Homeरिपोर्टअंतरराष्ट्रीयएक बार फिर बदल रहा मिडिल ईस्ट का नक्शा, इजरायल ने कब्जाया दक्षिणी लेबनान...

एक बार फिर बदल रहा मिडिल ईस्ट का नक्शा, इजरायल ने कब्जाया दक्षिणी लेबनान का हिस्सा: समझें- क्या यह स्थायी है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

भविष्य में अगर अमेरिका-ईरान समझौता हुआ तो दक्षिणी लेबनान से इजरायल की येलो लाइन हट सकती है, वरना लंबा संघर्ष शुरू हो सकता है। फिलहाल मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर है।

पूरी दुनिया जब अप्रैल 2026 के बीच में इजरायल-लेबनान के बीच 10 दिन के युद्धविराम पर नजर टिकाए हुए थी, तभी इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में एक नई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) या ‘फॉरवर्ड डिफेंस लाइन’ बना दी। इजरायली रक्षा बल (IDF) ने खुद एक नक्शा जारी कर बताया कि दक्षिणी लेबनान के अंदर करीब 10 किलोमीटर गहरी यह सैन्य जोन अब उनके नियंत्रण में है। पाँच डिवीजनों की ताकत के साथ इजरायली सैनिक इस लाइन के दक्षिण में तैनात हैं।

आईडीएफ ने कहा है कि उसके सैनिक हिजबुल्लाह के ठिकानों को नष्ट करने और उत्तरी इजरायल पर हमले रोकने के लिए मैदान में डटे हैं। हालाँकि लेबनान और हिजबुल्लाह इसे संप्रभु क्षेत्र पर कब्जा बताते हुए इस कदम का विरोध किया है। एक तरफ अभी युद्धविराम की स्याही सूखी भी नहीं है कि दूसरी तरफ इजरायली बुलडोजर दक्षिणी लेबनान के भीतर बसे गाँवों में घरों को तोड़ रहे थे, तोपें चल रहे थे और हवाई हमले हो रहे थे। हालाँकि अभी युद्धविराम लागू है, लेकिन छिटपुट हमले दोनों तरफ से हो रहे हैं।

लेबनान के दक्षिणी हिस्सा में घट रही यह घटना महज एक स्थानीय तनाव नहीं है। यह मिडिल ईस्ट के भू-राजनीतिक नक्शे में एक नया अध्याय जोड़ रही है। इजरायल ने पहले भी लेबनान पर कब्जा किया था, जिसमें 1982 से 2000 तक 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर कब्जा रखा था। तब भी उसने लिटानी नदी तक पहुँचने का सपना देखा था और आज फिर वही रणनीति इजरायल की तरफ से दोहराई जा रही है। लेकिन इस बार सवाल यह है कि क्या इजरायल का यह कब्जा स्थायी होगा? या उसका ये कदम अमेरिका-ईरान वार्ता में सौदेबाजी का हथियार बनेगा

येलो लाइन का जन्म और युद्धविराम का मजाक

मध्य पूर्व में एक बार फिर सीमाओं की लकीरें स्याही से नहीं, बल्कि टैंकों के टायरों और सैन्य चौकियों से खींची जा रही हैं। इजरायल द्वारा दक्षिणी लेबनान में बनाई गई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) ने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों और सैन्य विश्लेषकों को चौंका दिया है। यह सिर्फ एक सैन्य घेराबंदी नहीं है, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक चाल है जो दशकों पुराने विवादों को नया रंग दे रही है।

दरअसल, अमेरिका की मध्यस्थता में 16 अप्रैल 2026 को इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिन का युद्धविराम शुरू हुआ है। करीब 46 दिन के इजरायली हमलों और जमीनी ऑपरेशन के बाद यह समझौता हुआ। लेकिन कुछ घंटों में ही IDF ने दक्षिणी लेबनान में ‘येलो लाइन’ की घोषणा कर दी।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कहा, “हम लेबनान में 10 किलोमीटर गहरी मजबूत सुरक्षा पट्टी में रहेंगे। यह पहले से कहीं ज्यादा ठोस, निरंतर और मजबूत है। हम यहाँ से नहीं जाएँगे।”

IDF के बयान में कहा गया कि लाइन के दक्षिण में पाँच डिवीजनों के सैनिक हिजबुल्लाह के आतंकी ढाँचे को तोड़ रहे हैं। जिसकी वजह से 55 लेबनानी गाँवों और कस्बों में निवासियों को वापस लौटने की इजाजत नहीं दी गई।

अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, युद्धविराम शुरू होते ही इजरायली सेना ने हनीन गाँव में घर उड़ाए, बेत लिफ, अल-कांतारा और तौल पर तोपें दागीं। बुलडोजर से जमीन साफ की जा रही है। गाजा में इसी येलो लाइन मॉडल का इस्तेमाल हो रहा है, जहाँ का 60 प्रतिशत इलाका इजरायली नियंत्रण में है और सैकड़ों घर ध्वस्त किए गए। अब लेबनान में भी वही रणनीति दोहराई जा रही है।

हिजबुल्लाह के महासचिव नईम कासिम ने कहा, “युद्धविराम एकतरफा नहीं हो सकता। अगर इजरायल उल्लंघन करेगा तो हम जवाब देंगे। हमारे लड़ाके मैदान में हैं, ट्रिगर पर उँगली रखे हुए।” हिजबुल्लाह इसे देश का अपमान मान रहा है और पूर्ण वापसी की माँग कर रहा है।

इजरायल ने कब कब बदला मिडिल ईस्ट का नक्शा?

इजरायल का विस्तारवाद नया नहीं है। साल 1918 में डेविड बेन-गुरियन और यित्जाक बेन-ज्वी ने ‘एरेट्स यिसराइल’ किताब में लिखा कि यहूदियों का देश लिटानी नदी तक फैला होना चाहिए। इसके बाद 1919 में वर्ल्ड जियोनिस्ट ऑर्गनाइजेशन ने पेरिस शांति सम्मेलन में लिटानी नदी को उत्तरी सीमा बताते हुए नक्शा पेश किया गया।

इजरायल की आजादी के बाद साल 1948 के अरब-इजरायल युद्ध में इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान के 15 गाँवों पर कब्जा कर लिया। हालाँकि बाद में साल 1949 में आर्मिस्टिस समझौते के तहत इसमें से सात गाँवों को इजरायल को सौंप दिए गए।

इसके बाद साल 1978 में ऑपरेशन लिटानी के तहत इजरायल ने दक्षिणी लेबनान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वो साल 1982 में ऑपरेशन पीस फॉर गैलिली में बेरूत तक पहुँच गए। और फिर करीब 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर इजरायल का कब्जा बना रहा। हालाँकि साल 2000 में यूनिफिल और हिजबुल्लाह के दबाव में इजरायल ने वहाँ से वापसी की, लेकिन शेबा फार्म्स पर कब्जा आज भी जारी है।

वहीं साल 1967 के छह दिन युद्ध में गोलान हाइट्स (सीरिया) पर कब्जा कर लिया, जिसे साल 1981 में इजरायल ने अपने आप में मिला लिया। यही नहीं, वेस्ट बैंक और गाजा पर उसका साल 1967 से ही कब्जा है। और अब 2026 में लेबनान में फिर वही पैटर्न दिख रहा है, जिसमें पहले सुरक्षा जोन, फिर स्थायी नियंत्रण।

इजरायल का तर्क हमेशा ‘सुरक्षा’ रहा है। लेकिन आलोचक इसे ‘ग्रेटर इजरायल’ का हिस्सा मानते हैं, जिसमें लिटानी नदी, गोलान और वेस्ट बैंक शामिल हैं। अभी 2026 के जमीनी ऑपरेशन में इजरायल ने पहले ही दक्षिणी लेबनान के कई इलाकों में बफर जोन बना लिया था। जिसे अब येलो लाइन संस्थागत रूप दे रही है।

क्या यह स्थाई कब्जा है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

विश्लेषकों का मानना है कि यह कब्जा अस्थायी नहीं होगा। चूँकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू साफ कह चुके हैं कि इजरायली सेना ‘क्लियर और सिक्योर’ पोजीशंस को छोड़ने वाली नहीं है। इसके साथ ही गाजा मॉडल की तरह लेबनान में भी सफाई अभियान जोर-शोर से चल रहा है, जिसकी वजह से लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं।

हालाँकि दक्षिणी लेबनान का यह इलाका (जिसपर अभी इजरायली सेना मौजूद) भविष्य की बातचीत (ईरान या लेबनान के साथ) में ‘लीवरेज’ (दबाव का हथियार) बन सकता है, इसमें कोई शक नहीं है।

दरअसल, इस इलाके का और खासकर हिज्बुल्लाह का ईरान से जुड़ाव और गहरा है। ईरान ने स्पष्ट किया कि लेबनान में युद्धविराम अमेरिका-ईरान वार्ता का पूर्व शर्त है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में चल रही बातचीत में ईरान ने कहा कि जब तक इजरायल लेबनान से नहीं हटेगा, कोई समझौता नहीं होगा। ईरान के इस स्टैंड के बाद ही इजरायल-लेबनान में संघर्ष विराम हुआ, लेकिन अब जब ईरान बातचीत की टेबल पर आएगा तो उसके बाद सिर्फ हॉर्मूज ही नहीं दक्षिणी लेबनान का हिस्सा भी जोर-आजमाइश के लिए मौजूद रहेगा।

इस बीच, हिजबुल्लाह ने चेतावनी दी है कि अगर इजरायल नहीं हटा तो वे जवाब देंगे। लेबनानी सेना और सरकार भी संप्रभुता की बात कर रही है। यूएनएफआईएल (UNIFIL) पहले से ही रेजोल्यूशन 1701 का हवाला दे रही है, जिसमें इजरायल को ब्लू लाइन के दक्षिण में रहना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलेगी या मिलेगी हमेशा की तरह निंदा?

इतिहास गवाह है कि संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के कब्जों को कभी मान्यता नहीं दी है। गोलान हाइट्स पर 1981 के एनेक्सेशन को यूएन ने अवैध घोषित किया। वेस्ट बैंक पर बस्तियों को भी वो अवैध कहता है। लेबनान भी रेजोल्यूशन 1701 (2006) के तहत इजरायल से पूर्ण वापसी की माँग करता रहा है। तो यूएन एक्सपर्ट्स ने इजरायल के बमबारी को ‘एथनिक क्लिंजिंग’ और ‘डोमिसाइड’ (घरों का विनाश) बताया है।

लेकिन व्यावहारिक रूप से देखें तो यूएन की ताकत बहुत सीमित है। यूएन में इजरायल के लिए उठ रही किसी भी समस्या पर अमेरिका तुरंत वीटो कर देता है। ऐसे में साल 2026 में भी यूएन सुरक्षा परिषद में इजरायल के खिलाफ प्रस्ताव तो आ सकते हैं, लेकिन कुछ भी लागू होना मुश्किल है। हालाँकि फ्रांस, कनाडा और यूरोपीय देशों ने ‘येलो लाइन’ की निंदा की है, लेकिन इजरायल ‘आत्मरक्षा’ का हवाला देकर कार्रवाई जारी रखे हुए है। ऐसे में अगर यूएन कोई निंदा प्रस्ताव लाता भी है, तो भी इजरायल पर कोई खास फर्क पड़ेगा, ये अभी तो नहीं देखा जा रहा।

भविष्य में होगी शांति या खुलेगा वॉर का नया फ्रंट?

अगर पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान की बातचीत सफल हुई तो लेबनान से इजरायली वापसी हो सकती है। हालाँकि विश्लेषकों का कहना है कि इजरायल न सिर्फ लेबनान बल्कि सीरिया में भी क्षेत्रीय विस्तार की रणनीति अपना रहा है। क्योंकि भविष्य की किसी भी बातचीत में यह जमीन ‘लीवरेज’ बनेगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि जबरन कब्जा भी ज्यादा समय तक टिकता नहीं है।

चूँकि इजरायल पहले भी 18 साल के कब्जे के बाद साल 2000 में दक्षिणी लेबनान से हटा था, ऐसे में किसी समझौते और स्थाई सुरक्षा गारंटी के नाम पर वो फिर से अपने कदम वापस खींच भी सकता है। बशर्ते उस पर अमेरिकी दबाव बना रहे।

क्या हो सकती हैं संभावनाएँ?

फिलहाल, इस मामले में अभी दो ही संभावित रास्ते दिखते हैं-

रास्ता A (बड़ा समझौता): अगर अमेरिका ईरान को कुछ बड़ी आर्थिक राहत देता है और बदले में ईरान हिजबुल्लाह को सीमा से पीछे हटने के लिए मना लेता है, तो एक ‘अस्थाई डील’ हो सकती है। इसमें ‘येलो लाइन’ को हटाकर वहाँ लेबनानी सेना या एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय फोर्स को तैनात किया जा सकता है।

रास्ता B (लंबा संघर्ष): यह ज्यादा संभव लग रहा है। इजरायल जिस तरह से 55 गाँवों को खाली कराकर वहाँ बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर रहा है, उससे लगता है कि वह वहाँ ‘स्थाई सुरक्षा चौकियाँ’ बनाना चाहता है। अगर ऐसा हुआ, तो हिजबुल्लाह इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर गुरिल्ला वॉर शुरू करेगा, जिससे यह संघर्ष महीनों या सालों तक खिंच सकता है।

लेबनान में इजरायल की सैन्य उपस्थिति ने यह साफ कर दिया है कि पुरानी सीमाएँ अब सिर्फ कागज पर रह गई हैं। यह कब्जा न केवल लेबनान की भौगोलिक स्थिति को बदल रहा है, बल्कि यह ईरान और अमेरिका के बीच होने वाले ‘ग्रैंड बार्गेन’ का भविष्य भी तय करेगा।

बहरहाल, दशकों से युद्ध का मैदान बन चुका मिडिल ईस्ट अब भी दहक रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर यह ‘ग्रेटर इजरायल’ vs ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ (ईरान-हिजबुल्लाह-हमास) की जंग है। इन सबके बीच हकीकत यही है कि मिडिल ईस्ट का नक्शा सचमुच बदल रहा है। ऐसे में इजरायल का यह ताजा विस्तार स्थाई होता है या अस्थाई, ये देखने वाली बात होगी, क्योंकि इसका फौरी जवाब किसी के पास नहीं है। चूँकि अब पूरा मामला सौदेबाजी, समय और कूटनीतिक चालों में उलझ चुका है, ऐसे में इस समस्या को लेकर आगे क्या बदलाव आते हैं, इस पर नजर बनाए रखने की जरूरत होगी।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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