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100 हत्याएँ, 28 रेप, 95 मंदिरों में तोड़फोड़ और ईशनिंदा… बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर नहीं थम रहा जुल्म: 2026 के शुरुआती 4 महीनों में 505 वारदातें, HRCBM रिपोर्ट में खुलासा

अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं और बच्चियों को इस हिंसा के दौरान सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है। रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा, बलात्कार और सामूहिक बलात्कार (गैंगरेप) की 28 खौफनाक घटनाओं का जिक्र किया गया है, जो 23 अलग-अलग जिलों में हुईं।

बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ जारी हिंसा को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है। प्रमुख मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स कॉन्ग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज’ (HRCBM) ने अपनी राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी की है।

HRCBM की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 के शुरुआती चार महीनों (जनवरी से अप्रैल) के भीतर ही अल्पसंख्यकों के खिलाफ प्रताड़ना और हिंसा की 505 दर्दनाक घटनाएँ दर्ज की जा चुकी हैं। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि बांग्लादेश में सत्ता बदलने के बावजूद हिंदुओं और अन्य कमजोर समुदायों की स्थिति रत्ती भर भी नहीं सुधरी है और वे लगातार हिंसक हमलों, हत्याओं और डकैती का शिकार हो रहे हैं।

पूरे बांग्लादेश में फैला है नफरत का जाल

यह रिपोर्ट बांग्लादेश के मौजूदा हालात का सबसे बड़ा और पुख्ता दस्तावेज है। संगठन ने बताया कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुई ये 505 वारदातें किसी एक छोटे इलाके या कस्बे तक सीमित नहीं हैं। यह पूरी तरह से एक सोची-समझी साजिश के तहत पूरे देश में फैलाई जा रही नफरत का नतीजा है।

यह हिंसा बांग्लादेश के सभी 8 प्रशासनिक विभागों और कुल 64 जिलों में से 62 जिलों में फैल चुकी है। यानी देश का शायद ही कोई ऐसा कोना बचा है, जहाँ अल्पसंख्यक समाज सुरक्षित महसूस कर सके। इसमें ग्रामीण इलाकों से लेकर बड़े शहर तक शामिल हैं, जहाँ रहने वाले हिंदू परिवार हर पल खौफ के साए में जी रहे हैं।

100 हत्याएँ और 144 अपहरण: रोंगटे खड़े कर देने वाले आँकड़े

इस चार महीने की रिपोर्ट में जो आँकड़े सामने आए हैं, वे किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच 100 लोगों की हत्या और संदिग्ध मौत के मामले सामने आए हैं, जो कि 47 अलग-अलग जिलों में हुए।

इसके अलावा, अगवा करने (किडनैपिंग) और बेरहमी से मारपीट करने की 144 वारदातें 49 जिलों में दर्ज की गईं। डराने वाली बात यह है कि ये आँकड़े केवल वे हैं जिनकी स्वतंत्र रूप से पहचान और पुष्टि हो सकी है। असल संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है, क्योंकि बहुत से लोग डर और सामाजिक दबाव के कारण पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने ही नहीं जाते।

बहू-बेटियों पर अत्याचार और जमीनों पर अवैध कब्जा

अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं और बच्चियों को इस हिंसा के दौरान सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है। रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा, बलात्कार और सामूहिक बलात्कार (गैंगरेप) की 28 खौफनाक घटनाओं का जिक्र किया गया है, जो 23 अलग-अलग जिलों में हुईं।

इसके साथ ही, हिंदुओं और स्वदेशी (आदिवासी) समुदायों की संपत्तियों को नष्ट करने, उनकी पुश्तैनी जमीनों पर जबरन कब्जा करने, घरों में आगजनी करने और लूटपाट की 132 बड़ी घटनाएँ सामने आई हैं। पैसे और ताकत के दम पर आर्थिक रूप से कमजोर अल्पसंख्यक परिवारों को बेघर किया जा रहा है ताकि वे देश छोड़ने पर मजबूर हो जाएँ।

95 मंदिरों पर हमला और ईशनिंदा के झूठे आरोप

बांग्लादेश में धार्मिक स्वतंत्रता पूरी तरह खतरे में नजर आ रही है। केवल चार महीनों के भीतर हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर हमले व तोड़फोड़ की 95 वारदातें दर्ज की गई हैं। उपद्रवी भीड़ सरेआम मंदिरों को निशाना बना रही है और पवित्र मूर्तियों को खंडित कर रही है।

इसके अलावा, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को फँसाने के लिए ‘ईशनिंदा’ (ब्लास्फेमी) का सहारा लिया जा रहा है। कुल 6 ऐसे मामले दर्ज किए गए हैं जहाँ लोगों पर झूठे आरोप लगाकर भीड़ को भड़काया गया और उनके खिलाफ हिंसा की गई।

सरकार बदली लेकिन नहीं बदला हिंदुओं का दर्द

इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण विश्लेषण यह है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन का अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ा है। साल 2025 में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के 18 महीनों के कार्यकाल में भी हिंदुओं पर भीषण अत्याचार हुए थे, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था।

इसके बाद साल 2026 में जब नई चुनी हुई सरकार सत्ता में आई, तो उम्मीद थी कि हालात सुधरेंगे। लेकिन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सरकार के तहत भी यह हिंसा उसी रफ्तार से जारी है। इससे साफ होता है कि यह संकट किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि वहां के सिस्टम की गहरी नाकामी का नतीजा है।

प्रशासन की चुप्पी और कानून का मजाक

रिपोर्ट में बांग्लादेश की कानून व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर बेहद गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि जब भी उन पर हमला होता है, तो पुलिस या तो बहुत देर से पहुँचती है या फिर मामले की जांच को कमजोर कर देती है।

अपराधियों को सजा न मिलने के कारण उनके हौसले सातवें आसमान पर हैं। पीड़ितों और गवाहों को डराया-धमकाया जाता है ताकि वे अदालत का दरवाजा न खटखटाएँ। इस तरह की संस्थागत नाकामी के कारण अल्पसंख्यक समाज पूरी तरह टूट चुका है और भारी मानसिक तनाव में जी रहा है।

अन्य संगठनों की रिपोर्ट भी दे रही गवाही

HRCBM के अलावा बांग्लादेश के अन्य मानवाधिकार संगठन भी इन दावों की पुष्टि कर रहे हैं। इससे पहले ‘बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद’ ने भी एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें जनवरी से मार्च के बीच ही 133 सांप्रदायिक घटनाओं का जिक्र था।

उस रिपोर्ट में 25 हत्याएँ, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार और 35 मंदिरों में लूटपाट की बात कही गई थी। इन सभी रिपोर्टों का कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि यदि बांग्लादेश सरकार ने तुरंत कड़े कदम नहीं उठाए और दोषियों को सजा नहीं दी, तो आने वाले दिनों में अल्पसंख्यक आबादी का वहाँ टिके रहना नामुमकिन हो जाएगा।

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मीडिया जगत में 5 साल से ज्यादा का अनुभव हो चला है। इटीवी भारत और इंडिया न्यूज के साथ ट्रेनिंग की शुरुआत की, तो सुदर्शन न्यूज चैनल में एंकरिंग, सोशल मीडिया और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अवसर मिला। न्यूज के अलावा मौका मिला एमएच1 नेशनल चैनल में, जहाँ सोशल मीडिया एक्जिक्यूटिव के पद पर तीन चैनल (श्रद्धा एमएच1, एमएच1 म्यूजिक और एमएच1 न्यूज) संभाला। इसके बाद सीनियर कंटेंट राइटर के पद पर एफिलिएट विभाग में जागरण न्यू मीडिया में काम करने का मौका मिला। अब सफर ले चला ऑपइंडिया की ओर...

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