रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आने वाले थे, और दिल्ली का कूटनीतिक गलियारा उनके स्वागत की तैयारियों में जुटा था। लेकिन तभी, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के दूतों को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने एक भारतीय अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में ‘ज्ञान’ देने वाला एक लेख छपवा डाला। लेख का मकसद रूस को यूक्रेन युद्ध का विलेन बताना और भारत को कान में फुसफुसाकर समझाना कि ‘रूस से दूरी बनाओ’ था।
लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस अवांछित दखल को सीधा-सीधा ‘कूटनीतिक बदतमीजी’ करार देते हुए उन्हें करारा जवाब दिया। यूरोपीय दूतों ने सोचा कि भारत उनका मंच है, पर MEA ने साफ कर दिया कि यह देश किसी के एजेंडे पर नहीं चलता। पुतिन की यात्रा से पहले माहौल बिगाड़ने का यह खेल बुरी तरह से उल्टा पड़ गया है और अब भारत ने यूरोप को आईना दिखा दिया है।
UK-फ्रांस-जर्मनी ने अपने लेख में क्या छपवाया था?
इन तीनों देशों के दूतों (फिलिप एकरमैन, थिएरी मथौ और लिंडी कैमरून) ने एक साथ मिलकर टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) में जो लेख छपवाया, उसमें रूस पर सीधे-सीधे युद्ध भड़काने और यूक्रेन में क्रूरता दिखाने के आरोप लगाए गए। लेख का पूरा टोन ऐसा था जैसे वे भारत को समझा रहे हों कि रूस से दूरी बनाओ और यूरोप के नजरिए को अपनाओ। उन्होंने लिखा कि रूस ने यूक्रेन युद्ध ‘निर्दयता’ से लड़ा है और उसे ‘मानव जीवन की कोई परवाह नहीं’ है। उनका दावा था कि रूस साइबरअटैक, झूठी खबरें और दूसरे तरीकों से दुनिया में अस्थिरता फैलाता है। लेख में यहाँ तक कहा गया कि पुतिन ‘जानबूझकर शांति वार्ता में देरी करते हैं’ और शांति को लेकर गंभीर नहीं हैं।

लेख का लहजा ऐसा था कि मानो भारत को पढ़ाया जा रहा हो कि रूस कैसे गलत है और कैसे दुनिया उसके खिलाफ खड़ी है। उन्होंने यह भी लिखा कि दुनिया युद्ध खत्म करना चाहती है, लेकिन रूस ऐसा नहीं चाहता। यानी पूरे लेख में कोशिश यही थी कि भारत की जनता और नीति-निर्माताओं में रूस को लेकर नकारात्मक सोच पैदा की जाए। यह पूरा लेख पुतिन की भारत यात्रा से ठीक पहले छापा गया, ताकि माहौल बिगाड़ा जा सके और भारत-रूस रिश्तों में दूरी लाई जा सके।
लेख में तीनों ने साफ तौर पर यह कोशिश की कि भारत पर नैतिक दबाव बनाया जाए कि वह रूस से अपने रिश्तों पर पुनर्विचार करे। उन्होंने यहाँ तक कहा कि रूस का ‘वैश्विक व्यवहार खतरनाक’ है और उसकी नीतियाँ यूक्रेन से बाहर भी दुनिया की स्थिरता के लिए खतरा हैं। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि लेख में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेते हुए कहा कि ‘जंग से समाधान नहीं निकलते’, जैसे वे भारत की विदेश नीति को अपने तर्ज पर ढालना चाह रहे हों। यह सब करते हुए उन्होंने यह नहीं सोचा कि भारत अपनी विदेश नीति खुद तय करता है, किसी यूरोपीय निर्देश पर नहीं।
कुल मिलाकर, यह लेख सिर्फ युद्ध पर राय नहीं था, बल्कि भारत को घुमा-फिराकर यह बताने की नाकाम कोशिश थी कि वह रूस से दूरी बनाए। यही वजह है कि इस पूरे मामले ने कूटनीतिक बवाल खड़ा कर दिया और भारत के विदेश मंत्रालय को भी कड़ी प्रतिक्रिया देनी पड़ी।
कंवल सिबल की कड़क प्रतिक्रिया- ‘ये लेख नहीं, प्रचार का पोस्टर’
पूर्व विदेश सचिव कंवल सिबल ने इस लेख पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने X पर पोस्ट कर लिखा, “पुतिन की भारत यात्रा से ठीक पहले रूस के खिलाफ छापा गया यह घटिया और जहरीला लेख सीधा-सीधा कूटनीतिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाता है। यह भारत का अपमान है, क्योंकि यह हमारे एक बेहद करीबी और भरोसेमंद दोस्त देश ‘रूस’ के साथ हमारे रिश्तों पर सवाल उठाता है।”
कंवल सिबल आगे लिखते हैं, कि ये तीनों देशों के दूत भारत के अंदरूनी मामलों में दखल दे रहे हैं। साफ इरादा यही है कि भारत में बैठे pro-Europe लोग रूस के खिलाफ भड़कें और हमारे रूस के साथ रिश्तों की नैतिकता पर उंगली उठाई जाए। इन दूतों को अगर इतनी ही चिंता थी, तो MEA के पास आधिकारिक तौर पर आकर बात करते। लेकिन नहीं, इन्होंने जानबूझकर ऐसा पब्लिक तमाशा किया है, ताकि अपना प्रोपेगेंडा फैलाया जा सके।
इसके अलावा, पूर्व विदेश सचिव ने लिखा, “टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी बड़ी गैर-जिम्मेदारी दिखाई है कि उसने ऐसा लेख छापा। यह भारत की कूटनीति और राष्ट्रीय हित, दोनों के साथ खुला खिलवाड़ है। MEA को चाहिए कि वह इन तीनों दूतों की इस हरकत पर खुलकर नाराजगी जताए, क्योंकि यह साफ तौर पर कूटनीतिक शिष्टाचार का उल्लंघन है।”
विदेश मंत्रालय का कड़ा रुख: ‘हमें मत सिखाओ’
हमारे विदेश मंत्रालय ने इन यूरोपीय दूतों को बिल्कुल साफ और सीधी भाषा में आईना दिखा दिया है। MEA के अधिकारियों ने कहा कि इस तरह किसी विदेशी दूत का भारतीय अखबार (TOI) में आकर भारत को सीख देना न सिर्फ असामान्य है बल्कि पूरी तरह गलत कूटनीतिक तरीका है। दुनिया में कहीं भी राजनयिक ऐसे खुलेआम किसी देश की विदेश नीति में दखल नहीं देते, लेकिन ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के दूतों ने मिलकर यही काम किया और वो भी पुतिन के भारत आने से ठीक पहले।
विदेश मंत्रालय ने साफ-साफ कहा कि यह ‘कूटनीतिक व्यवहार स्वीकार्य नहीं‘ है कि कोई हमें सार्वजनिक रूप से बताए कि हमें रूस जैसे तीसरे देश के साथ कैसे रिश्ते रखने चाहिए। भारत किसी का पिछलग्गू नहीं है। हम कोई उपनिवेश नहीं हैं कि यूरोप बताता फिरें कि हमें किससे दोस्ती करनी है और किससे दूरी रखनी है। भारत एक स्वतंत्र देश है और अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करता है, न कि यूरोप के नैरेटिव, दबाव या एजेंडे के हिसाब से।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय में खड़ा किया गया, जब भारत और रूस एक महत्वपूर्ण श्रम समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। इस समझौते से हजारों भारतीयों को रूस में नौकरी के नए अवसर मिलने वाले हैं। यानी जबकि भारत अपने नागरिकों के लिए मौके बढ़ा रहा है और द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत कर रहा है, यूरोपीय देश यहाँ प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश में लगे थे। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि हमें ऐसी चालबाजियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। हम वही करेंगे जो हमारे देश के हित में है और कोई भी बाहरी ताकत इसे रोक नहीं सकती।
बंद करें ये दखलअंदाजी
ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के दूतों को यह समझना चाहिए कि भारत अब 1947 वाला देश नहीं है। वे इस तरह का दखल और प्रचार करके भारत की विदेश नीति को नहीं बदल सकते। यह आर्टिकल न केवल ओछी हरकत थी, बल्कि उस भारतीय अखबार TOI की भी गलती है जिसने विदेशी दूतों को देशहित के खिलाफ जाकर अपनी बात रखने की जगह दी। इन दूतों को अपनी सीमा में रहना चाहिए और भारत के रिश्तों पर सवाल उठाना बंद कर देना चाहिए। भारत और रूस का साथ मजबूत है और ऐसे फालतू लेख इसे जरा भी हिला नहीं सकते।


