Friday, July 1, 2022
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हंगरी की कैटालीन कारिको, जिन्हें कभी किया था डिमोट, आज उनकी तकनीक पर ही मिला विश्व को पहला कोरोना वैक्सीन

इस वैश्विक कामयाबी को दिलाने में अलग-अलग देश व क्षेत्र के दिग्गजों ने अपनी अहम भूमिका निभाई और ऐसे कार्य को संभव कर दिखाया जिसके लिए उनका नाम भविष्य में हमेशा याद किया जाएगा।

कोरोना महामारी से जंग के ख़िलाफ़ लड़ने में पिछले एक साल में हर देश ने अपना योगदान दिया। बुधवार (दिसंबर 2, 2020) को इस बीच जब फाइजर-बायोएनटेक कोविड-19 वैक्सीन (Pfizer-BioNTech COVID-19 vaccine) को यूके में अप्रूवल मिला तो हर जगह हैरानी के साथ खुशी की लहर दौड़ गई। ये पहली मैसेंजर आरएनए (mRNA) वैक्सीन है।

इस वैश्विक कामयाबी को दिलाने में अलग-अलग देश व क्षेत्र के दिग्गजों ने अपनी अहम भूमिका निभाई और ऐसे कार्य को संभव कर दिखाया जिसके लिए उनका नाम भविष्य में हमेशा याद किया जाएगा।

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, कोरोना वैक्सीन इस साल के भीतर लाने के पीछे चार नाम बेहद महत्तवपूर्ण हैं। 

1.हंगरी की कैटालिन कारिको (Katalin Kariko) 

2.तुर्की के उर साहिन (Ugur Sahin)

3. तुर्की के ओजलोम टुरैसी  (Ozlem Tureci)

4. ग्रीस निवासी और फाइजर सीईओ अल्बर्ट ब्रुला (Albert Bourla)

हंगरी की कैटालिन कारिको 

साल 1995 में हंगरी की रहने वाली कैटालीन कारिको को यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया से डिमोट किया गया था। वह उस समय mRNA पर ही रिचर्स कर रही थीं। उनकी रिचर्स लोगों को वास्तविकता से परे लगती थी और जिसके कारण उनके प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए कभी पैसे और प्रोत्साहन नहीं दिया गया।

उस समय वह चुप रहीं और अपनी काली गाड़ी 1200 डॉलर में बेचकर अपने पति बच्चों के साथ अमेरिका आ गईं। उन्होंने उस समय भी पीछे मुड़कर नहीं देखा जब उन्हें डिमोट किया गया और तब भी कुछ नहीं कहा जब उनका कंधा कैंसर की चपेट में आ गया। वह जानती थीं कि उनके काम को एक दिन तवज्जो जरूर मिलेगी। आज कोरोना काल में बनी फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन ने यह साबित कर दिया कि वह बिलकुल सही थीं। ये दोनों वैक्सीन उसी mRNA तकनीक पर आधारित हैं जिस पर कारिको सालों पहले काम कर रही थी।

उर साहिन

तुर्की के रहने वाले उर साहिन और पत्नी ओजलोम टुरैसी वैज्ञानिक आंत्रप्रेन्योर हैं। सादगी का जीवन जीने वाले साहिन अपने कार्यालय से थोड़ी दूर एक छोटे कमरे में गुजर बसर करते हैं और अपने काम पर साइकिल से जाते हैं। मात्र 4 वर्ष की आयु में वह माता-पिता के साथ जर्मनी के कलोन में आ गए थे। इसके बाद वह डॉक्टर बने और उन्होंने अपनी रिसर्च ट्यूमर सेल में इम्युनोथेरेपी पर की। शुरुआत में वह कैंसर के इलाज के लिए मोनोकोलेन एंटीबॉडी पर रिसर्च कर रहे थे, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने mRNA तकनीक पर रिसर्च करनी शुरू कर दी।

फाइजर प्रमुख अल्बर्ट कहते हैं कि साहिन एक असामान्य सीईओ हैं उन्हें केवल विज्ञान की परवाह है। बिजनेस की बात करना उनके बस की नहीं है। वहीं साहिन कहते हैं कि विश्वास और निजी रिश्ते बहुत महत्तवपूर्ण होते हैं। उनहोंने बर्लिन में एक कॉन्फ्रेंस में दो साल पहले कहा था कि ये तकनीक नई महामारी में जल्द ही वैक्सीन लाने में कारगर होगी। उनके शब्द आज के संदर्भ में सही और सटीक साबित हुए। 

ओजलोम टुरैसी

साहिन की पत्नी और उनकी सहकर्मी ओजलोम टुरैसी का जन्म तुर्की के रहने वाले भौतिक वैज्ञानिक के घर में हुआ था। उनका सपना नन बनने का था लेकिन बाद में उन्होंने मेडिसीन की पढ़ाई की और इसी बीच उनकी मुलाकात साहिन से हो गई। दोनों में काम का जुनून इतना अधिक था कि वह शादी के ठीक बाद रिसर्च के लिए अपनी लैब पहुँच गए थे। टुरैसी ने साहिन के साथ मिल कर mRNA पर रिसर्च की थी। आज जब वैक्सीन बनी है तो इस दंपत्ति की चर्चा हर ओर है।

फाइजर सीईओ अलबर्ट ब्रुला

ग्रीस निवासी अलबर्ट ब्रुला फाइजर के सीईओ और साथ ही मशहूर इम्युनोजिस्ट भी हैं। उन्होंने 25 साल अपनी कंपनी को दिए और जब कोरोना का समय आया तो उन्होंने सरकार से इस वैक्सीन पर शोध के लिए पैसा लेने से भी मना कर दिया। उन्होंने अपने वैज्ञानिकों को छूट दी और बॉयनटेक के साथ मिल कोविड की वैक्सीन तैयार की। 

दरअसल, उनका मकसद सिर्फ इस शोध को राजनीति से दूर रखना था इसलिए उन्होंने सरकार से पैसे नहीं लिए। उन्होंने कहा भी, “मैं अपने वैज्ञानिकों को नौकरशाही के दबाव से दूर रखना चाहता था। जब आप किसी से पैसा लेते हैं तो उसमें कई दबाव भी रहता है।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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