तेलंगाना के मोहम्मद निजामुद्दीन की अमेरिका में पुलिस ने गोली मारकर हत्या कर दी। हत्या की वजह यह बताई जा रही है कि निजामुद्दीन का अपने ही रूममेट से विवाद चल रहा था। इस मामले में जब पुलिस वहाँ पहुँची, तो निजामुद्दीन के हाथों में चाकू देखा और रूममेट को चोटें भी आई थी। इस कड़ी में पुलिस ने ‘सेल्फ डिफेंस’ में 30 वर्षीय मोहम्मद निजामुद्दीन को गोली मार दी।
हालाँकि, मोहम्मद निजामुद्दीन के परिवार का कहना है कि यह घटना एक मामूली झगड़े का नतीजा नहीं, बल्कि नस्लीय भेदभाव का मामला है। परिवार ने इस मामले में विदेश मंत्री एस जयशंकर से दखल की गुहार लगाई है और जाँच की माँग की है।
घटना का संदर्भ और परिवार का आरोप
जानकारी के अनुसार, मोहम्मद निजामुद्दीन ने अमेरिका में कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री हासिल की थी। मोहम्मद निजामुद्दीन का अपने रूममेट के साथ 3 सितंबर 2025 को एक झगड़ा हुआ था। इस झगड़े में अमेरिकी पुलिस मौके पर पहुँचती हैं और मोहम्मद निजामुद्दीन के हाथों में चाकू देखती है। इसके बाद पुलिस सेल्फ-डिफेंस में गोली चला देती है। पुलिस ने बताया कि विवाद में निजामुद्दीन के रूममेट को काफी चोटें आई थी।
लेकिन निजामुद्दीन के पिता मोहम्मद हसनुद्दीन का कहना है कि उनके बेटे ने ही पुलिस को फोन किया था और मदद की माँग की थी, फिर भी अमेरिकी पुलिस ने उसे ही गोली मारी। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि मोहम्मद निजामुद्दीन की मौत में नस्लीय भेदभाव का एंगल था।
परिवार का कहना था कि उनके बेटे मोहम्मद निजामुद्दीन को श्वेत वर्चस्व (व्हाइट सुप्रीमेसी) की मानसिकता के काफी समय से परेशान किया जा रहा था। निजामुद्दीन का परिवार इस मौत मामले में जाँच की माँग कर रहा है। उनका कहना है कि पुलिस की प्रतिक्रिया में गंभीर लापरवाही थी और उनके बेटे को न्याय मिलना चाहिए।
नस्लीय भेदभाव का मुद्दा
वहीं, मोहम्मद निजामुद्दीन ने मौत से कुछ समय पहले ही सोशल मीडिया पर नस्लीय भेदभाव को लेकर पोस्ट करना शुरू कर चुका था। निजामुद्दीन ने लिखा था कि उसे नस्लीय उत्पीड़न और नौकरी से गलत तरीके से निकाले जाने का सामना करना पड़ा था।

निजामुद्दीन का कहना था, “अब और नहीं, व्हाइट सुप्रीमेसी और नस्लीय मानसिकता को समाप्त करना होगा।” क्या यह सिर्फ अमेरिकी पुलिस ने सेल्फ-डिफेंस में गोली चलाई थी या फिर यह एक श्वेत वर्चस्व की मानसिकता का परिणाम था?
निजामुद्दीन के परिवार ने भारत सरकार से मदद की अपील की है। उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर को पत्र लिखकर अपने बेटे का शव महबूबनगर लाने की गुहार लगाई है। साथ ही, उन्होंने इस मामले की गहन जाँच की भी माँग की है, ताकि यह पता चल सके कि क्या यह नस्लीय भेदभाव का मामला था और पुलिस की कार्रवाई सही थी या नहीं।
अमेरिका में भारतीयों की हत्या
अमेरिका में नस्लीय भेदभाव का इतिहास बहुत पुराना है, जो आज भी जारी है। चाहे वह अमेरिकी पुलिस द्वारा तेलंगाना के एक युवक की हत्या हो या लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भारतीय छात्रों के साथ भेदभाव, ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि रंग और पहचान के आधार पर होने वाला उत्पीड़न आज भी जारी है।
हाल ही में, 10 सितंबर 2025 को अमेरिका के टेक्सास में कर्नाटक के भारतीय मूल के चंद्र मौली ‘बॉब’ नागमल्लैया की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस घटना में, 53 वर्षीय नागमल्लैया की उनके ही सहकर्मी, योडार्निस कोबोस-मार्टिनेज ने गला काटकर हत्या कर दी। यह हत्या सिर्फ एक मामूली विवाद का नतीजा नहीं लगती, बल्कि इसके पीछे नस्लीय पूर्वाग्रहों का गहरा हाथ हो सकता है। यह बात तब और भी गंभीर हो जाती है जब नागमल्लैया के परिवार के सामने ही उनका सिर धड़ से अलग कर दिया गया और फिर उसे कूड़ेदान में डाल दिया गया। इस तरह की क्रूरता सामान्य अपराधों में कम ही देखने को मिलती है। इस घटना पर अमेरिकी मीडिया भी चुप था, क्योंकि यह नस्लीय मामला था।
इसके अलावा, अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में हरियाणा के जींद जिले के 26 वर्षीय कपिल की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना 6 सितंबर 2025 की रात को हुई, जब कपिल ने एक अमेरिकी मूल के व्यक्ति को खुले में पेशाब करने से रोका। इस बात पर दोनों के बीच तीखी बहस हुई, जिसके बाद अमेरिकी व्यक्ति ने अपनी पिस्तौल निकालकर कपिल पर गोलियाँ चला दीं।
इसके अलावा, लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स (LSE) में करण कटारिया के साथ भी ऐसा ही नस्लीय भेदभाव हुआ है। करण कटारिया ने बताया कि वह LSE में एक छात्र चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन उन्हें सिर्फ़ उनके भारतीय और हिंदू होने के कारण निशाना बनाया गया। उन पर होमोफोबिक और इस्लामोफोबिक जैसे झूठे आरोप लगाकर उन्हें चुनाव से अयोग्य घोषित कर दिया गया। करण का कहना था कि उन्होंने हमेशा सामाजिक सद्भाव की बात की है, लेकिन उनके खिलाफ नफरती अभियान चलाया गया।


