Wednesday, August 10, 2022
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रेजांग ला मेमोरियल देश को समर्पित: 1962 युद्ध के हीरो ब्रिगेडियर आरवी जतर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया एस्कॉर्ट

"आज लद्दाख की दुर्गम पहाड़ियों के बीच स्थित रेजांग ला पहुँच कर 1962 की लड़ाई में जिन 114 भारतीय सैनिकों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था, उन बहादुर सैनिकों की स्मृतियों को नमन किया। रेजांग ला का युद्ध, विश्व के दस सबसे महान और चुनौतीपूर्ण सैन्य संघर्षों में से एक माना जाता है।"

भारत और चीन के बीच 1962 में हुए इंडो-सिनों वॉर में अपनी शौर्य और पराक्रम से वीरता के नए प्रतिमान गढ़ने वाले वीर जवानों के सम्मान में लद्दाख के रेजांग ला में बनाए गए नए स्मारक का गुरुवार (18 नवंबर 2021) को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उद्घाटन किया। उन्होंने वीर जवानों को श्रद्धांजलि दी और स्मारक को राष्ट्र को समर्पित किया।

इस समारोह को लेकर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने ट्वीट किया, “आज लद्दाख की दुर्गम पहाड़ियों के बीच स्थित रेजांग ला पहुँच कर 1962 की लड़ाई में जिन 114 भारतीय सैनिकों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था, उन बहादुर सैनिकों की स्मृतियों को नमन किया। रेजांग ला का युद्ध, विश्व के दस सबसे महान और चुनौतीपूर्ण सैन्य संघर्षों में से एक माना जाता है।” मेमोरियल के उद्घाटन से पहले रक्षामंत्री 1962 युद्ध के हीरो रहे रिटायर्ड ब्रिगेडियर आर वी जतर को व्हीलचेयर पर स्कॉर्ट कर मेमोरियल तक ले के गए। उन्होंने उनकी वीरता को नमन भी किया। इसके अलावा इस स्मारक में गलवान घाटी में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों के भी नामों को शामिल किया गया है।

कौन हैं आर वी जतर

1962 के युद्ध में रेजांग ला के युद्ध में चीनी पीएलए के दाँत खट्टे कर देने वाली 13वीं कुमाऊँ रेजीमेंट की मेजर शैतान सिंह की चार्ली कंपनी के कमांडर थे। उन्होंने भी चीनी सैनिकों से युद्ध किया था। इस मौके पर रक्षा मंत्री ने उनकी वीरता को नमन किया। इसको लेकर उन्होंने ट्वीट किया, “मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे रेजांग ला की लड़ाई में बहादुरी से लड़े ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) आर वी जतर से भेंट करने का अवसर मिला। वे उस समय कम्पनी कमांडर थे। उनके प्रति सम्मान के भाव से मैं अभिभूत हूँ और उनके साहस को मैं नमन करता हूँ। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखे और दीर्घायु करें।”

रेजांग ला का युद्ध

18 नवंबर 1962 को हुए रेजांग ला के युद्ध में 13वीं कुमाऊँ रेजिमेंट के मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में चार्ली कंपनी के 114 जवानों ने 400 चीनी सैनिकों को ढेर कर दिया था। भारतीय सेना की अपेक्षा चीनी सैनिकों के अधिक हथियार और सेना होने के बाद भी भारतीय सेना ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुँचाते हुए उसे पीछे धकेल दिया था।

इस युद्ध से भारत के केवल 6 सैनिक ही जिंदा वापस लौटे थे, जिन्होंने समय-समय पर अपने अनुभवों और साथियों की बहादुरी से दुनिया को अवगत कराया। 13 कुमाऊँ रेजिमेंट की चार्ली कम्पनी की बहादुरी का ही परिणाम था कि सामरिक दृष्टि से बेहद अहम यह पोस्ट भारत से अलग होने से बच गई थी। मेजर गौरव आर्या ने अपने ब्लॉग में चीनी सैनिकों की संख्या 3000 के करीब बताई है। हालॉंकि इस युद्ध में जीवित बचे सैनिकों के अनुसार चीनी 5-6 हजार की संख्या में थे।

इस युद्ध के बाद मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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