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भारत के खिलाफ ‘हाइब्रिड वॉर’, विकास, संप्रभुता और वैश्विक नैरेटिव का खेल: समझें कैसे ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को बनाया जा रहा नया बैटलग्राउंड

ग्रेट निकोबार इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (GNI) नया बैटलग्राउंड बन गया है। 81,000 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट में मेगा पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, पावर प्लांट और पोर्ट सिटी शामिल हैं, जो भारत को सिंगापुर-कोलंबो जैसी समुद्री शक्ति बना सकता है।

आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़े जाते। अब युद्ध लड़े जाते हैं आपके मोबाइल स्क्रीन पर, अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के कवर पेज पर और मानवाधिकारों की आड़ में चलने वाले एनजीओ (NGOs) के दफ्तरों में। इसे ही ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ या ‘एसिमेट्रिक वॉरफेयर’ कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य किसी उभरती हुई शक्ति को अंदरूनी तौर पर इतना उलझा देना है कि वह अपनी पूरी क्षमता से विकास न कर सके।

इसी तरह से जब भी भारत कोई बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करता है, चाहे वो कोई न्यूक्लियर प्लांट हो, कोई बड़ा पोर्ट हो या माइनिंग प्रोजेक्ट, अचानक से पूरी दुनिया के ‘मानवाधिकार संगठन’ और ‘पर्यावरण कार्यकर्ता’ जाग क्यों जाते हैं?

आपको लगेगा कि ये लोग तो प्रकृति की रक्षा कर रहे हैं, ये तो सराहनीय काम है। लेकिन क्या ये सिर्फ़ पर्यावरण प्रेम है या फिर इसके पीछे एक बहुत बड़ा जियो-पॉलिटिकल और वैचारिक खेल चल रहा है, जिसका मकसद भारत की उभरती हुई ताकत को कमजोर करना है?

आज हम आपको इसी हाइब्रिड वॉरफेयर के बारे में विस्तार से बताएँगे। यहाँ मिसाइलों या बंदूकों की जगह नैरेटिव, सूचना युद्ध, मिसइनफॉर्मेशन और फेक-न्यूज का इस्तेमाल किया जाता है।

हम बात करेंगे ग्रेट निकोबार इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (GNI) की, जिसे रोकने के लिए 13 देशों के 39 ‘जनसंहार विशेषज्ञों’ (Genocide Experts) ने 2024 में खुला पत्र लिखकर पूरा जोर लगा दिया।

हम कल्चरल मार्क्सिज्म की उस थ्योरी का भी गहरा विश्लेषण करेंगे, जो शिक्षा, मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवा पीढ़ी के दिमाग में ये बिठा रही है कि विकास का मतलब हमेशा विनाश ही है।

और सबसे महत्वपूर्ण कि हम आपको उन विदेशी एनजीओ और ग्लोबल लॉबीज के बारे में बताएँगे, जो भारत की जीडीपी को सालाना 2-3% की चोट पहुँचा रहे हैं यानी हजारों-लाखों करोड़ रुपए का नुकसान… जो अस्पतालों, स्कूलों, सड़कों और ऊर्जा सुरक्षा पर खर्च हो सकता था।

अमेरिका का ‘Trail of Tears’ vs भारत को लेक्चर

एक देश जिसने अपनी नींव ही मूल निवासियों की ज़मीन छीनकर रखी, आज दुनिया का सबसे बड़ा क्लाइमेट एक्टिविज्म का हब बन गया है। Indian Removal Act 1830 के तहत अमेरिका ने दसियों हज़ार नेटिव अमेरिकंस / रेड इंडियंस को उनकी पैतृक भूमि से जबरन बेदखल कर दिया। Trail of Tears के दौरान अकेले Cherokee और बाक़ी Tribes के करीब 60,000 से 1 लाख लोगों को हटाया गया, जिसमें हजारों की मौत हो गई, भूख, बीमारी और मार्च की भयानक हालत में।  

पूरी तस्वीर तो और भी भयानक है, 15वीं सदी से 19वीं सदी के बीच नेटिव अमेरिकन आबादी में भारी गिरावट आई, युद्धों, बीमारियों और ट्राइब्स की इस किस्म की बेदख़ली से। फिर वही अमेरिका NGO संस्कृति का जनक बना, खुद को सुपरपावर नाम दिया और आज क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा चैंपियन बनकर दुनिया को लेक्चर देता है।  जो देश कभी ज़मीनें छीन रहे थे, वो आज NGOs के जरिए हमारी ज़मीन के इस्तेमाल पर लेक्चर दे रहे हैं।

इसी अमेरिका ने जो टर्मिनोलॉजी उछाली हैं, उन्हें ही भाड़े के एक्टिविस्ट अलग अलग देशों में अपनी पहचान बनाकर बेच रहे हैं और इन टर्मिनोलॉजी में सबसे लेटेस्ट एडिशन हैं – हीटवेव, क्लाइमेट एक्टिविज्म एंड ट्राइब्स। 

लेकिन सवाल ये है कि ये हिपोक्रेसी कहाँ से शुरू हुई? और क्यों आज भारत में भी यही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है?

अमेरिका और यूरोप से सीखकर भारत में आज ट्राइब्स और क्लाइमेट के नाम पर एक नया एक्टिविज्म तैयार किया जा रहा है। Forest rights, tribal land, climate justice, ये सब एक्टिविज्म के नाम हैं। लेकिन असल खेल civil society और NGOs के जरिए Cultural Marxism की घुसपैठ का है। जहाँ एक तरफ विकास और राष्ट्र-निर्माण को दमन/शोषण बताया जाता है, वहीं विदेशी फंडिंग से चलने वाले नेटवर्क ट्राइबल कम्युनिटीज को मेनस्ट्रीम से अलग रखने और राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं। डिवाइड एंड रूल का नया वर्जन यही है लेकिन अब सस्टेनेबिलिटी और ‘इनक्लूजन’ के पैकेजिंग में।

ये वही ताकतें हैं जो कल्चर, ट्रेडिशन और sovereignty को तोड़ने में लगी हैं; ठीक वैसे जैसे पश्चिम ने अपनी गलतियों को मॉरल सुपीरियॉरिटी में बदल लिया।

हाइब्रिड वारफेयर और 2014 की सीक्रेट रिपोर्ट

पहले युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते थे। लेकिन अब Asymmetric Warfare का दौर है। यहाँ हथियार हैं सोशल मीडिया, NGO और इंटेलेक्चुअल एक्टिविज्म

साल 2014 में IB ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक ऐसी रिपोर्ट सौंपी जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कुछ विदेशी ताकतें भारत की $5 ट्रिलियन इकोनॉमी बनने की राह में रुकावट डालने के लिए कई टेक्निक अपना रही हैं  – जैसे कि एक तरफ से स्थानीय लोगों की शिकायतों को भड़काना और दूसरी तरफ से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को मानव-विरोधी या पर्यावरण-विरोधी बताकर निवेश को रोकना।

IB ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इन आंदोलनों की वजह से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और माइनिंग सेक्टर को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ी है:

  1. परमाणु ऊर्जा (Kudankulam): ‘PMANE’ और ‘ग्रीनपीस’ जैसे संगठनों ने विरोध किया, जिससे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी में सालों की देरी हुई 
  2. कोयला और माइनिंग (Mahan Coal Block): एक्शनएड और ग्रीनपीस ने वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन का नैरेटिव खड़ा करके निवेश रुकवा दिया।
  3. औद्योगिक केंद्र (POSCO और वेदांता): स्थानीय सक्रियता के नाम पर अरबों डॉलर के  FDI का नुकसान हुआ।
  4. कृषि तकनीक (GMO विरोध): ‘ASHA’ और ‘ग्रीनपीस’ ने नई बीजों की तकनीक को रोककर कृषि उत्पादकता को बाधित किया।

और जानते हैं इसका सबसे भयानक नतीजा क्या निकला? IB के अनुसार, इन गतिविधियों की वजह से भारत की वार्षिक जीडीपी ग्रोथ रेट में 2% से 3% की गिरावट आई। ये हज़ारों-लाखों करोड़ रुपये हैं जो आपके और हमारे अस्पताल, स्कूल और सड़कों पर खर्च हो सकते थे।

अब समझने वाली बात ये है कि ये विरोध सिर्फ पेड़ों या पक्षियों तक सीमित नहीं है। असल में Climate Activism आज के दौर का एक Multipolar Ideological War बन चुका है। जिसे हम पर्यावरण की चिंता समझ रहे हैं, वो दरअसल Watermelon Politics है… यानी ऊपर से हरा, लेकिन अंदर से वही पुराना लाल (मार्क्सवादी) एजेंडा।

कोल्ड वार रणनीति + इको-मार्क्सिज्म + मेटाबॉलिक रिफ्ट

जब औद्योगिक विकास ने मजदूरों का जीवन सुधारा, तो वामपंथी विचारधारा को नया मोहरा चाहिए था। अब उन्होंने शिक्षित मध्यम वर्ग और छात्रों को निशाना बनाया और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के खिलाफ मॉरल वॉर छेड़ दी। मकसद साफ है- क्लाइमेट लिटिगेशन के जरिए चुनी हुई सरकार के हाथ बाँधना और देश की संप्रभुता को विदेशी एनजीओ के इशारों पर नचाना।

दिलचस्प बात ये है कि इस नैरेटिव की जड़ें Cold War में छिपी हैं। 1960 के दशक से ही पश्चिमी ताकतों ने आपातकाल और संकट पैदा करने की रणनीति अपनाई है ताकि जनता पर नियंत्रण रखा जा सके। आज जलवायु परिवर्तन को उसी युद्ध जैसी इमरजेंसी के रूप में फ्रेम किया जा रहा है ताकि विकासशील देशों की ऊर्जा और अर्थव्यवस्था को कमज़ोर किया जा सके।

इसीलिए ये पश्चिमी देश, खासकर जर्मनी जैसे यूरोपीय देश, अब Regulatory Imperialism (नियामक साम्राज्यवाद ) का सहारा ले रहे हैं। CBAM जैसे टैक्स लगाकर ये हमारे स्टील और एल्युमीनियम एक्सपोर्ट को महंगा कर रहे हैं ताकि भारत ग्लोबल मार्केट में पिछड़ जाए। ये वही शीतयुद्ध वाली रणनीति है कि संकट पैदा करो, डर फैलाओ और फिर EXPERT बनकर दुनिया को कंट्रोल करो।

हीटवेव: डर का नया नैरेटिव

हमारे देश में गर्मी का क्या लेना-देना इन सबसे? असली कहानी यही है- जब भी भारत में हीटवेव आती है, अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसे विनाशकारी संकट बताता है। ‘95% भारतीय शहर खतरे में’, ‘वेट बुल्ब टेम्परेचर’ जैसे शब्द उछाले जाते हैं।

ये डेटा अक्सर साइंटिफिक एक्सागरेशन होता है और ठीक उसी वक्त सामने आता है जब भारत कोई नया माइनिंग प्रोजेक्ट या पावर प्लांट शुरू करता है। मकसद भारत को ‘विक्टिम’ या ‘विलेन’ बनाना है ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव बने कि “देखो, तुम्हारा देश जल रहा है, इसलिए निकोबार या कोई XYZ प्रोजेक्ट रोक दो और हमारे महँगे ग्रीन-टेक खरीद लो।”

ये भारत की आर्थिक स्थिरता पर सवाल उठाने और हमें एक कमज़ोर देश साबित करने की वेल प्लानेंड कोशिश है। 

मैं गर्मी से इनकार नहीं कर रहा, लेकिन उस फियर मॉन्गरिंग का विरोध कर रहा हूं, जिससे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी (कोयला-गैस) को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि पश्चिम खुद फॉसिल फ्यूल पर टिका है।

लेकिन ये भारत को इस किस्म के मोरल डिलेमा में डालने का प्रयास करने वाली पश्चिमी संस्थाएँ जो आज के दौर में पैदा हुई हैं, शायद नहीं जानती कि भारत को आज किसी पश्चिमी ज्ञान और रेटिंग की ज़रूरत नहीं है। हमारे लिए प्रकृति कोई Product नहीं है, वो हमारे लाइफस्टाइल का जरूरी हिस्सा रहा है…

अथर्ववेद का मंत्र है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”। यानी धरती हमारी माँ है और हम उसकी संतान। जहाँ पश्चिम प्रकृति पर विजय पाने की सोचता है, वहीं हमारी संस्कृति प्रकृति के साथ जुड़कर रहने की बात करती है। हमें पश्चिमी “वॉटरमेलन” एक्टिविज्म की नहीं, अपनी प्राचीन Dharmic Ecology की ज़रूरत है जो विकास और प्रकृति, दोनों का सम्मान करती है।) 

क्या है सिविल सोसायटी और कल्चरल मार्क्सिज्म?

अब सवाल ये उठता है कि ये लोग इतने संगठित कैसे हैं? इनका दिमाग कैसे काम करता है? यहाँ एंट्री होती है Cultural Marxism की।

इतिहास में  देखें तो 20वीं सदी की शुरुआत में ‘फ्रैंकफर्ट स्कूल’ के विचारक जैसे मैक्स होर्खाइमर और थियोडोर अडोर्नो ने देखा कि मजदूर क्रांति नहीं कर रहे। तो उन्होंने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने कहा कि हथियारों से नहीं, संस्कृति से हमला करो।

इसे कहते हैं क्रिटिकल थ्योरी जिसका मकसद है परिवार, धर्म और राष्ट्रवाद जैसी संस्थाओं को ‘उत्पीड़क’ / Oppressor साबित करना।

और आज यही विचारधारा Eco-Marxism बन चुकी है। कार्ल मार्क्स ने एक सिद्धांत दिया था – ‘मेटाबॉलिक रिफ्ट’ / Metabolic Rift। ये कहता है कि पूंजीवाद मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता तोड़ देता है। इसी का फायदा उठाकर आज हर  डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को ‘जनसंहार’ यानी Genocide या ‘पारिस्थितिकी-संहार’ / Ecocide का नाम दे दिया जाता है।

 Cultural Marxism – इसके तीन फ्रंट हैं-

  • आर्थिक मार्क्सवाद: ये कहता है कि  दुश्मन ‘पूंजीपति’ है, एजेंट ‘मजदूर’ है।
  • सांस्कृतिक मार्क्सवाद: हमारे दुश्मन ‘पारंपरिक मूल्य’ हैं, या जिसमें ‘संस्कार’ कहकर तंज करने का चलन आता है, और यहाँ एजेंट है ‘हाशिए पर रहने वाले समूह’ हैं / मार्जिनलाइज्ड ग्रुप्स 
  • इको-मार्क्सवाद: इसमें दुश्मन ‘औद्योगिक विकास’ है, और इसके एजेंट पर्यावरण और आदिवासी कार्यकर्ता हैं।

यही वजह है कि आज एक आम नागरिक के मन में ये डाल दिया गया है कि अगर फैक्ट्री लगेगी, तो जंगल खत्म हो जाएंगे, जबकि सच्चाई कुछ और ही होती है।

लेकिन सोचने की बात ये है कि भारत के सांस्कृतिक नॉलेज और हमारे ट्रेडिशन को तोड़ने के लिए सबसे आगे हमेशा कौन रहा है? मार्स्किस्ट और कम्युनिस्ट और बदलते दौर के साथ यही मार्क्सिज्म आज कल्चरल मार्क्सिज्म की शक्ल में हमारे और आपके बीच है -इसी  Eco-Marxism के चश्मे से ये लोग भारत के हर बड़े प्रोजेक्ट को देखते हैं। इनके लिए निकोबार प्रोजेक्ट या कोई भी नया इंफ्रास्ट्रक्चर सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं है, बल्कि इनके हिसाब से ये “पूँजीवादी लालच” का वह हिस्सा है जो धरती को तबाह कर रहा है। और यही वो वैचारिक जाल है जिसमें हमारे यूथ  को फंसाया जा रहा है

भारत के लिए कितना अहम है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट 

अब बात करते हैं उस प्रोजेक्ट की, जो भारत को एक ‘ग्लोबल सुपरपावर’ बना सकता है, और जो इस वक्त इसी कल्चरल मार्क्सिज्म का पीड़ित है – ग्रेट निकोबार द्वीप जिसे लोग GNI प्रोजेक्ट भी नाम दे रहे हैं।

नीति आयोग का विजन है कि 81,000 करोड़ रुपए का निवेश होगा, जिसमें चार बड़ी चीजें होंगी

  1. गैलाथिया खाड़ी में एक मेगा पोर्ट: जो सिंगापुर और कोलंबो को टक्कर देगा।
  2. एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट: जो नागरिक और सैन्य दोनों कामों में आएगा।
  3. एक नया पावर प्लांट और पोर्ट सिटी

लेकिन इस से चीन और उसके सिपाहियों को क्यों डर लग रहा है? दरअसल, निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य / Strait of Malacca के मुहाने पर बैठा है। दुनिया का अधिकांश तेल और व्यापार यहीं से गुजरता है। इसे ही Malacca Dilemma भी नाम दिया जाता है क्योंकि भारत यहाँ से चीन की एनर्जी सप्लाई लाइन को कभी भी ब्लॉक कर सकता है।

यही वजह है कि INS Baaz हवाई पट्टी का विस्तार भारत के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य है। लेकिन जैसे ही भारत ने यहाँ काम शुरू किया, विदेशी एनजीओ का ‘इको-मार्क्सवाद’ सक्रिय हो गया।

द एंटी-इंडिया कैबाल / Anti-India Cabal -NGO  

हम आपको उन एनजीओ के बारे में बता रहे हैं, जो इस पूरे खेल के पीछे हैं। ये कोई मामूली संस्थाएं नहीं हैं, इनके नेक्सस पश्चिमी देशों की सरकारों और बड़े कॉर्पोरेट फंड्स से जुड़े हैं।

1. सर्वाइवल इंटरनेशनल (Survival International – UK)

इसका हेडक्वार्टर लंदन / UK में है। इसने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को ‘शौम्पेन’ (Shompen) जनजाति के लिए Death Sentence घोषित कर दिया है। साल 2024 में इन्होंने 13 देशों के 39 ‘जनसंहार विशेषज्ञों’ से एक चिट्ठी लिखवाई ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक ‘क्रूर राष्ट्र’ दिखाया जा सके। इनका मकसद आदिवासियों को आधुनिक स्वास्थ्य और शिक्षा से दूर रखकर ‘जैविक संग्रहालय’ / Biological Museums की तरह रखना है।

2. ग्रीनपीस इंडिया (Greenpeace – Netherlands)

यह नीदरलैंड्स बेस्ड संगठन का भारतीय हत्था है। आईबी की रिपोर्ट बताती हैं कि ग्रीनपीस ने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों – जैसे कुडनकुलम और कोयला खदानों के खिलाफ आंदोलन प्रायोजित करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए। इनका Main एजेंडा भारत की एनर्जी के फील्ड में इंडिपेंडेंट होने से रोकना है।

3. एमनेस्टी इंटरनेशनल और एक्शनएड (Amnesty and ActionAid – UK/International)

लंदन बेस्ड इन संस्थाओं को IB ने पश्चिमी सरकारों के Instruments नाम दिया था। ये मानवाधिकारों की आड़ में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और सेंसिटिव क्षेत्रों में माइनिंग जैसे प्रोजेक्ट्स के ख़िलाफ़ जनाक्रोश भड़काते हैं ताकि भारत की निर्भरता नेचुरल रिसोर्सेज के लिए विदेशों पर बनी रहे।

4. सतत संपदा (Satat Sampada) और हरजीत सिंह (India/International)

जनवरी 2026 में ED ने क्लाइमेट एक्टिविस्ट हरजीत सिंह और संजय वशिष्ठ के ठिकानों पर छापेमारी की। यहाँ मामला बहुत गंभीर नजर आता है। ‘सतत संपदा’ नाम की संस्था को ‘क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क’ (CAN) से 6 करोड़ रुपए का संदिग्ध विदेशी धन मिला। ED इस नतीजे पर पहुँचा था कि इस पैसे का इस्तेमाल भारत में ‘फॉसिल फ्यूल नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी’ (FF-NPT) को प्रमोट करने के लिए किया जा रहा था।

लेकिन ये ट्रीटी / संधि क्या है? ये संधि चाहती है कि भारत कोयला, तेल और गैस का इस्तेमाल बंद कर दे। जबकि भारत अपनी 70% बिजली आज भी कोयले से बनाता है। अगर ये सफल हो गए, तो भारत के घरों की बिजली गुल हो जाएगी और फैक्ट्रियाँ बंद हो जाएंगी।

5. स्थानीय नेटवर्क: PUCL, NAPM और नर्मदा बचाओ आंदोलन

विदेशी फंड्स सीधे जमीन पर नहीं आते। ये PUCL और ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ जैसे स्थानीय संगठनों के जरिए काम करते हैं। ये संगठन कानूनी अड़चनें पैदा करते हैं और स्थानीय लोगों को भड़काते हैं ताकि प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाए और देरी हो।

ESG का शस्त्रीकरण यानी हरित उपनिवेशवाद

ESG यानी – ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर हाइब्रिड वॉर: विदेशी एनजीओ और कल्चरल मार्क्सिज्म का भारत के विकास को रोकने की साजिश | Environment, Social and Governance को अब एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यही हरित उपनिवेशवाद (Green Colonialism) है।

विकसित देश, जिन्होंने खुद कोयला जलाकर और जंगलों को काटकर अपनी तरक्की की, अब भारत जैसी उभरती शक्तियों को ‘नैतिक मानदंडों’ के नाम पर रोक रहे हैं।

  • ग्रेट निकोबार पोर्ट: यहाँ एक्टिविज्म का आधार रेन फारेस्ट / वर्षावन है, लेकिन असली मकसद ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ पर भारतीय नियंत्रण रोकना है।
  • ओडिशा माइनिंग: यहाँ आधार ‘आदिवासी पहचान’ बनाया है, मकसद भारत को खनिज आयात पर निर्भर रखना है।
  • केन-बेतवा लिंक: यहाँ आधार ‘पन्ना टाइगर रिजर्व’ है, जबकि असली मकसद कृषि उत्पादकता को रोकना है।

ये एक तरह की ‘ग्रीन कोर्डन’ / Green Cordon स्ट्रेटेजी है ताकि भारत कभी भी ग्लोबल सप्लाई चेन का केंद्र न बन पाए।

राजनीतिक नेक्सस – राहुल गाँधी और चीनी MOU

लेकिन ये सब केवल बाहर से नहीं हो रहा। भारत के भीतर भी इसे राजनीतिक समर्थन मिलता है। और ऐसे में ही ये पूरा इकोसिस्टम एक लूप पूरी करता है – 

राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में संपत्ति के पुनर्वितरण यानी Wealth Redistribution जैसी बातें शुरू की हैं, जो सीधे तौर पर मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। राहुल गाँधी और उनके साथियों का एक साझा इतिहास रहा है- चाहे वो वेदांता हो, पॉस्को हो या टाटा नैनो, उन्होंने हर बड़े प्रोजेक्ट का विरोध किया है।

यहाँ एक और फैक्ट है। साल 2008 में कॉन्ग्रेस पार्टी और ‘चीनी कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPC) के बीच एक MoU हुआ था। लोग सवाल उठाते हैं कि क्या इस समझौते की वजह से ही विपक्ष उन रणनीतिक परियोजनाओं का विरोध करता है जो चीन के लिए खतरा हैं? जैसे कि ग्रेट निकोबार।

ये सिर्फ़ राजनीतिक आरोप नहीं है, ये तो एक Pattern है। जब भी कोई ऐसा प्रोजेक्ट आता है जो भारत को चीन के मुकाबले रणनीतिक बढ़त (Strategic Edge) देता है, तभी इंटरनल प्रोटेस्ट की आवाज सबसे तेज़ क्यों हो जाति है? क्या ये सिर्फ़ कोइंसीडेंस होता है या उस MoU का असर होता है, ये हमें सूचना चाहिए

वेनेजुएला vs वियतनाम – दो रास्तों की कहानी

अब आप सोच रहे होंगे कि विकास नहीं हुआ तो क्या हुआ? हम गरीब ही अच्छे हैं। तो इन दो देशों की कहानी देखते हैं। वेनेजुएला और क्यूबा – 

  1. वेनेजुएला और क्यूबा: यहाँ कट्टरपंथी समाजवादी नीतियाँ अपनाई गईं। उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ और विकास प्रोजेक्ट्स को रोका गया। नतीजा क्या हुआ? वेनेजुएला की GDP  88% गिर गई और वहाँ 548%  Inflation रेट है। इसे कहते हैं ‘दरिद्रता का वितरण’ (Equality of Misery)।
  2. वियतनाम: 1986 में वियतनाम ने ‘दोई मोई’ (Doi Moi) सुधार किए और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था अपनाई। आज वियतनाम 7.1% की दर से बढ़ रहा है और मैन्युफैक्चरिंग का ग्लोबल हब बन गया है।

इन दो उदाहरणों से भारत के लिए सबक साफ है, अगर हम इन विकास-विरोधी नैरेटिव्स के चक्कर में पड़े, तो हमारा हाल भी वेनेजुएला जैसा हो सकता है, जिनकी वामपंथी नीतियों ने वहाँ की जनता को गरीब बनाकर रखा … इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने विकास रोका, वे आज दरिद्रता बाँट रहे हैं.. 

असली भारतीय पर्यावरणवाद vs ‘एसी रूम’ एक्टिविज्म

एक बहुत ज़रूरी बात। भारत को पर्यावरण बचाना किसी पश्चिमी NGO से सीखने की ज़रूरत नहीं है। हमारी परंपरा में ‘बिश्नोई आंदोलन’ और ‘चिपको आंदोलन’ जैसे उदाहरण हैं, जहाँ लोगों ने अपनी संस्कृति के लिए पेड़ों को गले लगाया। स्वामी ज्ञान स्वरूप संनंद (प्रो. जीडी. अग्रवाल) जैसे असली योद्धाओं ने गंगा के लिए अपने प्राण त्यागे, किसी विदेशी फंडिंग के लिए नहीं।

असली पर्यावरणवाद और पेशेवर एक्टिविस्ट में फर्क है। ये ‘प्रोफेशनल एक्टिविस्ट’ AC कमरों में बैठकर हैशटैग चलाते हैं और उन्हीं सड़कों और बिजली का इस्तेमाल करते हैं जिनका वे विरोध करते हैं। इसका उदाहरण चार धाम यात्रा रूट पर आल वेदर रोड प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ PIL डालने वाली गैंग भी है… इस गैंग में वो लोग शामिल थे जिनकी पत्नी अमेरिका में बराक ओबामा की वोटर है… और ये क्लाइमेट के कैंपेन चलते हैं देहरादून में बैठकर।

वैसे भी भारत को पर्यावरण संरक्षण के लिए पश्चिम के ‘सर्टिफिकेट’ की जरूरत नहीं है। हमारी संस्कृति में भूमि को माता माना गया है।

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या

हमारा मॉडल ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का है, जहाँ विकास और प्रकृति साथ चलते हैं। सरकार द्वारा 21,000 से अधिक एनजीओ के लाइसेंस रद्द करना इस दिशा में एक कड़ा कदम है, लेकिन यह वैचारिक लड़ाई हमें अपने शिक्षण संस्थानों और सोशल मीडिया पर भी लड़नी होगी। ग्रेट निकोबार और ऐसे ही अन्य प्रोजेक्ट्स का सफल होना इस बात का प्रमाण होगा कि भारत अब बाहरी दबावों के आगे झुकने वाला ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं रहा।

इसीलिए ग्रेट को निकोबार केवल एक पोर्ट या एयरपोर्ट के रूप में नहीं देखना चाहिए। ये भारत जैसे देश की बढ़ती ताक़त के प्रमाण हैं और जब कोई ताक़तवर होता है तो उसके अड़ोसी पड़ोसी परेशान होते ही हैं – भविष्य में उन्हीं पड़ोसियों को टाइट रखने के लिए निकोबार जैसी जगह पर स्ट्रेटजिक डोमिनेंस का होना बेहद जरूरी भी होता है 

यही करण है कि भारत सरकार ने भी अब कड़ा रुख अपनाया है। 2014 से 2026 के बीच 21,000 से अधिक NGO  के FCRA लाइसेंस रद्द किए गए हैं। लेकिन ये लड़ाई अभी लंबी है।

हमें यह समझना होगा कि संप्रभुता की रक्षा के लिए- 

  1. विदेशी फंडिंग की लगातार निगरानी ज़रूरी है।
  2. हमें विकास की अपनी परिभाषा खुद गढ़नी होगी, जो प्रकृति और प्रगति दोनों को संतुलित करे।
  3. और सबसे ज़रूरी- हमें उस सांस्कृतिक मार्क्सिज्म को पहचानना होगा जो राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को ‘उत्पीड़न’ बताता है।

बहरहाल, क्या भारत एक वैश्विक समुद्री शक्ति बनेगा या विदेशी ताकतों के दबाव में झुक जाएगा? ये फैसला हमारे आज के फैसलों पर निर्भर करेगा।

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आशीष नौटियाल
आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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