UN वॉच की एक रिपोर्ट ने आतंकवाद-रोधी मामलों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर बेन सॉल पर वैचारिक पक्षपात और हितों के टकराव के आरोप लगाए हैं। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि सॉल को चीनी सरकार से फंडिंग मिल रही है।
स्काई न्यूज के अनुसार, जिनेवा स्थित इस समूह की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सॉल में पश्चिम-विरोधी और इजरायल-विरोधी पक्षपात है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सॉल ने अफगानिस्तान में आतंकवादी संगठन अल-कायदा के वरिष्ठ सदस्य और आतंकवादी नेता अयमान मोहम्मद रबी अल-जवाहिरी की हत्या की निंदा की थी।
यूएन वॉच के कार्यकारी निदेशक हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से बात करते हुए कहा, “उन्हें एक कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) नहीं होना चाहिए, उन्हें एक अकादमिक होना चाहिए। हमें विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण देखने को मिलना चाहिए।”
नोयर ने कहा “संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ को सबसे पहले हमास के आतंकवादियों का विरोध करना चाहिए, ईरान के इस्लामी शासन का विरोध करना चाहिए, लेकिन बेन सॉल ईरान के इस्लामी शासन और उसके आतंकवादी सहयोगियों की बातों को दोहराते हुए दिखाई देते हैं।”
“U.N. special rapporteur Ben Saul claims to be an ‘independent’ expert. But how can you be independent while receiving $150,000 from China? He gives a free pass to Beijing — and instead attacks America, the West, and Israel.”
— UN Watch (@UNWatch) June 24, 2026
— Hillel Neuer on @SkyNewsAust with @carolinemarcus pic.twitter.com/1h3ZKMjlIm
रिपोर्ट का हवाला देते हुए नोयर ने कहा कि सॉल को चीनी कम्युनिस्ट शासन से 1,50,000 डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने यह भी कहा कि सॉल ने रिपोर्ट की सामग्री का कोई खंडन नहीं किया है। नोयर ने कई ऐसे संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों का नाम लिया, जिनके कार्यालयों को चीन से फंडिंग मिली है।
हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से कहा, “वह खुद को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ बताते हैं। वह सिडनी में कानून के प्रोफेसर हैं और खुद को स्वतंत्र विशेषज्ञ कहते हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि जब उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से 1,50,000 डॉलर मिल रहे हैं, तो वह स्वतंत्र विशेषज्ञ कैसे हो सकते हैं? मैं स्पष्ट कर दूँ। कोई यह नहीं कह रहा कि यह पैसा उनकी निजी जेब में जा रहा है ताकि वह कोई फेरारी खरीद सकें, लेकिन यह उनके कार्यालय को जा रहा है। वही कार्यालय जिसने कभी भी चीन द्वारा आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के नाम पर दस लाख उइगरों को शिविरों में रखने की निंदा नहीं की, जबकि यही वह विषय है जिसके वह विशेषज्ञ होने का दावा करते हैं।”
उन्होंने कहा कि जबरदस्ती के उपायों (कोअर्सिव मेजर्स) पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष रैपोर्टियर एलेना दोहान के कार्यालय को रूस, चीन और कतर से 13 लाख डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के एक अन्य विशेषज्ञ जॉर्ज कैट्रूगालोस का भी नाम लिया, जो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के कार्यालय के अध्यक्ष हैं।
नोयर ने कहा कि उनके कार्यालय को चीन से 1,00,000 डॉलर मिले थे, उसी वर्ष जब उन्होंने एथेंस में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पुस्तक के प्रचार के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया था।
UN वॉच ने संयुक्त राष्ट्र के कई विशेषज्ञों द्वारा चीन, कतर, रूस जैसे देशों से संदिग्ध फंडिंग प्राप्त करने और मानवाधिकारों के नाम पर विशेष वैचारिक हितों को बढ़ावा देने के कई मामलों को चिन्हित किया है। संगठन का आरोप है कि ये विशेषज्ञ आतंकवादी घटनाओं और इस्लामी आतंकवाद के पीड़ितों की स्थिति की अनदेखी करते हैं।
बेन सॉल समेत UN रिपोर्टर्स ने पहलगाम हमले पर भारत को घेरा
गौरतलब है कि सॉल उन आठ संयुक्त राष्ट्र विशेष रैपोर्टियरों में शामिल थे, जिन्होंने पहलगाम हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय अधिकारियों द्वारा अपनाए गए आतंकवाद-रोधी उपायों को लेकर मानवाधिकार उल्लंघनों पर चिंता व्यक्त करते हुए एक संयुक्त प्रेस बयान जारी किया था।
ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि संयुक्त राष्ट्र के इस विशेष विशेषज्ञ ने आतंकवादी हमले की निंदा तो की थी, लेकिन भारत के आतंकवाद-रोधी अभियानों को, जिनमें अस्थायी मीडिया प्रतिबंध, इंटरनेट सेवाओं का निलंबन और 8000 सोशल मीडिया खातों को ब्लॉक करना शामिल था, असंगत (डिसप्रोपोर्शनेट) और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का उल्लंघन बताया था।

भारत की आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों को सामूहिक दंड (कलेक्टिव पनिशमेंट) बताते हुए संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने दावा किया कि अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकवादियों से जुड़े परिवारों के घरों, व्यवसायों और संपत्तियों को बिना किसी न्यायालयी आदेश या विधिक प्रक्रिया के मनमाने ढंग से ध्वस्त कर दिया।
UN वॉच की रिपोर्ट के बाद यह समझना आसान हो जाता है कि बेन सॉल, जिनसे आतंकवादी कृत्यों की निंदा करने की अपेक्षा की जाती है, पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत की कार्रवाई की आलोचना क्यों कर रहे थे।
किसी तरह संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमण विरोधी अभियानों को भी पहलगाम हमले के बाद देशभर में चलाए गए कार्रवाई अभियान से जोड़ दिया। उनका तर्क था कि आतंकवाद से असंबंधित मुसलमानों को केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि उनका धर्म पहलगाम हमले के आरोपियों जैसा है।
जबकि असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई लंबे समय से चल रही है, जिनमें मुख्य रूप से सरकारी जमीन पर कब्जा कर मजार या दरगाह बनाने वाले इस्लामवादी तत्वों तथा अवैध रूप से भूमि पर कब्जा करने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या शामिल हैं। ये अतिक्रमण-रोधी अभियान एक वर्ष से भी अधिक समय से जारी हैं।
हालाँकि इनका पहलगाम हमले से कोई संबंध नहीं था। गुजरात में पहलगाम हमले के कुछ दिनों बाद जो एकमात्र ध्वस्तीकरण अभियान चला, वह सरकार द्वारा चंडोला झील और उसके आसपास बने अवैध ढाँचों को हटाने के लिए था, जिसे अवैध बांग्लादेशियों का केंद्र माना जाता है। यह कार्रवाई भी गुजरात हाई कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद की गई थी।
इसके अलावा, यह दावा भी गलत बताया गया कि ‘निर्दोष कश्मीरी नागरिकों’ के घर गिराए गए। अधिकारियों ने घरों को ध्वस्त किया था, लेकिन वे निर्दोष नागरिकों के नहीं थे।
अधिकारियों ने केवल प्रमाणित आतंकवादियों के घरों को ही गिराया। सुरक्षा बलों ने विस्फोटकों का इस्तेमाल कर आतंकवादी शाहिद अहमद कुट्टे के शोपियाँ स्थित घर, कुलगाम में सक्रिय जिहादी जाकिर के घर, पुलवामा के मुरन में एहसान-उल-हक शेख के घर, जो 2018 में पाकिस्तान गया था और इसी वर्ष घाटी में घुसपैठ कर लौटा था, फारूक तीवड़ा के घर, जो 1990 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान चला गया था और कभी वापस नहीं लौटा, तथा लश्कर-ए-तैयबा के जिहादियों आदिल हुसैन ठोकर (बीजबेहड़ा, अनंतनाग) और आसिफ शेख (त्राल, पुलवामा) के घरों को ध्वस्त किया। लेख के अनुसार, इनमें से कोई भी व्यक्ति निर्दोष या शांतिप्रिय नागरिक नहीं था।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


