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Saturday, May 30, 2020
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राहुल की ‘न्याय योजना’ कहीं अन्याय का प्रतीक तो नहीं…

दरअसल, कॉन्ग्रेस के पास गरीबी हटाने का कोई विजन नहीं है। वो न्याय योजना की घोषणा करके जनता को बरगलाने की कोशिश कर रही है। राहुल गाँधी ने पैसा बाँटने की योजना की बात कहकर केवल देश की जनता को ठगने का काम किया है।

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जैसे ही चुनाव का समय नजदीक आता है, राजनीतिक पार्टियों द्वारा जनता को लुभाने की भरपूर कोशिश की जाती है। इसी के मद्देनजर कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में ‘न्याय योजना’ को प्रमुखता से जगह दी और इसका बढ़-चढ़ कर प्रचार भी किया। आपको बता दें कि न्याय योजना के अंतर्गत कॉन्ग्रेस पार्टी ने चुनावी घोषणापत्र में 25 फीसदी गरीबों के खाते में ₹6 हजार प्रतिमाह के हिसाब से ₹72 हजार सालाना भेजने का वादा किया है। इस योजना को लेकर कॉन्ग्रेस लगातार कह रही है कि इसके तहत गरीबों के साथ न्याय होगा। मगर अब इस न्याय योजना को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी खुद न्यायालय के चक्कर काट रही है।

दरअसल, इलाहाबाद कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि इस तरह की घोषणा वोटरों को रिश्वत देने की कैटगरी में क्यों नहीं आती और क्यों न पार्टी के खिलाफ पाबंदी या दूसरी कोई कार्रवाई की जाए? कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग से भी जवाब माँगा है। कोर्ट का मानना है कि इस तरह की घोषणा रिश्वतखोरी व वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश है। इसलिए अदालत ने कॉन्ग्रेस पार्टी और चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन का वक्त दिया है। हाईकोर्ट के वकील मोहित कुमार द्वारा दाखिल की गई जनहित याचिका में कहा गया कि कॉन्ग्रेस ने घोषणा पत्र में गरीबों को ₹72 हजार सालाना देने का वादा कर मतदाताओं को प्रलोभन दिया है। यह आचार संहिता का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मतदाता को प्रलोभन देना निष्पक्ष मतदान के खिलाफ है। इससे मतदान की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

कोर्ट के द्वारा भेजे गए नोटिस से कॉन्ग्रेस को बड़ा झटका लग सकता है, क्योंकि कॉन्ग्रेस घोषणापत्र के जारी होने के साथ ही इस वादे का जोर-शोर से प्रचार कर रही है और इस वादे के दम पर चुनाव जीतने का भी ख्वाब देख रही है, लेकिन अब कॉन्ग्रेस की ‘न्याय योजना’ ही न्यायालय पहुँच गई है। तो अब देखना होगा कि कॉन्ग्रेस पार्टी कैसे अपनी न्याय योजना का बचाव करते हुए न्यायालय को अपना जवाब सौंपती है, और क्या न्यायालय कॉन्ग्रेस के जवाब से संतुष्ट हो पाएगी?

वैसे देखा जाए तो कॉन्ग्रेस जब से इस योजना को लेकर आई है, तब से सवालों के घेरे में है। कभी इस योजना के लागू करने को लेकर, तो कभी न्याय की बात करने को लेकर। और इस तरह के सवालों का उठना लाजिमी भी है, क्योंकि आजादी के 70 सालों में कॉन्ग्रेस ने 60 साल तक देश पर शासन किया। इस दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, मनमोहन सिंह ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देती रही, लेकिन कभी इस पर काम नहीं किया और अब राहुल गाँधी ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ एक बार फिर जनता को मूर्ख बनाने आए हैं।

दरअसल पार्टी का गरीबी हटाने का कोई मकसद ही नहीं है। कॉन्ग्रेस के द्वारा ये स्लोगन सिर्फ जनता का वोट हासिल करने का एक पैंतरा मात्र है। ऐसा लगता है कि 60 साल तक देश पर राज करने वाली पार्टी को सत्ता से दूरी खटक रही है, बेचैनी बढ़ रही है। वो बस किसी तरह से सत्ता में आना चाहती है और देश पर राज करना चाहती है।

अब यहाँ एक और सवाल ये भी उठता है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने लोकसभा चुनाव के मुख्य चुनावी वादे के रूप में न्यूनतम आय गारंटी योजना की घोषणा तो कर दी, लेकिन ये नहीं बताया कि इस भारी भरकम योजना को लागू कैसे किया जाएगा? इसके लिए फंड कहाँ से आएगा? जीडीपी और राजकोषीय घाटे पर इसका क्या असर होगा? अगर यह योजना लागू होती है, तो 2019-20 में करीब ₹3,60,000 करोड़ की जरूरत होगी। वो पैसे कहाँ से आएँगे?

कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणापत्र में इसके बारे में कोई जिक्र नहीं है कि इस योजना के लिए पैसों का इंतजाम किस तरह से और कहाँ से किया जाएगा? क्या कॉन्ग्रेस पार्टी के पास कोई ऐसा पेड़ है, जिसको हिलाने पर पैसे गिरेंगे या फिर उन्होंने कोई खजाना छुपा रखा है, जिसका वो चुनाव जीतने के बाद खुलासा करेंगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा किए गए घोटालों- अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला, बोफोर्स घोटाले, 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, नेशनल हेराल्ड घोटाला और वाड्रा के द्वारा किए गए मनी लॉन्ड्रिंग, आदि घोटाले के जरिए अर्जित किए गए अवैध संपत्ति से गरीब जनता का भला करने का सोच रहे हैं।

खैर, ये तो अलग बात है, लेकिन अगर भविष्य में ये स्कीम लागू होती है तो ये जाहिर सी बात है कि पैसे मिडिल क्लास फैमिली की जेबों से ही निकाली जाएगी। यानी कि इस योजना का भार मिडिल क्लास फैमिली पर ही पड़ने वाला है, क्योंकि राहुल गाँधी योजना तो बढ़ा देंगे, लेकिन आय का स्त्रोत तो नहीं बढ़ेगा, वो तो वही रहेगा। ऐसे में किसी न किसी टैक्स में वृद्धि की जाएगी, जिसका असर मध्यम वर्ग के लोगों पर ही पड़ेगा। इस तरह से मध्यम वर्ग के परिवारों से पैसे टैक्स के रूप में वसूल कर गरीबों को देकर वाह-वाही लूटी जाएगी। तो ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि ये न्याय योजना मिडिल क्लास फैमिली के लिए अन्याय ही साबित होगी।

चुनाव के तारीख की घोषणा होने से पहले से ही राहुल गाँधी ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगाते हुए पीएम मोदी को सत्ता से हटाना चाह रही है। क्योंकि चोर को ही चौकीदार से डर लगता है और इस चौकीदार की चौकीदारी की वजह से ही उनके (कॉन्ग्रेस) के काले कारनामों की लंबी फेहरिस्त सामने आई है, जिससे बौखला गए हैं राहुल जी।

असल में राहुल को पता है कि चौकीदार जाग रहा है और उन्हें डर है कि जिस तरह से इस चौकीदार ने उनके सारे घोटालों का बखिया उधेड़ दिया है, वो आगे भी उन्हें जनता और देश का पैसा नहीं खाने देगा। इसलिए वो किसी भी हालत में उन्हें हटाना चाहते हैं, लेकिन सच्चाई तो यही है कि देश को ऐसे ही चौकीदार की जरूरत है, जो जनता और देश के पैसों की सही रखवाली कर सके और गलत हाथों में न जाने दे।

दरअसल, कॉन्ग्रेस के पास गरीबी हटाने का कोई विजन नहीं है। वो न्याय योजना की घोषणा करके जनता को बरगलाने की कोशिश कर रही है। राहुल गाँधी ने पैसा बाँटने की योजना की बात कहकर केवल देश की जनता को ठगने का काम किया है, क्योंकि अगर कॉन्ग्रेस वाकई में गरीबी मिटाना चाहती तो स्किल इंडिया की तरह कोई योजना लेकर आती, या फिर शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए किसी तरह की योजना की बात करती।

इससे जनता के शिक्षा का स्तर बढ़ता और वो रोजगार के माध्यम से गरीबी को पीछे छोड़ आगे बढ़ते, तो ऐसा लगता कि कॉन्ग्रेस गरीबी मिटाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। और राहुल गाँधी को गरीबों और किसानों की इतनी ही चिंता है, तो वो कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में किसान सम्मान निधि योजना लागू क्यों नहीं कर रही है? क्यों वो आयुष्मान योजना के लाभ से गरीबों को वंचित रख रही है?

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