कोलकाता में फुटबॉल फैन्स के लिए जो पल सपनों जैसा माना जा रहा था, वह कुछ ही मिनटों में अफरातफरी, तोड़फोड़ और पुलिस के लाठीचार्ज में बदल गया। लियोनेल मेसी का विवेकानंद युवा भारती क्रीड़ांगन (साल्ट लेक स्टेडियम) में छोटा सा दौरा न केवल हजारों फैन्स को निराश कर गया बल्कि एक बार फिर यह दिखा दिया कि गैर NDA दलों द्वारा शासित राज्यों में भीड़-भाड़ वाले आयोजनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने में कितनी खामियाँ रहती हैं।
#WATCH | Kolkata, West Bengal: Angry fans resort to vandalism at the Salt Lake Stadium in Kolkata, alleging poor management of the event.
— ANI (@ANI) December 13, 2025
Star footballer Lionel Messi has left the Salt Lake Stadium in Kolkata.
A fan of star footballer Lionel Messi said, "Absolutely terrible… pic.twitter.com/TOf2KYeFt9
कोलकाता में फैली अराजकता कोई अकेली शर्मनाक घटना नहीं है। इस साल की शुरुआत में कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की IPL जीत के जश्न के दौरान हुई दुखद भगदड़ में कम-से-कम 11 लोगों की जान चली गई थी। एक घटना में तोड़फोड़ और अराजकता हुई जबकि दूसरी में लोगों की जान ही चली गई। हालाँकि, दोनों ही मामलों की मूल वजह TMC और कॉन्ग्रेस की सरकार की प्रशासनिक विफलता है।
वैश्विक शर्मिंदगी की वजह बना कोलकाता
मेसी अपने इंटर मियामी के साथियों रोड्रिगो दे पॉल और लुइस सुआरेज के साथ सॉल्ट लेक स्टेडियम पहुँचे। उनके आने से वहाँ भगदड़ जैसी स्थिति बन गई, जिसे किसी भी सक्षम प्रशासन को पहले से ही संभाल लेना चाहिए था। अर्जेंटीना के फुटबॉल स्टार मेसी मोहन बागान और डायमंड हार्बर के मैच के दूसरे हाफ में स्टेडियम में आए। जैसे ही उनकी ऑडी मैदान पर आई, फील्ड पर मौजूद लोग उनके पास दौड़ पड़े।
पुलिस, कैमरा-मैन, पिच पर घुसने वाले लोग, आयोजक, मंत्री और VIP सब एक साथ जुट गए। सुरक्षा के बजाय आयोजक बार-बार बस यही कहते रहे, “कृपया उन्हें जगह दें, कृपया मैदान खाली करें।” इस एक वाक्य ने ही विफलता को स्पष्ट कर दिया कि राज्य ने अपने ही आयोजन स्थल पर अपना नियंत्रण खो दिया था।
काले कपड़े पहने और सुरक्षाकर्मियों से घिरे मेसी को बढ़ती भीड़ के बीच हिलने-डुलने में भी मुश्किल हो रही थी। मैदान पर 15 मिनट से अधिक समय बिताने के बावजूद, आयोजक बुनियादी तौर पर देखने के लिए एक गलियारा भी नहीं बना पाए थे।
हजारों टिकट धारक, जिनमें से कई ने 10,000 रुपए तक का भुगतान किया था, उन्हें मुश्किल से ही देख पा रहे थे। प्रेस बॉक्स से भी मेसी मुश्किल से दिखाई दे रहे थे जबकि फोटोग्राफर भीड़ के बीच यह अंदाजा लगाते रह गए कि आखिर महान खिलाड़ी कहाँ हैं।
Watch Lionel Messi surrounded by politicians and officials at Kolkata's Salt Lake Stadium moments before chaos erupted.
— Firstpost Sports (@FirstpostSports) December 13, 2025
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कार्यक्रम के आयोजक सताद्रु दत्ता और पश्चिम बंगाल के खेल मंत्री अरूप बिस्वास सहित कई मंत्रियों और VVIP की मौजूदगी ने फुटबॉलर के आसपास अफरा-तफरी को और बढ़ा दिया। यह मेसी के प्रशंसकों के लिए एक सुखद क्षण होना चाहिए था लेकिन यह एक राजनीतिक तमाशा बन गया, जिससे जनता का गुस्सा और भड़क उठा।
‘मेसी-मेसी’ के नारे जल्द ही जोरदार हूटिंग में बदल गए। कुछ ही मिनटों में, लोगों का गुस्सा तोड़फोड़ में तब्दील हो गया। प्लास्टिक की बोतलें और मलबा ग्राउंड पर फेंका गया। स्टेडियम की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी तेजी से बिगड़ी कि पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा।
स्टेडियम में प्रवेश करने के महज 22 मिनट बाद, मेसी को उनकी कार तक वापस ले जाया गया। उनके जाते समय, प्रशंसकों ने ‘वी वॉन्ट मेसी’ के नारे लगाए। इस अफरा-तफरी और अव्यवस्था के बीच कई लोग उस फुटबॉल दिग्गज को देखे बिना ही चले गए, जिसे देखने के लिए उन्होंने भारी कीमत चुकाई थी।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बाद में एक्स (X) पर माफी माँगी और एक सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में जाँच समिति बनाने की घोषणा की। यह विपक्ष की जानी-पहचानी आदत है- पहले घटना हो जाने देना और फिर बाद में पछतावा जताना, ना कि पहले से सही शासन व्यवस्था करना।
बेंगलुरु: वही विफलता, जो जानलेवा बन गई
अगर कोलकाता में हुई घटना एक चेतावनी थी, तो बेंगलुरु में साल की शुरुआत में वही त्रासदी पहले ही घट चुकी थी।
इस साल RCB ने 18 साल बाद अपनी पहली IPL ट्रॉफी जीती। इस जश्न के लिए एम चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर भारी भीड़ जमा हुई थी। ऐसा होना था यह पहले से साफ-साफ नजर आ रहा था। लोगों का जोश और उत्साह कितना बड़ा होगा, इसका अंदाजा पहले ही लगाया जा सकता था। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक में कोई ठोस तैयारी नहीं की गई।
परिणामस्वरूप भगदड़ हुई, जिसमें 11 लोगों की मौत और दर्जनों घायल हुए। प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और वायरल वीडियो से पता चला कि एंट्री पॉइंट्स पर भीड़ फँस गई थी, भीड़ पर कोई नियंत्रण नहीं था, बैरिकेडिंग कमजोर थी, पुलिस और आपातकालीन व्यवस्था पूरी तरह तैयार नहीं थी।
लोग कंधे से कंधा सटाकर खड़े थे, न आने-जाने के लिए साफ रास्ते थे जो कि भीड़ प्रबंधन के बुनियादी नियमों का खुले आम उल्लंघन है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव निर्मित त्रासदी थी।
यह विफलता पिछले साल मुंबई में टीम इंडिया की टी20 विश्व कप विजय परेड के आयोजन से बिलकुल अलग है। NDA नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार के तहत मरीन ड्राइव पर खुले बस में जुलूस निकाला गया, जिसमें नरीमन पॉइंट से चौपाटी तक भारी भीड़ जुटी थी। सटीक योजना, बहु-स्तरीय सुरक्षा और पुलिस की मजबूत तैनाती के कारण कोई बड़ी घटना नहीं हुई।
बेंगलुरु में तो खुली बस परेड का प्रयास भी नहीं किया गया। फिर भी, स्टेडियम में आयोजित यह उत्सव भी घातक साबित हुआ।
शासक के बिना शासन
कोलकाता में हुए अराजकता और इस साल पहले बैंगलुरु में हुई भीषण त्रासदी एक ही पैटर्न को दिखाती हैं। विपक्ष की सरकारें व्यवस्था से ज्यादा दिखावे को तवज्जो देती हैं, सिस्टम की जगह प्रतीकों पर ध्यान देती हैं और सख्ती लागू करने के बजाय तुष्टिकरण करती हैं।
वे पुलिस को राजनीति का औजार बना देती हैं। अनुशासन लागू करने से कतराती हैं। उन्हें ‘सख्त’ दिखने का डर रहता है और जब हालात हाथ से निकल जाते हैं, तो वही पुराना तरीका अपनाया जाता है- माफी, मुआवजे की घोषणा और जाँच समितियाँ। कानून-व्यवस्था कोई वैकल्पिक काम नहीं है। यही सरकार की वैधता की बुनियाद होती है।
कोलकाता में लाठीचार्ज के बीच बिना किसी को दिखे मेसी का निकाल लिया जाना और बेंगलुरु में इस साल प्रशंसकों का कुचले जाकर मारे जाना ये कोई दुर्भाग्यपूर्ण संयोग नहीं हैं। ये गहरी शासन-व्यवस्था की नाकामी के लक्षण हैं।
भारत को घटना के बाद माफी माँगने वाली सरकारें नहीं चाहिए। भारत को ऐसी सरकारें चाहिए जो अराजकता पैदा होने से पहले ही उसे रोकें। बार-बार विपक्ष-शासित राज्यों ने यह दिखाया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने जैसे शासन के सबसे बुनियादी काम में भी वे पूरी तरह नाकाम हैं।
(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


