उद्धव ठाकरे ने सोनिया गॉंधी और शरद पवार जैसों की राजनीति पर भरोसा किया। उनके कहने पर मोदी कैबिनेट से अपने मंत्री को इस्तीफा दिलवा दिया। फिर भी सोनिया गॉंधी और शरद पवार ने अकेले छोड़ दिया।

निरुपम के जाने के बाद एक मौके पर बाल ठाकरे ने कहा था कि मैंने कुत्ता पालना छोड़ दिया है। लेकिन उद्धव में न तो बाला साहेब वाले तेवर हैं और न उन जैसी धमक। सो, शायद ही वह कभी अपना दर्द बयॉं कर पाएँ। वे शायद भूल गए थे कि धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का आँखों देखा हाल सुनाने वाला राज सारथी संजय था। ये आज के संजय हैं। बड़बोलेपन से अपने नेता की लुटिया डूबोने का मौका नहीं छोड़ते। चाहे वे कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता संजय झा हों या फिर नीतीश कुमार के करीबी बिहार के मंत्री संजय कुमार झा

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