राहुल गाँधी ने बुधवार (5 नवंबर 2025) को दावा किया कि हरियाणा विधानसभा चुनाव में जिन सीटों पर पोस्टल बैलट में कॉन्ग्रेस आगे थी, वहाँ वोट चोरी हुई क्योंकि फाइनल रिजल्ट में हार गए। उनका कहना था कि पोस्टल बैलट काउंटिंग में कॉन्ग्रेस कुछ सीटों पर बीजेपी से आगे थी, लेकिन ईवीएम वोटिंग के बाद बीजेपी जीत गई। अगर उनका दावा सही होता तो हर सीट पर यही होता। लेकिन सच इससे बहुत दूर है।
ऑपइंडिया ने हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 के सभी सीटों के फाइनल रिजल्ट चेक किए और पाया कि चार सीटें ऐसी थीं जहाँ बीजेपी पोस्टल बैलट में आगे थी लेकिन फाइनल में कॉन्ग्रेस से हार गई।
चुनाव आयोग की वेबसाइट के डेटा के मुताबिक जुलाना, हाथिन, नाँगल चौधरी और आदमपुर में बीजेपी पोस्टल बैलट में कॉन्ग्रेस से आगे थी। लेकिन अंत में पार्टी कॉन्ग्रेस से हार गई।

राहुल गाँधी के दावों पर विचार करते हुए सिर्फ वो उदाहरण चुनना जहाँ कॉन्ग्रेस पोस्टल बैलट में आगे थी और जहाँ पीछे थी उन्हें नजरअंदाज करना… जैसा राहुल गाँधी ने किया। यह दिखाता है कि पोस्टल बैलट फाइनल रिजल्ट एनालिसिस के लिए भरोसेमंद आधार नहीं हैं।
फाइनल रिजल्ट एनालिसिस के लिए भरोसेमंद आधार नहीं पोस्टल बैलट
अब जब राहुल गाँधी के दावे गलत साबित हो गए हैं, तो समझना जरूरी है कि पोस्टल बैलट को फाइनल रिजल्ट एनालिसिस का आधार क्यों नहीं बनाया जा सकता। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “दूसरी हैरान करने वाली बात यह थी कि हरियाणा में पहली बार पोस्टल वोट रिजल्ट से अलग थे। पोस्टल बैलट में कॉन्ग्रेस को 73 सीटें मिलीं जबकि बीजेपी को 17 सीटें।”
सबसे पहले ज्यादातर विधानसभा क्षेत्रों में पोस्टल बैलट की संख्या कुल वोटों की तुलना में बहुत कम होती है। ज्यादातर मामलों में यह 1% से भी कम होती है। इसलिए कुल रिजल्ट पर इनका कोई खास असर नहीं पड़ता जब तक जीत-हार का अंतर बहुत कम न हो।
उदाहरण के लिए गुहला सीट पर कुल पोस्टल बैलट 589 थे, जबकि ईवीएम वोट 1,33,287 थे, यानी पोस्टल बैलट सिर्फ 0.44% थे। कॉन्ग्रेस के देवेंद्र हंस ने 22,880 वोटों के अंतर से बीजेपी के कुलवंत राम बाजीगर को हराया। ऐसे सीटों पर पोस्टल बैलट का बड़ा रोल बताना बेवकूफी होगी।
उदाहरण के लिए गुहला सीट पर कुल पोस्टल बैलट 589 थे, जबकि ईवीएम वोट 1,33,287 थे, यानी पोस्टल बैलट सिर्फ 0.44% थे। कॉन्ग्रेस के देवेंद्र हंस ने 22,880 वोटों के अंतर से बीजेपी के कुलवंत राम बाजीगर को हराया। ऐसे सीटों पर पोस्टल बैलट का बड़ा रोल बताना बेवकूफी होगी।
तीसरे पोस्टल बैलट पहले गिने जाते हैं, लेकिन ये ग्राउंड लेवल वोटर टर्नआउट पैटर्न या बूथों पर देर से होने वाले उछाल को नहीं दिखाते जहाँ लोकल फैक्टर बहुत असर डालते हैं।
‘वोट चोरी’ की कहानी फर्जी
इन उदाहरणों और पोस्टल बैलट की प्रकृति को नजरअंदाज न करें। जिसमें राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ कहानी सिर्फ कहानी ही लगेगी, न कि फैक्ट बेस्ड। वही डेटा पॉइंट्स जिनका वे जिक्र करते हैं, आसानी से उल्टा साबित करने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिससे उनका तर्क आँकड़ों के आधार पर भी खोखला हो जाता है।
मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में प्रकाशित है। पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।


