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ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत विरोधी प्रोपेगेंडा कर रहा था वाशिंगटन पोस्ट, भारतीय मीडिया को बदनाम करने के चक्कर में खुद हो गया एक्सपोज: अब स्वीकारी गलती, लेख में भी किया बदलाव

वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय चैनलों ने फर्जी वीडियो और अपनी जीत के बयान बढ़ा-चढ़ाकर चलाए। अब वो खुद एक्सपोज हो चुका है।

ऑपरेशन सिंदूर की कवरेज पश्चिमी मीडिया के लिए किसी उत्सव से कम नहीं थी, मानो क्रिसमस से पहले ही उन्हें भारत पर लगातार हमला करने का मौका मिल गया हो। हालाँकि, ऐसा करते हुए वे खुद भी गलत सूचना और फर्जी खबरें फैलाने लगे। 

द वाशिंगटन पोस्ट (WaPo) ने भारतीय मीडिया पर युद्धकाल में गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया, लेकिन इसी कोशिश में वो खुद वही गलती कर बैठा। उसने भी संदिग्ध स्रोतों पर भरोसा किया, स्थानीय भाषा का गलत अनुवाद किया और बिना पुष्टि के जानकारी प्रकाशित की।

एक सुधार जो मूल कहानी से कहीं अधिक कहता है

वॉशिंगटन पोस्ट ने 4 जून 2025 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक ‘How misinformation overtook Indian newsrooms amid conflict with Pakistan’ था। यह रिपोर्ट पत्रकार करिश्मा मेहरोत्रा ने लिखी थी। इसमें भारतीय मीडिया, खासकर टीवी न्यूज चैनलों पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के समय झूठी खबरें और नाटकीय दावे दिखाए। रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय चैनलों ने फर्जी वीडियो और अपनी जीत के बयान बढ़ा-चढ़ाकर चलाए।

लेकिन अब उसी रिपोर्ट में वॉशिंगटन पोस्ट ने चुपचाप एक सुधार (correction) जोड़ा है, जिससे यह साफ हुआ कि उन्होंने खुद पत्रकारिता संबंधी एक बड़ी गलती की थी।

रिपोर्ट की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि एक भारतीय पत्रकार को व्हाट्सऐप पर यह संदेश मिला कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख को तख्तापलट (कूप) में गिरफ्तार कर लिया गया है। वॉशिंगटन पोस्ट ने दावा किया कि यह मैसेज प्रसार भारती (भारत की सरकारी प्रसारण संस्था) से आया था। उन्होंने भारतीय पत्रकारों को यह कहकर दोषी ठहराया कि उन्होंने बिना जाँच किए इस खबर को आगे बढ़ाया।

पर अब वॉशिंगटन पोस्ट ने माना है कि वह व्हाट्सऐप मैसेज प्रसार भारती के आधिकारिक चैनल से आया ही नहीं था। वह मैसेज केवल किसी एक व्यक्ति के दावे पर आधारित था। इसका ना कोई प्रमाण था और ना कोई दूसरा स्रोत। यह सिर्फ व्हाट्सऐप पर आया एक कथित मैसेज था।

अपनी सुधार सूचना में अब वॉशिंगटन पोस्ट ने कहा है कि वह मैसेज ‘प्रसार भारती के एक कर्मचारी’ द्वारा भेजा गया था। लेकिन यह नहीं बताया गया कि वह कर्मचारी कौन था, उसका पद क्या था, या वह जानकारी कितनी विश्वसनीय थी।

प्रसार भारती ने भी एक बयान जारी कर कहा है कि उसने ऐसी कोई झूठी जानकारी अपने किसी प्लेटफॉर्म पर साझा नहीं की थी। संस्था ने यह भी कहा कि उसके पास एक सख्त फैक्ट-चेकिंग सिस्टम है और वह केवल जाँची-परखी खबरें ही जारी करता है।

चुपचाप हटा दिए गए भारतीय चैनलों पर से झूठे आरोप

यहाँ से लेख ने एक और झूठ की ओर रुख किया। वॉशिंगटन पोस्ट ने TV9 भारतवर्ष पर एक झूठा आरोप लगाया कि चैनल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के आत्मसमर्पण की खबर चलाई थी। बाद में चुपचाप इस दावे को लेख से हटा दिया गया।

एक Pulitzer जीतने की चाह रखने वाला न्यूजरूम यह उम्मीद तो कर ही सकता है कि वह ऐसे गंभीर आरोप लगाने से पहले जानकारी की अच्छी तरह जाँच कर ले। लेकिन लगता है कि ये नियम सिर्फ दूसरों पर लागू होते हैं उन पर नहीं जो खुद आरोप लगा रहे हैं। पत्रकारिता में सच्चाई की जाँच जरूरी है, लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट ने खुद यह नियम तोड़ा।

सूडान के वे दृश्य जो कभी प्रसारित नहीं हुए

रिपोर्ट में यह झूठा दावा भी किया गया था कि भारतीय समाचार चैनलों ने सूडान संघर्ष के दृश्य प्रसारित किए, जो फिर से झूठ निकला। अब संशोधित संस्करण में उस पंक्ति को हटा दिया गया है।

अनुवाद में खोकर हिंदी वाक्यांशों का गलत अनुवाद

फिर सबसे अहम बात जो सामने आई वह था हिंदी शब्दों का गलत अनुवाद। वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारतीय न्यूज चैनलों ने बताया था ‘पाकिस्तान के बड़े शहर तबाह कर दिए गए हैं।’ लेकिन यह बात बाद में गलत साबित हुई और उन्हें इसे सुधारना पड़ा।

असल में जो लोग भारतीय चैनल देखते हैं या जिन्हें थोड़ी भी हिंदी समझ आती है, वो जानते हैं कि चैनलों पर ‘कराची में तबाही’ जैसे शब्दों का मतलब होता है कि वहाँ अफरा-तफरी या हंगामा मचा है, इसका ये मतलब नहीं होता कि पूरा शहर मिटा दिया गया है।

लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट ने ‘तबाही’ का सीधा मतलब complete destruction (पूरी तरह बर्बाद हो जाना) निकाला। लगता है उन्होंने या तो Google Translate का इस्तेमाल किया या फिर किसी AI टूल से शब्द दर शब्द अनुवाद करवा लिया था। शायद वॉशिंगटन पोस्ट के पास फ्रीलांस पर भी कोई ऐसा कर्मचारी रखने का बजट नहीं है, जो भारतीय भाषाओं को समझता हो।

विडंबना का एक सबक

एक ऐसा लेख, जिसे भारतीय मीडिया में गलत जानकारी को उजागर करने के लिए लिखा गया था, खुद ही एक उदाहरण बन गया कि कैसे झूठी या भ्रामक बातें कभी-कभी मशहूर पश्चिमी मीडिया संस्थानों में भी छप जाती हैं।

यह रिपोर्ट जो भारतीय न्यूज चैनलों को शर्मिंदा करने के इरादे से लिखी गई थी, अंत में खुद ही अपनी संपादकीय प्रक्रिया की कमजोरी को उजागर कर बैठी। ऐसे में बेहतर तो यहीं होगा कि वॉशिंगटन पोस्ट दूसरों पर उँगली उठाने से पहले खुद अपनी पत्रकारिता और नैतिकता पर ध्यान दे और आत्ममंथन करे।

इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है।

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Anurag
Anuraghttps://lekhakanurag.com
Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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