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हेयर ट्रांसप्लांट से लेकर प्लास्टिक सर्जरी तक, दहशतगर्दी के लिए दाँत भी बदलवा रहे आतंकी: पढ़ें- बचने के लिए अपनाते हैं कैसे-कैसे हथकंडे

आधुनिक तकनीक और सुरक्षा कैमरों को चकमा देने के लिए आतंकी हेयर ट्रांसप्लांट, डेंटल प्रोसीजर और प्लास्टिक सर्जरी जैसे महँगे कॉस्मेटिक इलाजों का सहारा ले रहे हैं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) और श्रीनगर पुलिस की जाँच में आतंकवादियों के इस पूरे गिरगिटिया जाल का भंडाफोड़ किया है।

देश की सुरक्षा एजेंसियाँ इन दिनों आतंकवाद के एक ऐसे खौफनाक और हैरान करने वाले चेहरों का सामना कर रही हैं, जो बंदूक और बारूद से कहीं ज्यादा खतरनाक है। यह चेहरा है ‘बहरूपियेपन’ का। सीमा पार से भारत में घुसपैठ करने वाले आतंकी अब सिर्फ जंगलों या गुफाओं में नहीं छिपते, बल्कि वे हमारे और आपके बीच आम इंसानों की तरह जिंदगी जी रहे हैं। कोई प्लंबर बन जाता है, कोई ढाबा चलाने लगता है, कोई शेयर मार्केट में ट्रेडिंग करने लगता है, तो कोई ‘पीर’ बनकर लोगों का भरोसा जीत लेता है।

इतना ही नहीं, आधुनिक तकनीक और सुरक्षा कैमरों को चकमा देने के लिए ये आतंकी अब हेयर ट्रांसप्लांट, डेंटल प्रोसीजर और प्लास्टिक सर्जरी जैसे महँगे कॉस्मेटिक इलाजों का भी सहारा ले रहे हैं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) और श्रीनगर पुलिस की जाँच में आतंकवादियों के इस पूरे गिरगिटिया जाल का भंडाफोड़ हुआ है, जिसने सुरक्षा ग्रिड को भी चौकन्ना कर दिया है।

जब मिशन छोड़ हेयर ट्रांसप्लांट कराने पहुँचा आतंकी

आतंक की दुनिया की यह कहानी बहुत हैरान करने वाली है। यह किस्सा लश्कर-ए-तैयबा के पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद उस्मान जट उर्फ ‘चाइनीज’ का है। उस्मान लाहौर का रहने वाला है। वह कश्मीर में आतंकियों का एक गुप्त ग्रुप (स्लीपर सेल) बनाने के लिए भारत आया था। लेकिन भारत आते ही उसके खतरनाक इरादों पर ‘सजने-संवरने का शौक’ भारी पड़ गया। दरअसल, उस्मान के बाल बहुत झड़ रहे थे और वह अपने गंजेपन से काफी परेशान था। इस वजह से उसका हौसला टूट चुका था।

जब उस्मान ने कश्मीर में लोगों को शांति से अपनी जिंदगी जीते देखा, तो उसका दिमाग बदलने लगा। उसे समझ आ गया कि पाकिस्तान के ट्रेनिंग कैंपों में उसे जो नफरत सिखाई गई थी, वह सब झूठ था। इसी बीच श्रीनगर के एक दुकानदार ने (जो आतंकियों की मदद करता था) उस्मान को बताया कि कश्मीर में ही बाल उगाने (हेयर ट्रांसप्लांट) का अच्छा इलाज होता है। फिर क्या था, उस्मान अपना आतंकी मिशन भूल गया। वह श्रीनगर के एक बड़े क्लिनिक में गया और अपने बालों का इलाज करवाने लगा। इस इलाज के लिए उसे कई बार क्लिनिक में रात को रुकना भी पड़ा।

सिर्फ शौक नहीं, AI और कैमरों को धोखा देने की चाल

पहले-पहल तो पुलिस और जाँच एजेंसियों को लगा कि लश्कर के इन आतंकियों (उस्मान जुट और शब्बीर अहमद लोन) को बस सजने-संवरने और अच्छे दिखने का शौक है। लेकिन जब गहराई से पूछताछ हुई, तो एक बहुत बड़ी और खतरनाक साजिश का पता चला।

दरअसल, आजकल दुनिया के सभी बड़े एयरपोर्ट्स और रेलवे स्टेशनों पर चेहरा पहचानने वाले खास कैमरे (फेस-रिकग्निशन सॉफ्टवेयर) लगे होते हैं। यह कंप्यूटर सिस्टम सिर्फ किसी का फोटो नहीं देखता, बल्कि वह चेहरे की खास बनावट को नापता है। जैसे- दोनों आँखों के बीच कितनी दूरी है, नाक कितनी लंबी है, जबड़ा कितना चौड़ा है और माथा कैसा है। इस माप के जरिए कंप्यूटर किसी भी अपराधी या भगोड़े को तुरंत पहचान लेता है।

आतंकी इसी कंप्यूटर सिस्टम और कैमरों को धोखा देने के लिए अपने चेहरे की सर्जरी करवा रहे हैं। इन आतंकियों ने यह रास्ता 26/11 मुंबई हमले के मास्टरमाइंड साजिद मीर से सीखा है। साजिद मीर ने बहुत पहले अपनी पहचान छिपाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी कराई थी। चेहरा बदल जाने के बाद ये आतंकी नकली पासपोर्ट बनवा लेते हैं। इसके बाद वे बिना किसी रोक-टोक और बिना पकड़े गए एक देश से दूसरे देश आसानी से आ-जा सकते हैं। पुराना कुख्यात अंतरराष्ट्रीय हत्यारा ‘कार्लोस द जैकल’ भी पुलिस से बचने के लिए यही हथकंडा अपनाता था।

16 साल तक छिपा रहा, यूट्यूब से सीखी शेयर ट्रेडिंग

लश्कर के बड़े आतंकी अब्दुल्ला उर्फ ‘अबू हुरैरा’ की कहानी किसी फिल्म जैसी है। वह साल 2010 में पाकिस्तान से छिपकर भारत आया था और पूरे 16 साल तक यहाँ अलग-अलग राज्यों में छिपा रहा। अब्दुल्ला पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का था, इसलिए उसे हिंदी और पंजाबी बहुत अच्छे से बोलनी आती थी। भारत आकर उसने अपना हुलिया और पहचान पूरी तरह बदल ली। वह पाकिस्तान से ही नल ठीक करने (प्लंबिंग) का थोड़ा-बहुत काम सीखकर आया था।

भारत में टिके रहने के लिए उसने सबसे पहले ‘खरगोश’ नाम के एक दूसरे आतंकी की मदद ली। उसने नकली दस्तावेज (ID) बनवाए। जब उसके हाथ में ये कागजात आ गए, तो उसने राजस्थान और हरियाणा में जाकर पेंटर, बिजली वाले (इलेक्ट्रीशियन) और प्लंबर का काम करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद वह पंजाब के मलेरकोटला में रहने लगा।

वहाँ उसने एक ढाबा भी खोला, लेकिन जब ढाबा नहीं चला तो उसने यूट्यूब देखकर शेयर बाजार (शेयर ट्रेडिंग) का काम सीख लिया। वह इस काम में इतना पक्का हो गया कि पकड़े जाने तक उसने शेयर बाजार से 50 हजार रुपए से ज्यादा कमा लिए थे। वह आस-पड़ोस के लोगों को भी कमाई के तरीके सिखाता था। लोग उसे एक सीधा-साधा व्यापारी समझते थे। किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि उनके बीच रहने वाला यह शख्स असल में 40 विदेशी आतंकियों का खतरनाक कमांडर है।

‘पीर’ का चोला और AK-47 का जखीरा

पहचान बदलने का ऐसा ही एक और किस्सा दिल्ली के लक्ष्मी नगर से सामने आया था। वहाँ पुलिस ने मोहम्मद अशरफ नाम के एक पाकिस्तानी आतंकी को पकड़ा था। अशरफ ने खुद को भारतीय दिखाने के लिए ‘अली अहमद नूरी’ के नाम से नकली कागजात (ID) बनवा लिए थे। वह लोगों के बीच एक सीधे-साधे ‘पीर’ या मौलवी बनकर रहने लगा था। अशरफ साल 2004 में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से ट्रेनिंग लेकर, बांग्लादेश के रास्ते भारत में घुसा था।

भारत आकर उसने सबसे पहले अजमेर के एक मौलवी से दोस्ती की और फिर उनके साथ दिल्ली आ गया। दिल्ली में वह फैक्ट्रियों में नमाज पढ़ाने का काम करने लगा। धीरे-धीरे उसने लोगों का भरोसा जीत लिया। समाज में किसी को उस पर शक न हो, इसके लिए उसने गाजियाबाद की एक महिला से शादी भी कर ली। लेकिन जब पुलिस ने उसे दबोचा, तो इस ‘पीर’ के पास से एक AK-47 राइफल, कारतूस, बम (हैंड ग्रेनेड) और दो पिस्तौलें मिलीं। वह त्योहारों के समय दिल्ली में बड़ा धमाका करने की साजिश रच रहा था।

फर्जी दस्तावेजों का सिंडिकेट और जमीनी नेटवर्क

आतंकियों के इस छद्म रूप को लंबे समय तक टिकाए रखने का काम करता है ओजीडब्ल्यू (Over Ground Workers) यानी जमीनी मददगारों का नेटवर्क। श्रीनगर के नकीब भट, आदिल राशिद भट और गुलाम मोहम्मद मीर उर्फ ‘मामा’ जैसे लोग इन पाकिस्तानी आतंकियों को पनाह देते हैं। ये मददगार स्थानीय स्तर पर जाली कागजात बनाने वाले गिरोहों से मिलकर आतंकियों के नाम पर असली जैसे दिखने वाले आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर ID कार्ड तैयार करवाते हैं।

एक बार जब इन आतंकियों को ये सरकारी पहचान पत्र मिल जाते हैं, तो इनके लिए बैंक खाता खोलना, सिम कार्ड खरीदना और देश के किसी भी कोने में कमरा किराए पर लेना बेहद आसान हो जाता है। इसी कानूनी पहचान की आड़ में ये आतंकी अपना बैंक नेटवर्क और डिजिटल ट्रांजैक्शन चलाते हैं ताकि पाकिस्तान से आने वाले फंड को आसानी से ठिकाने लगाया जा सके।

पढ़े-लिखे डॉक्टर और ‘अल फलाह मॉड्यूल’ का सच

सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब आतंकी नेटवर्क में सिर्फ अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोग ही शामिल नहीं हैं। श्रीनगर पुलिस ने कुछ समय पहले लश्कर के ‘अल फलाह मॉड्यूल’ का भंडाफोड़ किया था। इस मॉड्यूल को देखकर अधिकारियों के होश उड़ गए, क्योंकि इसमें शामिल ज्यादातर लोग बेहद पढ़े-लिखे और समाज के प्रतिष्ठित पेशेवर थे, जिनमें मुख्य रूप से डॉक्टर शामिल थे।

इस मॉड्यूल का सीधा संबंध लाल किले के बाहर हुए कार बम धमाके से था, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा मासूम लोगों की मौत हो गई थी। उस आत्मघाती कार को चलाने वाला कोई आम इंसान नहीं, बल्कि अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़ा डॉ उमर-उन-नबी था। ये डॉक्टर दिन में मरीजों का इलाज करते थे और रात में आतंकियों के लिए लॉजिस्टिक, हथियार और फंडिंग का इंतजाम करते थे। यह इस बात का सबूत है कि आतंकवाद का कैंसर अब समाज के बौद्धिक स्तर तक पहुँच चुका है।

आखिरकार कैसे पकड़े जाते हैं ये शातिर आतंकी?

आतंकी चाहे कितना भी चालाक क्यों न हो और अपना रूप कितना भी बदल ले, वह कानून की नजरों से हमेशा के लिए नहीं बच सकता। उनके पकड़े जाने की शुरुआत अक्सर उनकी किसी एक छोटी सी गलती से होती है। कभी-कभी उनके गैंग का कोई एक मददगार पुलिस के हत्थे चढ़ जाता है, और वहीं से पूरा खेल बिगड़ जाता है।

जैसे, आतंकी उस्मान जुट के मामले में भी ऐसा ही हुआ। श्रीनगर पुलिस ने 31 मार्च को नकीब भट नाम के एक स्थानीय मददगार को पिस्तौल के साथ पकड़ा। जब पुलिस ने नकीब से कड़ाई से पूछताछ की, तो उसने अपने साथी आदिल का नाम उगल दिया। फिर आदिल के जरिए पुलिस को उन जंगलों और क्लिनिकों का पता चल गया, जहाँ आतंकी छिपे हुए थे।

पुलिस के बड़े अफसरों की देखरेख में जब इन पकड़े गए लोगों से सख्ती से पूछताछ होती है, तो इनका सारा झूठ सामने आ जाता है। इसके बाद पुलिस इनके ठिकानों पर छापा मारकर छिपाई गई AK-47, राइफलें और बम बरामद कर लेती है। पुलिस इनके मोबाइल फोन और बैंक खातों की भी जाँच करती है, जिससे दूसरे राज्यों में फैले इनके पूरे गैंग का पर्दाफाश हो जाता है। इस तरह, आम जनता के बीच सीधा-साधा इंसान बनकर छिपे इन खतरनाक अपराधियों का अंत होता है।

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