Sunday, November 29, 2020
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छपरा के ‘नाथ’ जिसे अपने ही चेले से मिली हार तो बदले में उसे बम से उड़ाया, RJD से बेटा लड़ रहा चुनाव

अशोक सिंह पटना में रहकर अपना राजनीतिक कद बढ़ाने में जुट गए। इसी समय प्रभुनाथ सिंह ने समझौते को अपनाया, लेकिन साथ ही बदले के लिए सही मौके की तलाश करते रहे। 3 जुलाई 1995 को अशोक सिंह को विधायक बने हुए तीन महीने भी नहीं हुए थे कि पटना आवास पर उन्हें बम से उड़ा दिया गया।

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 को लेकर राजनीतिक गर्मागर्मी अपने चरम पर है। वास्तव में, बिहार की राजनीति ही असल मायनों में ‘गर्मागर्मी’ का सही और प्रत्यक्ष उदाहरण है। यहाँ चुनाव में जन समर्थन के साथ पैसा और बाहुबल का भी खेल देखने को मिलता है। चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आज राजनीति के एक ऐसे गुरु प्रभुनाथ सिंह की बात करेंगे, जिसे अपने ही शागिर्द से हार मिली। बदले की आग में उसने अपने शागिर्द की ही हत्या कर दी।

अपने सियासी गुरु को शिकस्त देना अशोक सिंह को पड़ा भारी

शागिर्द को विधायक बने हुए 6 महीने भी नहीं हुए थे कि उसके सियासी गुरु ने उसे बम से उड़ाकर उसकी हत्या करवा दी थी। इस विधायक का नाम था अशोक सिंह। जो किसी जमाने में बाहुबली राजनेता प्रभुनाथ सिंह के शागिर्द थे और बाद में उन्हें ही चुनावी जंग में शिकस्त दे दी। माना जाता है कि इस हार के एवज में प्रभुनाथ सिंह ने अशोक सिंह पर बम से हमला करवाकर उनके चिथड़े करवा दिए थे।

वह छपरा के कहलाते थे ‘नाथ’

प्रभुनाथ सिंह वह राजनेता रहे हैं, जिसकी किसी जमाने में बिहार के सारण में अपनी सरकार थी। जिसे जनता छपरा का ‘नाथ’ कहती थी। सियासत का वह प्रभुनाथ इन दिनों विधायक अशोक सिंह हत्याकांड मामले में जेल की कालकोठरी में रातें गिन रहा है। सजा सुनाने के दौरान हजारीबाग कोर्ट में पीड़ित पक्ष के वकील ने टिप्पणी की थी कि प्रभुनाथ सिंह ने कानून व्यवस्था को कभी समझा ही नहीं, लेकिन कोर्ट ने इसे सब कुछ समझा दिया।

बाहुबल के दम पर 30 साल सियासत में बना रहा

प्रभुनाथ सिंह बिहार की सियासत का वह नाम है, जो शिखर पर पहुँचा, लेकिन उसे अपने ही शागिर्द अशोक सिंह से शिकस्त मिली। प्रभुनाथ सिंह ने कभी लालू प्रसाद यादव का हाथ थामा तो कभी नीतीश कुमार के कैंप की शोभा बढ़ाते हुए देखे गए। लेकिन सत्ता और बाहुबल के नशे में वह भूल गए कि कानून से बड़ा कोई नहीं है। सीमेंट कारोबारी प्रभुनाथ सिंह बाहुबल के दम पर करीब 30 साल सत्ता में बना रहा। 

छपरा के मशरख विधानसभा सीट से पहली बार प्रभुनाथ सिंह निर्दलीय 1985 में चुनाव जीता। विधायक बनने से पहले प्रभुनाथ सिंह पर आरोप था कि उसने मशरक के तत्कालीन विधायक रामदेव सिंह काका की हत्या करवाई है। 1990 में प्रभुनाथ सिंह जनता दल के टिकट पर फिर से विधानसभा पहुँचा। इस दौर में अशोक सिंह प्रभुनाथ सिंह के साया बने हुए थे। लोग कहते हैं कि अशोक सिंह ही प्रभुनाथ सिंह के असल शागिर्द थे।

शागिर्द से मिली हार को पचा नहीं पाए छपरा के ‘नाथ’

प्रभुनाथ सिंह ने कभी सोचा भी ना था कि अशोक सिंह यूँ उसके शागिर्द बनकर उसकी ही राजनीतिक जमीन खिसका देंगे। जनता दल ने जब अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की तो प्रभुनाथ सिंह भौचक्क रह गया। पार्टी ने उसके शागिर्द कहे जाने वाले अशोक सिंह को मशरख से प्रत्याशी बनाया। अपने चेले के सामने अपनी ताकत को दिखाने के लिए प्रभुनाथ सिंह बिहार पीपुल्स पार्टी के टिकट पर चुनाव में उतरे, लेकिन काफी धनबल खर्च करने के बाद भी उसे करारी हार मिली। इस तरह अशोक सिंह छपरा के प्रभु की कुर्सी हथियाने में कामयाब रहे। 

इसके बाद अशोक सिंह पटना में रहकर अपना राजनीतिक कद बढ़ाने में जुट गए। वहीं, एक समय अशोक सिंह के कथित गुरु रह चुके प्रभुनाथ सिंह इस हार की आग में जल रहे थे। यह वह वक्त था जब प्रभुनाथ सिंह ने समझौते को अपनाया, लेकिन साथ ही बदले के लिए सही मौके की तलाश करते रहे। 3 जुलाई 1995 को अशोक सिंह को विधायक बने हुए तीन महीने भी नहीं हुए थे कि पटना आवास पर उन्हें बम से उड़ा दिया गया। 

जिस वक्त अशोक को बम से उड़ाया था उस वक्त प्रभुनाथ सिंह के भाई दीनानाथ सिंह भी मौके पर मौजूद थे। हत्या में प्रभुनाथ सिंह, उनके भाई दीनानाथ सिंह तथा मशरक के रितेश सिंह को नामजद अभियुक्त बनाया गया। हत्याकांड के बाद प्रभुनाथ सिंह ने पटना की राजनीति छोड़कर दिल्ली का रुख किया और लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गया। हालाँकि, इस मामले में वो बाद में दोषी पाया गया और अब जेल में सजा काट रहा है।

नीतीश के सहयोग से संसद पहुँचा प्रभुनाथ

इसके बाद लगा कि छपरा में प्रभुनाथ सिंह का एकक्षत्र राज्य हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। इस हत्याकांड के बाद प्रभुनाथ सिंह का पतन शुरू हो गया। अशोक सिंह की पत्नी चांदनी कानून के सामने इंसाफ के लिए डटी रहीं। कोर्ट की हर तारीख पर उनका हौसला देखते ही बनता था। इसी बीच प्रभुनाथ सिंह समता पार्टी में चला गया और 1998 के लोकसभा चुनाव में महाराजगंज लोकसभा सीट से जीतकर संसद पहुँच गया।

नीतीश से रार, लालू से प्यार

24 अगस्त 2006 को लोकसभा की बैठक में प्रभुनाथ सिंह ने लालू प्रसाद यादव पर सीधे आरोप लगाया था कि आरा में हुई एक हत्या में लालू के रिश्तेदार शामिल थे। लालू प्रसाद यादव ने प्रभुनाथ सिंह को सदन में गुंडा तक कहा था। प्रभुनाथ सिंह अगस्त 2010 में नीतीश से अलग हुआ और अपने चिर प्रतिद्वंदी लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया।

प्रभुनाथ की राष्ट्रीय सियासत में दखल

प्रभुनाथ सिंह ने उस दौर में बिहार की सियासत में कदम रखा, जब बंदूक और लाठी के बल पर चुनाव का फ़ैसला होता था। नेता अपने साथ लठैतों और बंदूकवाले गुंडों की फौज पालते थे, जो अपने नेता के लिए नोट और वोट बटोरने से लेकर बूथ कैप्चरिंग का भी काम करते थे लेकिन दौर बदला और लाठी और बंदूक रखने वाले गुंडे खुद उन राजनेताओं के सिर पर पैर रखकर आगे निकलने लगे।

सांसद होने के बावजूद यह वह दौर था जब प्रभुनाथ सिंह पर कई मुकदमे दर्ज हुए। कभी डीएम को धमकाने के मामले में तो कभी चुनाव अयोग पर तंज कसने को लेकर। लेकिन सच तो ये है कि प्रभुनाथ सिंह ने सियासी रसूख के चलते हर बार कानूनी शिकंजे से दूर रहा। नोट को वोट में बदलना और बाहुबल का दम दिखाना, बिहार के इस पूर्वी इलाके की पहचान रही है। 

हालाँकि, सियासत में कूदने से पहले ही प्रभुनाथ का आस्तीन दाग़दार हो चुका था। 1980 में मशरक के विधायक रामदेव सिंह की हत्या हुई थी और आरोप लगा था प्रभुनाथ सिंह पर। कहा जाता था कि अपनी चुनावी पारी शुरू करने के लिए रामदेव सिंह को एक कारोबारी ने अपने रास्ते से हटा दिया। चाहे दामन पर कितने भी दाग क्यों न हो, वो अपने रसूख का इस्तेमाल कर दागदार दामन को बेदाग करने की जुगत में लगा रहा। ऐसा नहीं है कि कामयाबी नहीं मिली बल्कि इसी दौरान सबूतों के अभाव में रामदेव सिंह काका की हत्या के आरोप से वो बरी भी हुआ।

1998 के आम चुनाव में प्रभुनाथ सिंह ने समता पार्टी के टिकट पर राजपूत वोटों का गढ़ कहे जाने वाले महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और स्थानीय राजपूतों के सपोर्ट के बिना कॉन्ग्रेस के महाचंद्र प्रसाद सिंह को हराकर लोकसभा में पहुँचा। 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की।

उसके बाद प्रभुनाथ सिंह की सियासी नजदीकियाँ नीतीश कुमार से बढ़ने लगी और 2004 में हुए आम चुनाव में जदयू के टिकट पर उन्होंने जीत हासिल की। 2009 के लोकसभा चुनाव में वे फिर जीत की हैट्रिक लगाने से चूक गए और राजद के उमाशंकर सिंह के हाथों उसे पराजय झेलनी पड़ी।

वर्ष 2012 में महाराजगंज सांसद उमाशंकर सिंह का निधन हो गया और उपचुनाव से ठीक पहले प्रभुनाथ सिंह ने नीतीश यादव का हाथ छोड़ लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाया और राजद में शामिल हो गया। 2013 में महाराजगंज लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में राजद के टिकट पर प्रभुनाथ सिंह को जीत मिली। इस चुनाव को नीतीश और लालू की नाक की लड़ाई की तौर पर देखा जा रहा था। प्रभुनाथ सिंह छपरा ज़िले की महाराजगंज सीट से आरजेडी के चुनाव चिन्ह पर फिर से ताल ठोकने उतरा और लालू यादव अपने पुराने प्रतिद्वंदी को चुनाव जिताने पहुँचे। वोटिंग हुई, और चाहे जैसे कहें प्रभुनाथ सिंह ने बाज़ी मार ली। 

साल 2014, लोकसभा चुनाव

बीजेपी ने प्रधानमंत्री पद के लिए गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी को प्रोजेक्ट किया। जनता दल युनाइटेड के नीतीश को नरेंद्र मोदी का साथ स्वीकार नहीं था और दोनों पार्टियों का सालों का नाता टूट गया। सियासी समीकरण उलट चुके थे, ये मोदी की लहर थी और इसमें विरोधी दलों में किसी के लिए भी सीट बचा पाना काफी मुश्किल होने वाला था, प्रभुनाथ को इसका इल्म था, लिहाज़ा एक बार फिर उसका बाहुबली रूप सामने आया जो चुनावी रैलियों में खुलेआम अपने समर्थकों से बूथ कैप्चरिंग तक करने की बात कह देता था।

प्रभुनाथ सिंह ने रैली में खुलेआम कहा था, “एक बटन दबाना हो, एक दबाओ, मौका मिले तो दो तीन चार भी दबाओ और अगर कोई सामने आए उसे अपनी ताकत भी दिखाओ।” साम, दाम, दंड, भेद, कुछ काम नहीं आया और साल 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रभुनाथ सिंह हार गया, लेकिन ऐसा नहीं था कि इससे उसका सियासी रसूख कम हो गया था। अपने छोटे भाई केदारनाथ सिंह को तीन बार विधायक बनवा चुका था और 2014 के उपचुनाव में छपरा विधानसभा सीट से अपने वारिस रणधीर कुमार सिंह को भी MLA बनवा चुका था।

बेटे और भाई को भी बनवाया विधायक

प्रभुनाथ सिंह अपने सियासी रुतबे और बाहुबल के दम पर भाई केदारनाथ को मशरक और बनिया विधानसभा सीट से तीन बार विधायक बनवाने में सफल रहा। इसके अलावा 2014 के उपचुनाव में छपरा सीट से बेटे रणदीप को भी विधायकी के चुनाव में जीत दिलवाया। लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में बेटे की कारारी हार हुई। इसके बाद से प्रभुनाथ सिंह का सियासी पतन शुरू हो गया। क्योंकि कोर्ट में यह दबंग पूरी तरह घिरता चला गया। प्रभुनाथ सिंह का सूरज अस्त हो रहा था। उसका वर्चस्व कम होता जा रहा था। उधर महागठबंधन की सरकार बनी लेकिन गठबंधन ज़्यादा दिन चल नहीं सका। इस बीच में वो वक़्त आता है जब होता है प्रभुनाथ सिंह के गुनाहों का हिसाब।

अब सलाखों के पीछे कट रही जिंदगी

विधायक अशोक सिंह की हत्या मामले में अदालत ने प्रभुनाथ सिंह, उसके भाई दीनानाथ सिंह और भतीजे रितेश सिंह को दोषी ठहराया और 23 मई 2017 को तीनों को उम्रकैद की सजा सुनाई। 22 साल बाद उम्मीद इंसाफ की चौखट पर जीत गई और बाहुबल के दम पर ताउम्र जनता के रहनुमा होने का भ्रम खरीदने वाले प्रभुनाथ सिंह को सलाखों में कैद कर दिया गया। जेल में भी उसने बाहुबल और धनबल का प्रयोग किया और इसकी बानगी तब देखने को मिली जब जेल में छापेमारी के दौरान प्रभुनाथ सिंह के कब्जे से 76 हजार रूपए नगद और मोबाइल फोन बरामद हुआ। 

प्रभुनाथ सिंह जेल में है, सज़ायाफ़्ता होने की वजह से वो चुनाव नहीं लड़ सकता, बेटा रणधीर सिंह सियासी विरासत को आगे बढ़ाते हुए छपरा सीट से 2020 में ताल ठोक रहा है, देखना है डर के आधार पर वर्चस्व एक फिर कायम हो पाएगा या नहीं। प्रभुनाथ सिंह के खिलाफ लगभग 40 गंभीर मुकदमे हैं, लेकिन उसे अब तक केवल एक ही केस में सजा मिली है।

बिहार में बाहुबलियों को टिकट दे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचना चाहते हैं तेजस्वी यादव 

लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद का कमान संभाल रहे तेजस्वी यादव किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना चाहते हैं। चुनाव जितने के लिए उन्होंने खुलकर बाहुबलियों पर भरोसा किया है। राजद ने छपरा से प्रभुनाथ सिंह के बेटे रणधीर सिंह को टिकट दिया है। तेजस्वी यादव ने बाहुबलियों को या फिर उनकी पत्नियों और बेटों को बड़ी संख्या में अपना उम्मीदवार बनाया है। 

दूसरी ओर पार्टी ने सहरसा से बाहुबली सांसद रहे आनंद मोहन की पत्नी को इस बार चुनावी मैदान में उतारा है। राजद ने आनंद मोहन की पत्नी और उनके बेटे चेतन आनंद को भी टिकट दिया है। चेतन आनंद जहाँ अपने परिवार की परंपरागत सीट शिवहर से चुनावी मैदान में होंगे तो वहीं उनकी माँ लवली आनंद सरसा से चुनाव लड़ेंगी।

इसके अलावा राजद ने जेल में बंद बाहुबली विधायक अनंत सिंह जैसे नेताओं को भी टिकट दिया है जो कि इस बार मोकामा से चुनावी ताल ठोक रहे हैं और नामांकन भी कर चुके हैं। राजद से जिन बाहुबलियों के परिवार को टिकट मिला है उनमें रामा सिंह, अरूण यादव, राजबल्लभ यादव जैसे चेहरे भी शामिल हैं।

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