Tuesday, October 27, 2020
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जब सीमा पार किए बिना ही भारतीय वायुसेना ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए: कहानी अनूठे ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ की

पाकिस्तान इस पूरे संघर्ष में वायुसेना से बचने के लिए अलग-अलग सप्लाई रूट्स की तलाश में लगा रहा और इससे पहले कि उनकी योजना धरातल पर उतर पाती, तब-तब वायुसेना ने उनके नए रूट्स का काम तमाम कर डाला। और इस संघर्ष में जितनी भारत को क्षति हुई, उससे कई गुना ज्यादा क्षति पाकिस्तान को पहुँची। एक तरह से ये एक नया ट्रेंड था। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए।

भारतीय वायुसेना ने एक से बढ़ कर एक ऐसे कारनामें किए हैं, जिनकी गिनती की जाए और उनकी शौर्य गाथा के बारे में बताया जाए तो वर्षों लग जाए। गोवा को आज़ाद कराना हो या श्रीलंका में थलसेना का साथ देना हो, कारगिल का ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ हो या 2019 का बालाकोट एयर स्ट्राइक, भारतीय वायुसेना के कारनामों का कोई जोड़ नहीं। यहाँ हम बात करेंगे कि कैसे कारगिल में भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में पाकिस्तान को धूल चटाया।

कारगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना को मदद के लिए पहली बार मई 11, 1999 को कहा गया, जब उसके हैलीकॉप्टर्स की ज़रूरत महसूस की गई। इसके बाद 25 मई को भारतीय वायुसेना को कारगिल के पाकिस्तानी घुसपैठियों पर हमला करने की अनुमति मिली, लेकिन बिना ‘लाइन ऑफ कण्ट्रोल (LOC)’ को पार किए। लेकिन, उस समय भारतीय वायुसेना पर कितना दबाव था – इसे हमें समझने की ज़रूरत है, तभी हम इस कामयाबी को ठीक तरह से समझ पाएँगे।

कारगिल का ‘ऑपरेशन सफेद सागर’: भारतीय वायुसेना की शौर्य गाथा

उस दौरान भारतीय वायुसेना पर इस बात का खासा दबाव था कि वो केवल हमलावर हैलीकॉप्टर्स का ही इस्तेमाल करें, लेकिन, वायुसेना तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को ये समझाने में कामयाब रही कि हैलीकॉप्टर्स से हमले के लिए माहौल बनाने हेतु ‘फाइटर एक्शन’ की ज़रूरत है। ये ऑपरेशन दुनिया में अपनेआप में ऐसी कठिन परिस्थिति में पहला हवाई ऑपरेशन था, जिसकी सफलता की गूँज आज भी सुनाई पड़ती है।

कारगिल के पर्यावरण को समझे बिना हमें इस ऑपरेशन में आई दिक्कतों को जानने में परेशानी होगी। उस समय तक ऐसा कोई एयरक्राफ्ट डिजाइन ही नहीं किया गया था, जो कारगिल जैसी ऊँची और कठिन जगह पर संचालित किया जा सके। हालाँकि, रिजर्व पॉवर की उपलब्धता वहाँ काम करने के लिए सबसे बड़ी चीज थी और इसी मामले में मिग और मिराज जैसे एयरक्राफ्ट्स को वहाँ हमले के लिए सबसे उपयुक्त माना गया।

वहाँ पर्यावरण की समस्याओं के कारण किसी भी फाइटर एयरक्राफ्ट की परफॉरमेंस वैसी नहीं रहती, जैसी उसकी समुद्र तल की ऊँचाई वाली जगह पर रहती है। वायुमंडल में तापमान व घनत्व का ऊपर-नीचे होना इन एयरक्राफ्ट्स के लिए समस्या का विषय होता है क्योंकि इन चीजों को ध्यान में रख कर उन्हें तैयार ही नहीं किया जाता था। ऊपर से ऐसी परिस्थितियों में परिणाम भी कम्प्यूटराइज्ड कैलकुलेशन से काफी अलग आते हैं।

उन पहाड़ों पर अगर निशाने में चूक हुई और हमला कुछ ही यार्ड की दूरी पर हुआ, फिर भी टारगेट को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा। जबकि, समतल सरफेस में ऐसा नहीं होता है। वहाँ निशाने से हल्का दूर हुआ हमला भी टारगेट को तबाह कर सकता है। इसीलिए, ऐसी जगहों पर एक्यूरेसी काफी ज्यादा मायने रखती है, वो भी ‘पिनपॉइंट एक्यूरेसी’। इसीलिए, ऐसी जगहों पर एक हल्की सी गलती के लिए जरा सी भी गुंजाइश नहीं है।

जल्द ही भारतीय वायुसेना को भी इन्हीं दिक्कतों का सामना करना पड़ा और ऑपरेशन के कुछ ही दिन में एक Mi-17 और एक चॉपर को दुश्मनों ने मार गिराया। इससे इतना तो पता चल ही गया कि यहाँ आर्म्ड हैलीकॉप्टर्स की जगह फाइटर्स की आवश्यकता है। इसीलिए वायुसेना ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया। दिक्कत ये आ रही थी कि पायलट्स को भी किसी चलायमान एयरक्राफ्ट तो दूर की बात, एक स्थिर टारगेट तक को पहचानने में खासी मुश्किल आ रही थी।

बदली रणनीति के बाद जब भारतीय वायुसेना ने हमला बोला तो दुश्मन को खासा नुकसान हुआ। बिना LOC को पार किए ही दुश्मन की संपत्ति को क्षति पहुँचाई गई। साथ ही कई घुसपैठी भी मारे गए। दुश्मन जमीन पर राशन-पानी तक के लिए भी तरस गया और उसके रसद की सप्लाई पूरी तरह बंद हो गई। इसके बाद खुद भारतीय सेना के मुख्यालय से आए एक सन्देश में वायुसेना की तारीफ करते हुए कहा गया था:

“आपलोगों ने काफी अच्छा काम किया है। मिराज में बैठे आपके अधिकारियों ने अपने ‘प्रेसिजन लेजर बॉम्ब्स’ का प्रयोग कर के टाइगर हिल क्षेत्र में दुश्मन के बटालियन के मुख्यालय को निशाना बनाया और इसमें बहुत बड़ी सफलता मिली। इस हमले में 5 पाकिस्तानी अधिकारी मारे गए और उनका कमांड और कण्ट्रोल सिस्टम तबाह हो गया। इसके परिणाम ये हुआ कि भारतीय सेना पूरे टाइगर हिल क्षेत्र पर भ्रमण कर रही है। अगर यही गति रही तो इस संघर्ष का जल्द ही अंत हो जाएगा। “

जब भारतीय वायुसेना ने दुश्मन के सप्लाई कैम्प्स को निशाना बनाना शुरू किया, तो इससे भारतीय थलसेना का काम आसान होता गया। ध्यान देने वाली बात तो ये है कि शायद ही जमीन पर ऐसा कोई ऑपरेशन हुआ, जिसमें वायुसेना ने पहले स्ट्राइक न किया हो। इसी तरह 15 कॉर्प्स और AOC, जम्मू-कश्मीर के समन्वय ने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी। थलसेना ने जहाँ-जहाँ ज़रूरत पड़ी, वायुसेना को स्ट्राइक के लिए कहा।

पाकिस्तान इस पूरे संघर्ष में वायुसेना से बचने के लिए अलग-अलग सप्लाई रूट्स की तलाश में लगा रहा और इससे पहले कि उनकी योजना धरातल पर उतर पाती, तब-तब वायुसेना ने उनके नए रूट्स का काम तमाम कर डाला। और इस संघर्ष में जितनी भारत को क्षति हुई, उससे कई गुना ज्यादा क्षति पाकिस्तान को पहुँची। एक तरह से ये एक नया ट्रेंड था। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए।

कैसे सफल हुआ ये ऑपरेशन

तत्कालीन वायुसेनाध्यक्ष और एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत ने तब बताया था कि जैसे ही उन्हें इस संघर्ष में जाने की अनुमति मिली, सीमा पर रडार सिस्टम को सक्रिय करते हुए तैयारियाँ शुरू कर दी गईं क्योंकि आशंका थी कि दुश्मन हमारी उड़ान में बाधा डाल सकता है। उनका कहना था कि ऐसी परिस्थितियों में इन सब तैयारियों के लिए काफी समय होना चाहिए, लेकिन भारतीय वायुसेना ने 12 घंटे से भी कम समय में इसे अंजाम देकर नया कीर्तिमान रच दिया।

पाकिस्तान को तो आशंका भी नहीं थी कि भारतीय वायुसेना को भी यहाँ कार्रवाई में लगाया जा सकता है, क्योंकि उसे लगता था कि ये इलाक़ा इतना दुर्गम है कि यहाँ वायुसेना लगाई ही नहीं जाएगी। इतने छोटे से क्षेत्र में सीमित रूप में भारतीय वायुसेना का इस्तेमाल अपनेआप में एक बड़ा चुनौती भरा और दुष्कर कार्य था। एयर मार्शल विनोद पाटनी ने कहा था कि वायुसेना का काम दुश्मन की संरचनाओं को तबाह करने और उनके भूभाग में घुस कर हमले के लिए होता है, लेकिन यहाँ घुसपैठियों को खदेड़ना था।

बकौल पाटनी, समस्या ये थी कि अबकी लक्ष्य काफी छोटे थे क्योंकि सामान्य वायुसेना के ऑपरेशनों में 20,000 फीट की ऊँचाई से राजमार्गों, पुलियों, रेलवे लाइनों और सैनिक अड्डों को तबाह करने के लिए किया जाता है। साथ ही नागरिक लक्ष्यों की ख़ुफ़िया जानकारी भी ठीक से प्राप्त नहीं थी। लड़ाकू विमान की कॉकपिट में बैठे पायलटों ने कैमरों से बाहर की तस्वीरें ली और इस तरह से एक नए तरीके से दुश्मन की चाल का पता लगाया गया।

रात के समय में नीची उड़ानें भरी जा सकती थीं लेकिन ये पायलटों के लिए एक बड़ा ही दुष्कर कार्य था। बावजूद इसके एक भी हवाई दुर्घटना के बिना ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ को अंजाम दिया गया। मात्र 3 दिन में कारगिल की पहाड़ियों की संरचनाओं को समझ कर भविष्य के हमलों के लिए योजनाएँ बनाई गईं। लगभग साढ़े 3 महीने में भारतीय वायुसेना ने इस ऑपरेशन के तहत दुश्मन के खिलाफ 1400 से भी अधिक उड़ानें भरी।

ये एक ऐसा ऑपरेशन था, जिसमें संसाधन होते हुए भी सीमित चीजों का ही इस्तेमाल करना था और न ही ये परंपरागत युद्ध था। इसमें पश्चिमी वायु सैनिक कमांड के एक चौथाई संसाधनों का ही उपयोग किया गया। भारतीय वायुसेना ने अपने विमानों को सुरक्षा आवरण दे रखा था, जिससे न तो सीमा पार से कोई उन्हें गिराने का दुस्साहस कर पाया और न ही असंख्य गोलियाँ चलने के बावजूद उनका कुछ हुआ। सच में, ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ अनूठा था, हर मामले में।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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