Friday, May 14, 2021
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मदरसा-मौलवी, सऊदी शेखों की फंडिंग, ISI की कठपुतली: मोदी विरोधी हिफाजत-ए-इस्लाम के बारे में जानें सब कुछ

हिफाजत-ए-इस्लाम का कहना है कि संविधान में सर्वेसर्वा अल्लाह को माना जाए और जो कोई भी इस्लाम को बदनाम करे उसके ख़िलाफ़ मौत की सजा का प्रावधान हो। इस्लामी शिक्षा को अनिवार्य करने, अहमदियों को गैर मुस्लिम करार देने और स्कूलों में मूर्तियों पर पाबंदी की माँग वह करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश पहुँचने से पहले ही बांग्लादेशी कट्टरपंथियों ने दौरे का विरोध शुरू कर दिया था। वामपंथी भी इसमें उनके साथ थे। उनके दौरे के दौरान भी हिंसा हुई। उनके भारत लौटने के बाद भी बांग्लादेश से हिंसा की खबरें आ रही हैं।

शुक्रवार (26 मार्च 2021) को मोदी बांग्लादेश पहुँचे थे। उस दिन जुमे की नमाज के बाद कट्टरपंथियों ने जमकर हिंसा और आगजनी की थी। इस दौरान हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा था, जिसमें चार की मौत हो गई थी। शनिवार को पूरे बांग्लादेश में फेसबुक बंद होने की खबरें मीडिया में आती रहीं।

बांग्लादेश में मचे बवाल के पीछे जिस एक कट्टरपंथी संगठन का नाम प्रमुखता से आ रहा है वह है, हिफाजत-ए-इस्लाम। मोदी की यात्रा के विरोध में शुक्रवार को हिंसा-आगजनी में भी वह शामिल था। शनिवार को चटगाँव से ढाका तक मार्च निकाला। रविवार को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का ऐलान किया था। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के इशारे पर काम करने वाले इस कट्टरपंथी संगठन को अपनी गतिविधि जारी रखने के लिए सऊदी अरब से काफी फंडिंग मिलती है।

हिफाजत ए इस्लाम के लोग मोदी विरोध में एकत्रित (साभार: अलजजीरा)

2010 में इस कट्टरपंथी इस्लामी संगठन को बनाया गया था। इसे बनाने में बांग्लादेश के मदरसों के उलेमा और छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस संगठन को ISI का पूरा समर्थन है।

बांग्लादेश में मोदी विरोध में एकत्रित हिफाजत ए इस्लाम के लोग (साभार: अलजजीरा)

द इकोनॉमिस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, ISI के अलावा हिफाजत-ए-इस्लाम को फाइनेंसिंग का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब के कट्टरपंथी शेखों के जरिए प्राप्त होता है। इस संगठन की प्रमुख माँग है कि बांग्लादेश को इस्लामी देश करार दिया जाए।

हिफाजत-ए-इस्लाम की स्थापना में हतज़ारी मदरसा के पूर्व डॉयरेक्टर अहमद शफी, वर्तमान अमीर ए हिफाजत अल्लामा जुनैद बाबुनगरी और इस्लामिक पार्टी इस्लामी ओइक्या जोते के चेयरमैन मुफ्ती इजहारुल इस्लाम प्रमुख नाम हैं। इनके अलावा पहली महिला क्वामी मरदसे की संस्थापक और प्रिंसपल अब्दुल मालेक हलीम भी इस संगठन के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं।

इस संगठन पर आरोप लगते रहे हैं कि इनका संबंध जमात-ए-इस्लामी और तालिबान जैसे आतंकी संगठनों से हैं। हालाँकि, हिफाजत इन आरोपों को खारिज करता रहा है। 7 अक्टूबर 2013 में इस संगठन के एक नेता द्वारा संचालित किए जा रहे मदरसे में विस्फोट हुआ था। छापेमारी में विस्फोटक बरामद हुए थे। लेकिन मदरसा प्रशासन का दावा था कि कम्प्यूटर का यूपीएस फटा था। 

ग्रीक देवी की मूर्ति

साल 2017 में इसी संगठन ने ग्रीक देवी की मूर्ति बांग्लादेश के सर्वोच्च न्यायालय में देख प्रदर्शन किया था। संगठन का कहना था कि बांग्लादेश में इस्लाम को कमजोर करने के लिए ये एक साजिश है। बाद में वह मूर्ति न्यायालय से हटानी पड़ी थी।

बता दें कि हिफाजत-ए-इस्लाम हमेशा से बांग्लादेश को इस्लामी देश बनाने की पैरवी करता रहा है। साल 2016 में जब सुप्रीम कोर्ट ने बांग्लादेश संविधान से इस्लाम शब्द हटाने की याचिका को स्वीकार किया था, तो इसका विरोध करते हुए धमकियाँ दी थीं। हिफाजत ने कहा था कि देश का राष्ट्र धर्म यदि इस्लाम होगा तो इससे अल्पसंख्यकों के धर्म पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

इसके अलावा इस संगठन के तमाम प्रमुख नेताओं पर हत्या, तोड़फोड़, आगजनी जैसे गंभीर आरोप हैं। इस संगठन का कहना है कि संविधान में सर्वेसर्वा अल्लाह को माना जाए और जो कोई भी इस्लाम को बदनाम करे उसके ख़िलाफ़ मौत की सजा का प्रावधान हो। इसके अलावा नास्तिकों और गैर इस्लामी लोगों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई हो। इस्लामी शिक्षा को अनिवार्य करने, अहमदियों को गैर मुस्लिम करार देने और स्कूलों में मूर्तियों पर पाबंदी की माँग वह करता है। साथ ही हर उलेमा और मदरसा छात्र को हर इल्जाम से बाइज्जत बरी करने की भी माँग कर रहा है।

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