Saturday, November 28, 2020
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‘सबरीमला पर निर्णय के कारण ही मामले को सुन रहे हैं’: SC ने मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर कहा

याचिका में यासमीन जुबेर अहमद पीरजादे और जुबेर अहमद पीरजादे ने दलील दी है कि कुरान और हदीस में ऐसी किसी बात का उल्लेख नहीं है जो मस्जिद में प्रवेश के लिए लिंगभेद को जरूरी बताए।

कल (अप्रैल 16, 2019) सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश संबंधी एक याचिका को स्वीकार किया। इसके बाद इस मामले पर जस्टिस एस ए बोबडे और एस अब्दुल नजीर की पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है

पुणे के एक मुस्लिम दंपति ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दायर करते हुए न्याय व्यवस्था से गुहार लगाई है कि भारत की मस्जिदों में औरतों के प्रवेश पर रोक को अवैध और असंवैधानिक घोषित किया जाए। याचिका में यासमीन जुबेर अहमद पीरजादे और जुबेर अहमद पीरजादे ने दलील दी है कि कुरान और हदीस में ऐसी किसी बात का उल्लेख नहीं है जो मस्जिद में प्रवेश के लिए लिंगभेद को जरूरी बताए। इसके अलावा संविधान में प्राप्त अधिकारों की बात रखते हुए दंपति ने अपनी याचिका में अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का हवाला दिया और मस्जिद में महिलाओं को प्रवेश न देने को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।

मस्जिद में महिलाएँ Vs मर्द: एक साथ खड़े होने का समय अब नहीं तो कब?

दंपति ने याचिका में इस बात का भी जिक्र किया है कि देश में बहुत सी औरतें इस भेदभाव से पीड़ित हैं लेकिन वो कोर्ट तक अपनी आवाज़ पहुँचाने की हालत में नहीं हैं। ध्यान रहे कि सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर की मस्जिदों में महिलाओं को जाने की अनुमति है। याचिका में सबरीमला विवाद का भी हवाला दिया गया है, जिसके मद्देनजर शीर्ष अदालत ने महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा था कि किसी भी धार्मिक स्थल में महिलाओं को पूजा-अर्चना के अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता।

दंपति की याचिका में कहा गया है कि जमात-ए-इस्लामी और मुजाहिद वर्ग के लोग महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने की अनुमति देते हैं जबकि सुन्नी समुदाय में महिलाओं के मस्जिद में जाने पर प्रतिबंध है। हालाँकि जिन मस्जिदों में महिलाओं को जाने दिया जाता है वहाँ पर उनके प्रवेश द्वार से लेकर उनके नमाज पढ़ने वाले स्थान को अलग रखा जाता है। जबकि मजहब वालों के सबसे पाक स्थल मक्का में इस तरह का भेदभाव नहीं किया जाता है। काबा में महिलाएँ और पुरूष दोनों एक साथ बैठकर नमाज़ अदा करते हैं।

इसके बावजूद याचिकाकर्ताओं के वकील के जवाबों से उच्चतम न्यायालय असंतुष्ट दिखाई दिया। पीठ कहा कि सर्वोच्च न्यायालय केरल के सबरीमला मंदिर पर अपने फैसले के कारण मामले की सुनवाई के लिए तैयार है। पीठ का कहना है कि इस मामले को सुनने का एकमात्र कारण, केरल के सबरीमाला मंदिर पर उनका फैसला है।

गौरतलब है कि पुणे के मुस्लिम दंपत्ति ने याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि विधानमंडल आम महिलाओं/मुस्लिम महिलाओं की गरिमा और उनके समानता के अधिकार सुनिश्चित करने में विफल रहा है, विशेष रूप से तब जब बात महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश को लेकर हो या फिर उनके बुर्के पहनने को लेकर हो।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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