Friday, October 2, 2020
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हलाल पर सवाल उठाने पर ऑपइंडिया के खिलाफ दुष्प्रचार: रेवेन्यू का गम नहीं, पाठकों का समर्थन जरूरी

ऑपइंडिया कभी भी अपने किसी लेख में इसलिए परिवर्तन नहीं करेगा, या फिर अपने मूलभूत सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा, क्योंकि कुछ असहिष्णु लोगों को इससे दिक्कत है और इसे लेकर दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है। यूके में बैठ कर कोई ट्विटर हैंडल भाषण झाड़े और हमें झुकाने की कोशिश करे तो ये संभव नहीं है।

पिछले कुछ दिनों से ऑपइंडिया के विरुद्ध एक घटिया दुष्प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। दरअसल, हमने ‘हलाल प्रक्रिया’ को लेकर एक ख़बर प्रकाशित की थी। इसमें बताया था कि कैसे इसके तहत भेदभाव वाला रवैया अपनाया जाता है। इसके बाद ‘स्टॉप फंडिंग हेट’ नामक ट्विटर हैंडल ने ये मान लिया कि हम घृणा फैला रहे हैं और उसने हमारे खिलाफ़ दुष्प्रचार फैलाने का ठेका ले लिया। इसके बाद लेफ्ट लिबरल मीडिया पोर्टलों ने इसका जश्न मनाया।

इन प्रोपेगेंडा पोर्टलों ने एक भारतीय मीडिया पोर्टल पर किसी विदेशी संस्था द्वारा किए जा रहे आक्षेप का समर्थन किया और इससे सम्बंधित ख़बरें भी चलाईं। ‘स्क्रॉल’ ने हमसे संपर्क कर इस विषय पर हमारी राय भी जाननी चाही। वामपंथी मीडिया के चाल-चलन के विपरीत ‘स्क्रॉल’ ने कम से कम इस विषय में हमारा पक्ष जानने के लिए हमसे सम्पर्क किया। फिर भी हम अपना बयान यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं, क्योंकि वामपंथी मीडिया की आदत है कि वे बयानों को तोड़-मरोड़कर और उनसे छेड़छाड़ कर पेश प्रस्तुत करते हैं।

‘स्क्रॉल’ के 3 सवाल

‘स्क्रॉल’ ने हमसे ये 3 सवाल पूछे:

  • ये जो ‘अभियान’ चल रहा है, इस बारे में विज्ञापन देने वाली कम्पनियों या फिर नेटवर्क्स ने हमसे कुछ कहा है? क्या उन्होंने इसे लेकर चिंताएँ जताई हैं?
  • इस ‘अभियान’ के अंतर्गत ऑपइंडिया के खिलाफ जो आरोप लगाए गए हैं और कई लेखों में घृणा फैलाने का जो आरोप लगा है, उस बारे में आपका क्या कहना है?
  • विज्ञापन देने वाली कम्पनियों ने जो भी चिंताएँ जाहिर की हैं, क्या उसके बाद ऑपइंडिया ने अपने लेखों में बदलाव करने का फ़ैसला लिया है?

हमने ‘स्क्रॉल’ को ये जवाब दिया

एक तरफ जब पूरा वामपंथी मीडिया ऑपइंडिया को नीचा दिखाने में लगा हुआ है, ऐसे में ‘स्क्रॉल’ को धन्यवाद कि उसने कम से कम हमे हमारी राय जानने का तो प्रयास किया। ये पत्रकारिता का एक ऐसा नैतिक सिद्धांत है, जिसे वामपंथी मीडिया ने कब का त्याग दिया है। यह हमारा बयान है, जिसे आशा है कि तोड़-मरोड़कर नहीं पेश किया जाएगा। इसे हम हूबहू जनता के समक्ष रख रहे हैं:

‘गूगल ऐड्स’ या फिर किसी भी विज्ञापन कम्पनी या नेटवर्क ने हमसे इस ‘अभियान’ के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा है और न ही किसी प्रकार की चिंता जाहिर की है। अभी तक कम्पनी ने नहीं कहा है कि वो ऑपइंडिया की वेबसाइट पर से अपनी प्रचार सामग्री हटाना चाहते हैं। एडवरटाइजिंग डैशबोर्ड गूगल के हाथ में रहता है तो कम्पनियों को इस बारे में हमसे संपर्क करने की आवश्यकता भी नहीं है। इसलिए आप उन्हीं लोगों से पूछ लीजिए।

क्या है ‘हेट स्पीच’? आजकल ये एक ऐसा हथियार बन गया है, जिसके द्वारा उन आवाज़ों को दबाने की कोशिश की जाती है जो उनलोगों से सहमत न हों। ये असहिष्णु समूह की पहचान है, जिसका इस्तेमाल कर वे विरोधियों को चुप कराना चाहते हैं। ऑपइंडिया कभी भी किसी अन्य के लिए परेशानी क्रिएट करने के लिए फ्री स्पीच का इस्तेमाल नहीं करता, ये हम भलीभाँति समझते हैं।

लेकिन, जहाँ तक हमारे लेख की बात है (जिस पर सवाल उठ रहे हैं), हमारा मानना है कि ये फ्रीडम ऑफ स्पीच और मीडिया की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है। इस लेख में हमने हलाल की प्रकिया पर सवाल उठाए थे, जो भेदभाव भरा है। इसने हिन्दुओं, ख़ासकर दलितों को मांस इंडस्ट्री में नौकरी पाने से वंचित रखा हुआ है। जहाँ मुस्लिम समुदाय इसे खाने की च्वाइस बताता है, ये असल में एक मजहबी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत एक मुसलमान को शहादा का पालन करने को कहा जाता है।

हमारे लेख का मूल भाव ये था कि अगर मजहब की आड़ में एक प्रकार का भेदभाव उचित और वैध है तो फिर किसी अन्य संप्रदाय या धर्म के लिए उसी प्रकार का दूसरा भेदभाव अनुचित और अवैध कैसे ठहराया जा सकता है? अगर हलाल वैध है तो फिर हिन्दुओं द्वारा अपने व्यापर में मुसलमानों को नौकरी न देना अवैध कैसे हो सकता है? इसे अपराधिक बता कर एफआईआर क्यों दर्ज कराया जाता है? ‘हेट स्पीच’ का आरोप ही इसलिए लगाया जाता है ताकि दशकों से चली आ रही ऐसी चीजों की सच्चाई कभी बाहर न आने पाए।

ऑपइंडिया कभी भी अपने किसी लेख में इसलिए परिवर्तन नहीं करेगा, या फिर अपने मूलभूत सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा, क्योंकि कुछ असहिष्णु लोगों को इससे दिक्कत है और इसे लेकर दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है। यूके में बैठ कर कोई ट्विटर हैंडल भाषण झाड़े और हमें झुकाने की कोशिश करे तो ये संभव नहीं है। ये नहीं हो पाएगा। उन्होंने हलाल के खिलाफ लेख को मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार बता कर ऑपइंडिया का आर्थिक बहिष्कार करने का दुष्प्रचार अभियान चला रखा है, लेकिन हम अपने लेख पर शत प्रतिशत कायम हैं।

इसे संक्षिप्त में कहें तो हम अपने लेख पर पूर्णत: कायम हैं। उसमें जो भी कंटेंट है, उससे हम शत-प्रतिशत सहमत हैं। हम उसमें किसी भी प्रकार का रत्ती भर बदलाव भी नहीं करने जा रहे हैं। हमारा अस्तित्व और हमारी वफादारी हमारे पाठकों से है। हम उनके प्रति जवाबदेह हैं। हम कोई हिन्दूफ़ोबिया से ग्रसित कॉर्पोरेट हाउस नहीं हैं जो इन चीजों पर सवाल उठाने से डर जाएगा।

रेवेन्यू को लेकर CEO राहुल रौशन का बयान

वेबसाइट पर प्रचार सामग्री इसलिए होती है ताकि अतिरिक्त रेवेन्यू आए और इससे किसी को कोई परेशानी नहीं होती। हालाँकि, हमारे पास अधिकतर वित्त उन पाठकों से आता है, जो स्वेच्छा से हमें दानस्वरूप धनराशि भेजते हैं, क्योंकि उन्हें हमारा कंटेंट पसंद आता है। ये एक तरह से हमारे लिए अदृश्य ‘पोस्ट सर्विस पेवॉल’ है। ये पाठकों के ऊपर है कि वे कितना डोनेट करने की क्षमता रखते हैं और उन्हें हमारा कंटेंट कितना पसंद है।

हमें छोटे शहरों में रहने वाले छात्रों से 10 रुपए का डोनेशन भी मिलता है और बड़े शहरों में स्थापित कोई व्यक्ति हमें 3 लाख रुपए भी डोनेट कर देता है। हमें यही आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, कोई एडवरटाइजमेंट्स नहीं। हमें यह बताने में ख़ुशी हो रही है कि इस दुष्प्रचार अभियान के बाद से हमारे रेवेन्यू में 700% की वृद्धि आई है और हमें लोगों का भरपूर समर्थन मिल रहा है।

अगर रेवेन्यू गिर भी जाए तो कोई गम नहीं है, क्योंकि हमें सिर्फ हमारे पाठकों के समर्थन की ज़रूरत है और हम उनके लिए ही लिखते हैं। इसलिए ऐसे दुष्प्रचार अभियान से हमें और ज्यादा प्रेरणा मिलती है। हमारे काम को लेकर हमारा जोश और हाई हो जाता है। दुष्प्रचार फैलाने वाले इन्हीं असहिष्णु लोगों ने तो हमारे रेवेन्यू को बढ़ाने में खासा योगदान दिया है और हम चाहते हैं कि ये अपना नकारात्मक चेहरा हर महीने ऐसे ही दुनिया के सामने लेकर आएँ, ताकि हमारे पाठक हमारा और ज्यादा उत्साहवर्द्धन करें।

और हाँ, हमें हमारे कई पाठक प्रति महीने नियमित रूप से डोनेशन देना चाहते हैं और उनकी माँग है कि हम ऑटोमेटिक पेमेंट का फीचर लेकर आएँ। हम इस पर काम कर रहे हैं और ये जल्द ही सार्थक होगा।

ऑपइंडिया अंग्रेजी की संपादक नुपूर शर्मा का मूल रूप से अंग्रेजी में जवाब यहॉं पढ़े

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Nupur J Sharma
Editor, OpIndia.com since October 2017

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