देश की कई बड़ी औद्योगिक कंपनियाँ हाल ही में कलकत्ता हाईकोर्ट पहुँची हैं। वजह है पश्चिम बंगाल सरकार का विवादित फैसला, जिसमें 1993 से अब तक दी गई सभी औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं को खत्म कर दिया गया है।
अल्ट्राटेक सीमेंट, इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग, ग्रासिम इंडस्ट्रीज, नुवोको विस्तास और डालमिया सीमेंट जैसी कंपनियों ने सरकार के इस फैसले को ‘असंवैधानिक’ बताते हुए याचिकाएँ दायर की हैं। हाईकोर्ट ने सभी अपीलों की संयुक्त सुनवाई 7 नवंबर 2025 के लिए तय की है।
उल्लेखनीय है कि मार्च 2025 में पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंगाल अनुदान और प्रोत्साहन की प्रकृति में प्रोत्साहन योजनाओं और दायित्वों का निरसन विधेयक, 2025 पारित किया था। इस विधेयक को अप्रैल 2025 में अधिसूचित किया गया था।
इस विधेयक के तहत 1993 से अब तक लागू सभी औद्योगिक नीतियों में दी गई रियायतें वापस ले ली गईं। इसमें जमीन पर सब्सिडी, टैक्स रीफंड, बिजली और ब्याज पर छूट समेत कई सुविधाएँ शामिल थीं। सरकार का तर्क है कि अब इन पैसों को ‘आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्गों’ पर खर्च करना जरूरी है।
इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग ने अपनी याचिका में कोर्ट से अधिनियम को ‘अधिकार से बाहर और असंवैधानिक’ घोषित करने की माँग की। उद्योग विभाग के अधिकारियों ने माना कि कई कंपनियाँ इस फैसले के बाद लाभ में काम नहीं कर पा रहीं। हालाँकि, सरकार ने केवल इतना कहा है कि ‘नई औद्योगिक नीति’ बनाई जा रही है।
उद्योग का दुश्मन रहा है बंगाल
यह विवाद कोई नया नहीं है। पश्चिम बंगाल का इतिहास यही बताता है कि यहाँ उद्योग हमेशा राजनीति की भेंट चढ़े हैं। वामपंथी दौर में मजदूर संघों की सख्ती और पूँजी-विरोधी नीतियों ने बड़े घरानों को राज्य से बाहर कर दिया। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी सत्ता में सिंगुर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों की बदौलत आई, जिनमें किसानों की जमीन पर फैक्ट्री लगाने का विरोध किया गया था।
जुलाई 2025 में केंद्र सरकार ने खुलासा किया कि साल 2011 से अब तक 6,600 से ज्यादा कंपनियाँ बंगाल छोड़कर जा चुकी हैं, जिनमें से 2,200 कंपनियाँ सिर्फ पिछले पाँच साल में बाहर गईं हैं। इनमें से ज्यादातर यूपी, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली चली गईं। साल 2024 में ब्रिटानिया ने भी अपनी कोलकाता की फैक्ट्री बंद कर दी। टाटा को तो पहले ही सिंगुर से जाना पड़ा। जूट मिलें भी लगातार बंद हो रही हैं।
राजनीति बनाम विकास
ममता बनर्जी सरकार के लिए यह फैसला केवल अर्थशास्त्र नहीं बल्कि राजनीति का हिस्सा है। साल 2026 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और कल्याणकारी योजनाएँ ही सरकार की रणनीति हैं।
हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि इस तरह की नीतियाँ बंगाल को ठहराव की ओर धकेल रही हैं। जहाँ दूसरे राज्य सस्ती जमीन और निवेशकों के लिए आसान नीतियाँ देकर उद्योग खींच रहे हैं, वहीं बंगाल उन्हें भगा रहा है। 1960 के दशक में जहाँ राज्य का देश के औद्योगिक उत्पादन में हिस्सा 10% से ज्यादा था, वहीं अब यह घटकर लगभग 3.5 प्रतिशत रह गया है।
जिस बंगाल को कभी ‘पूरब का मैनचेस्टर’ कहा जाता था, आज वही बंगाल उत्पाद के बजाए मजदूरों को निर्यात कर रहा है। लाखों युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, केरल और महाराष्ट्र जाने को मजबूर हैं।
उद्योग से समाजवादी दलदल तक
इसका निशाना सटीक है। वामपंथियों ने निजी उद्योग को दुश्मन मानकर माहौल खराब किया। उसके बाद ममता बनर्जी ने ‘माँ-माटी-मानुष’ की राजनीति के नाम पर फैक्ट्रियों के खिलाफ आंदोलनों को हवा दी। आज हालत यह है कि राज्य में उद्योगपति निवेश करने से कतराते हैं, ठेकेदारी और माफिया का बोलबाला है और राजनीति में वोट बैंक को खुश करने के लिए उद्योग की बलि चढ़ाई जा रही है।
हाईकोर्ट में दाखिल की गई याचिकाएँ सिर्फ औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं की बहाली के लिए नहीं हैं। असल सवाल यह है कि क्या बंगाल अब भी निवेश का गंतव्य तय कर सकता है। राज्य के लोगों के लिए यह एक चेतावनी है कि कभी उद्योग का गढ़ रहा बंगाल, आज राजनीतिक लोकलुभावन वादों की भेंट चढ़कर पिछड़ता जा रहा है।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। विस्तार से रिपोर्ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)


