पाकिस्तान में नवनिर्मित चीफ ऑफ डिफेन्स फोर्सेज (CDF) पद को लेकर संवैधानिक संकट और राजनीतिक अविश्वास तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे की जड़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा फील्ड मार्शल असीम मुनीर की CDF पद के लिए अनिवार्य नियुक्ति नोटिफिकेशन पर हस्ताक्षर न करना है, जिससे शीर्ष सैन्य नेतृत्व की नई नियुक्ति सवालों के घेरे में आ गए है।
नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड के पूर्व सदस्य तिलक देवेशर के अनुसार, पीएम शरीफ जानबूझकर देश से बाहर हैं ताकि वे उन्हें इस नियुक्ति आदेश पर हस्ताक्षर न करें। ANI से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री पहले बहरीन गए और फिर लंदन पहुंच गए जिससे इस अंदेशे को और बल मिला कि वो फैसले से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
पाकिस्तान की मीडिया ने दावा किया है कि शनिवार को पाकिस्तान लौटने वाले शरीफ ने लंदन में मेडिकल जाँच के बाद ब्रिटेन का अपना दौरा बढ़ा लिया है। पाक मीडिया के मुताबिक, पहले उनका चार दिवसीय निजी दौरा रविवार को पूरा करके पाकिस्तान लौटने का कार्यक्रम था लेकिन अब वे सोमवार दोपहर लंदन से इस्लामाबाद के लिए रवाना होंगे।
29 नवंबर को मुनीर का तीन वर्षीय कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नए पद के तहत पाँच वर्ष की मियाद तय करने के लिए आधिकारिक नोटिफिकेशन की जरूरत थी। इस बीच फौज के भीतर भी शीर्ष पदों को लेकर खींचतान की खबरें आ रही हैं।
रक्षा मंत्री ने किया सब सही होने का दावा
हालाँकि, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने फौज और सरकार के बीच समन्वय होने के संकेत दिए हैं। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि रक्षा बलों के CDF की नियुक्ति संबंधी अधिसूचना उचित समय पर जारी की जाएगी और इसके लिए प्रक्रिया शुरू हो गई है। आसिफ ने कहा, “प्रक्रिया शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री जल्द ही लौट रहे हैं। अधिसूचना उचित समय पर जारी की जाएगी।”
There is unnecessary and irresponsible speculation about CDF notification. Please be informed that the process has been initiated. PM is returning shortly. Notification will be issued in due course of time. No room for any conjecturing. Period!
— Khawaja M. Asif (@KhawajaMAsif) November 30, 2025
पाकिस्तान में संवैधानिक संकट
29 नवंबर की अहम समय-सीमा निकल चुकी है लेकिन पाकिस्तान सरकार अब तक देश के पहले (CDF) की नियुक्ति का नोटिफिकेशन जारी नहीं कर सकी है। यह वही नई दोहरी जिम्मेदारी वाला पद है, जिसे 27वें संविधान संशोधन के तहत बनाया गया था और जिसके साथ ही चेयरमैन ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (CJCSC) का पद 27 नवंबर को खत्म हो गया था।
माना जा रहा था कि CJCSC पद की समाप्ति के साथ ही CDF का नोटिफिकेशन जारी हो जाएगा। इसलिए क्योंकि 29 नवंबर ही वह तारीख थी जब माना जा रहा था कि फील्ड मार्शल मुनीर के आर्मी चीफ के कार्यकाल के तीन साल पूरे हो रहे हैं। इसी वजह से कानूनी हलकों में यह बहस उठी कि अगर नया आदेश नहीं आया, तो क्या उनकी मौजूदा जिम्मेदारी खत्म मानी जा सकती है?
2024 में पाकिस्तान आर्मी एक्ट में किए गए बदलाव ने फौज के प्रमुखों का कार्यकाल तीन साल से बढ़ाकर पाँच साल कर दिया। कानून में जो क्लॉज जोड़ा गया था उसमें यह माना गया कि यह संशोधन हमेशा से ही कानून का हिस्सा माना जाएगा। यानि कई कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, कार्यकाल जारी रखने के लिए सरकार के किसी नए नोटिफिकेशन की जरूरत नहीं थी।
हालाँकि, यह बात लगभग तय मानी जा रही है कि CDF एक नया पद है और इसकी नियुक्ति बिना सरकारी नोटिफिकेशन के संभव नहीं। कानून के मुताबिक अब पाँच साल तक फौज के प्रमुख और CDF दोनों भूमिकाएँ एक ही व्यक्ति निभाएगा। यानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को औपचारिक रूप से नया आदेश जारी कर CDF नामित करना होगा।
अब इस पर सरकारी चुप्पी को राजनीतिक असहमति के रूप में देखा जा रहा है। चर्चा में बताया जा रहा है कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि CDF/COAS के पाँच साल का कार्यकाल किस तारीख से गिना जाए। नवंबर 2022 यानी जब आसिम मुनीर ने कमान संभाली या नवंबर 2025 जिसे इस नए कानून के बाद की तारीख से जोड़ा जा रहा है।
CJCSC पद हटने के बाद अब नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड के नए प्रमुख की नियुक्ति भी लंबित है। यह परमाणु नियंत्रण-संबंधी जिम्मेदारी संभालेगा जो पहले CJCSC के पास मौजूद थी। अब माना जा रहा है कि यह नियुक्ति शायद तभी होगी जब CDF का नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा।
वहीं, नेशनल कमांड अथॉरिटी (NCA) कानून में भी बदलाव जरूरी है ताकि नए ढाँचे में CDF और NSC कमांडर की स्थिति स्पष्ट हो सके। बड़ा सवाल यह भी है कि आगे वायुसेना और नौसेना प्रमुखों को NCA में कितनी भूमिका मिलेगी और क्या रणनीतिक कमान उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाएगी।
फौज के भीतर ही बढ़ेगा बवाल
अगर यह नोटिफिकेशन आता है तो CDF की भूमिका सँभालने के बाद फील्ड मार्शल मुनीर सभी सर्विस ब्रांच को सीधे उनके कमांड में रखेंगे। इसका सीधा अर्थ है कि पूरे मिलिट्री स्ट्रक्चर पर आर्मी का पूरा दबदबा होगा। इस बात की पूरी संभावना है कि इसके बाद फौज के भीतर ही गुस्सा बढ़े या कई सर्विस के बीच दुश्मनी सामने आए। यह बदलाव टॉप मिलिट्री लीडर्स को खास अधिकार और सुरक्षा देकर डेमोक्रेटिक जवाबदेही को भी कमजोर कर रहा है।


